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चर्चाः सिनेमा में साहित्य की आवाजाही

साहित्यिक कृतियों पर फिल्में बनाने का चलन पुराना है। अनेक बड़े फिल्मकार कहानियों, उपन्यासों आदि से प्रभावित हुए और उन्होंने अपनी कलात्मकता से उन्हें फिल्म के रूप में ढालने का प्रयास किया। कई रचनाओं ने इस कदर प्रभावित किया कि उन पर कई फिल्मकारों ने अलग-अलग फिल्में बनार्इं। उनमें से कुछ निस्संदेह कला की दृष्टि से सराहनीय हैं, पर अनेक पर आरोप लगते रहे कि फिल्मकार ने रचना के साथ न्याय नहीं किया। हालांकि दोनों माध्यमों के अलग मिजाज हैं, फिर भी इनका परस्पर संबंध क्षीण नहीं होता। आखिर वह क्या चीज है, जो किसी रचना पर फिल्म बनाते समय फिल्मकार के रास्ते में बाधा बनती है! इस बार की चर्चा इसी पर। - संपादक

Author July 14, 2019 6:48 AM
अगर सिनेमा में साहित्य का यह एक सीमांत है, तो दूसरा सीमांत है- कवि शैलेंद्र निर्मित ‘तीसरी कसम’ को रुपहले पर्दे (सेल्यूलाइड) पर रेणु की कल्पना का मनोरम अवतार कहा जाना

 सत्मेयव त्रिपाठी

सिनेमा को शुरू हुए अभी सवा सौ साल हो रहे हैं। साहित्य हजारों साल पुराना है। मगर सिनेमा में जितना विपुल साहित्य आ गया है, उसे देख कर विश्वास पूर्वक कहा जा सकता है कि साहित्य के जन्मकाल से ही उसमें मौजूद था सिनेमा। फिल्मेतिहास में कुछ साहित्यिक कृतियां तो फिल्मकारों को इतनी भाई, उन्हें ऐसी चुनौती दे सकीं कि एक कृति पर आधा दर्जन फिल्में बन चुकी हैं। शरत बाबू के उपन्यास ‘परिणीता’ पर छह फिल्में सिर्फ हिंदी में बनी हैं। जाहिर है कि सिनेमा अपने जन्मकाल से ही साहित्य से आकर्षित और उद्वेलित होता रहा है। यह साहित्य की गरिमा और सृजन की शक्ति है कि साहित्य से आकृष्ट होकर सिनेमा समृद्ध हो सकता है, पर सिनेमा से आकृष्ट होकर साहित्य नहीं। उदाहरण अनेक हैं, पर सर्वोपरि हैं फिल्म-जगत के केंद्र में रहते हुए भी अपनी किसी रचना को न लाने वाले राही मासूम रजा- कुछ तो देखा-समझा होगा उन्होंने। फिर फिल्म से मुतास्सिर ‘शैलूष’, ‘कितने पाकिस्तान’ आदि रचनाएं साहित्य की श्रीहीनता और उसकी गरिमा की क्षति की सबब बनी हैं।

सिनेमा में साहित्य की शुरुआत 1915 में थॉमस डिक्शन के उपन्यास ‘द कैंसमैन’ पर बनी डीडब्ल्यू ग्रीफिथ की फिल्म ‘द बर्थ आॅफ अ नेशन’ से मानी जाती है। साहित्यिक कृति पर हिंदी में बनी पहली फिल्म वी. शांताराम की ‘माया मच्छिंद्रनाथ’ है, जो मणिशंकर त्रिवेदी के गुजराती नाटक ‘सिद्ध संसार’ पर बनी थी। हिंदी रचना पर बनी पहली हिंदी फिल्म मोहन भवनानी निर्देशित ‘मिल मजदूर’ मानी जाती है, जो प्रेमचंद की कहानी ‘मिल मालिक’ पर बनी है। ‘मिल मजदूर’ को देख कर स्वयं प्रेमचंद ने इसे ‘प्रेमचंद की हत्या’ कहा था।

अगर सिनेमा में साहित्य का यह एक सीमांत है, तो दूसरा सीमांत है- कवि शैलेंद्र निर्मित ‘तीसरी कसम’ को रुपहले पर्दे (सेल्यूलाइड) पर रेणु की कल्पना का मनोरम अवतार कहा जाना। ‘गोदान’ के सारे सामाजिक सरोकारों की कब्र पर बनी त्रिलोक जेटली की फिल्म प्रेमचंद देख पाते, तो अपने बाल नोच लेते। फिर गुलजार के पांच घंटे वाले दूरदर्शनी ‘गोदान’ में 1935 के होरी (पंकज कपूर) को चमचमाता जूता पहन के हल जोतते देखते, तो न जाने क्या कर लेते। पर अपनी दो कहानियों पर बनी सत्यजित रे की फिल्में ‘सद्गति’ और ‘शतरंज के खिलाड़ी’ देखते, तो निस्संदेह गदगद होते। गरज यह कि इन्हीं दो ध्रुवों के बीच सिमटा-फैला है सिनेमा में साहित्य का संसार, जिसे समझा जा सकता है- बनाने वाले के मकसदों और कला-कौशलों की जानिब से।

दोनों कलामाध्यमों की प्रकृति भिन्न है। फिल्म जनमाध्यम है- लोकप्रिय विधा है। ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ के लिखे जाने के चालीस सालों बाद जब इसी नाम से श्याम बेनेगल की फिल्म आई, तभी सचमुच मिला- रचना (सूरज) को गुणग्राहक (सातवां घोड़ा)। लेकिन इससे बड़ा सच कलागत है। दृश्यता इसका निर्णायक आयाम है, जो अभिनयादि अपने तत्त्वों को मिला कर ऐसी जीवंतता और रोचकता पैदा करता है कि रामायण-महाभारत तक की महाकाव्यात्मकता को भी इसका लोहा मानना पड़ता है। मगर इतनी समृद्धि के बावजूद, हीरामन (तीसरी कसम) की पीठ में होने वाली खुजली के बिना बयां नहीं हो पाती। और दृश्यता का जो आयाम दोनों के बीच सबसे बड़ा निर्णायक है, वही इसे फौरी (नश्वर) भी बनाता है।

जब साहित्य की किसी कृति को फिल्मकार उठाता है, तो उससे उसका गहरे प्रभावित होना निर्विवाद है, पर भिन्न विधा के लिए मूल में किए जाते परिवर्तनों की चर्चा इस संदर्भ का सबसे गरम मुद्दा बनता है। यह सुखद है कि कृतियों पर बनी ऐसी ढेर फिल्में मौजूद हैं, जो कला और सरोकार की शृंगार बनी हैं। कोई तब्दीली न करने की शैलेंद्रीय प्रतिबद्धता और स्वयं रेणु की उपस्थिति न होती, तो बासु दा ‘तीसरी कसम’ में हीरामन को हीराबाई से अवश्य मिलवा देते- सुखांत की पब्लिक पसंद के चलते, जो दादा की अन्य सभी फिल्मों में है। ऐसा होने पर या तो हीरामन की गाड़ीवानी छूटती या हीराबाई का गाना छूटता, जिनके बिना दोनों की पहचान खो जाती। और बिना छूटे दांपत्य न चलता। गाना छूटते ही उस वक्त प्रेम कला को लीलते हुए उभरती व्यावसायीकरण की प्रवृत्ति झुठला उठती। छोटे-छोटे परिवर्तन हुए भी, जिनसे कहानी की मूल संवेदना खुली-खिली ही। मसलन- जमीदार का चरित्र कहानी में नहीं है, पर फिल्म में आकर उसने दोनों के प्रेम को गहराया, हीराबाई के भागने का वाजिब कारण बना तथा प्रेम और कला के प्रति सामंती वृत्ति उभरी, जो कथा के सोने में सुहागा बनी। कुल मिलाकर यह कि एक क्लासिक ने दूसरे क्लासिक को जन्म दिया है।

ऐसे क्लासिक उदाहरण तो कम ही होते हैं, पर भारतीजी के उपन्यास ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ की यथावत प्रस्तुति को लेकर श्याम बेनेगल की प्रतिबद्धता भी कृति की प्रकृति के अनुसार क्लासिक नहीं, बस स्टाइलिश है। ‘तिरियाचरित्तर’ पूरे गांव की पंचायत के सामने स्त्री के जननांग को दागने जैसे क्रूर-वीभत्स अत्याचार की रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी को शिवमूर्ति ने बड़ी गर्मजोशी से लिखा है और बासुजी ने बिना कोई रद्दोबदल किए बड़े ‘कूलली’ बनाया है। शायद ये विधान और तेवर भी विधागत प्रकृति के ही अनुकूल वाजिब हैं, वरना ‘कूल’ होकर कहानी नष्ट भी हो सकती थी और गर्माहट से भर कर फिल्म उस वेदना को सोख भी सकती थी।

असल में यथार्थवादी कहानियों पर बिना किसी रद्दोबदल के फिल्म बनाने का बहुत कुछ श्रेय सत्यजित राय को जाता है, जब उन्होंने ‘सद्गति’ और ‘शतरंज के खिलाड़ी’ जैसी मान्य यथार्थवादी कहानियों को कलात्मक आयाम दिया और दृश्य विधा की वह ताकत यों नुमायां हुई (निहित तो सबमें होती है) कि दलित सुखिया की मरणांतक व्यथा पढ़ते हुए कितनी भी कल्पना-शक्ति के बावजूद उस शिद्दत का अहसास नहीं करा पाती, जो ओमपुरी को लकड़ी चीरते-चीरते मरते और जो जुगुप्सा उस मृत के गले में दूर से फंदा फेंकने और खींच कर ले जाते मोहन अगाशे को देख कर होती है।

बिना तब्दीली के यथावत बनी कुछ दूसरी तरह की फिल्मों में मन्नू भंडारी की कहानी ‘यही सच है’ पर बनी फिल्म का बस नाम बदला है- रजनीगंधा, जिसमें बेहतर सिनेमाई सौंदर्य तो है ही, नायक के रोज रजनीगंधा लाने से फिल्म महक भी जाती है। कृति में सार्थक परिवर्तन करने वाली फिल्मों में बासु चटर्जी ने ‘पंचवटी’ में साध्वी (दीप्ति नवल) के जेठ विक्रम (सुरेश ओबेराय) को जिंदा रखने का वांच्छित परिवर्तन किया, जिसे दुर्घटना में मरवा कर लेखिका कुसुम अंसल सामाजिक समक्षता से पलायन कर गई थीं। क्योंकि छोटे भाई की पत्नी से उसके प्यार के बच्चे की मां बनने वाली थी।

लेकिन ‘उसने कहा था’ जैसी बेजोड़ रचना पर बनी फिल्म देख कर सिर पीट लेना पड़ा। बचपन के अनकहे प्रेम में ‘तेरी कुड़माई हो गई?’ पर ‘धत’ कह कर भाग जाने और एक दिन ‘हां, हो गई, देखते नहीं हो यह रेशम का शालू’ के बाद मौन हो गए नायक लहना का कभी उसके कहे पर जान की कुर्बानी दे देने को न समझ कर मोना गुलाटी ने दोनों को गली-चौबारों में घुमा-घुमा कर पूरी बस्ती में बदनाम करके ही सच का प्रेम साबित किया। कहानी का शरीर ही क्षत-विक्षत नहीं हुआ, उसकी आत्मा (प्रेम) का भी सत्यानाश हो गया।

इस कला के बड़े सौदागर संजय लीला भंसाली ने अभी तो सूफी भक्ति के श्रेष्ठ काव्य ‘पद्मावत’ तक को न बख्शा। शरत बाबू की अमर कृति ‘देवदास’ के नाम को भुना कर अकूत धन कमाने की भूख के लिए सब कुछ को ‘ग्लैमरस’ के नाम पर पहले ही विकृत कर दिया था। जिस पारो-चंद्रमुखी का कभी आमना-सामना नहीं हुआ, सिर्फ एक बार आते-जाते पालकी से नजर पड़ी थी, उन्हें मिलवाया ही नहीं, सहेली बना दिया और दोनों से गाना गवा दिया- ‘हॉय मार डाला’।
भंसाली के ये खिलजियाना पैंतरे और हथौड़े तथा गुलजार के होरी के जूते किसी न किसी रूप में हर देशकाल में आते-जाते रहे हैं और रहेंगे। पद्मावत, गोदान, देवदास से ये वही मांगते-पाते हैं- नाम-दाम, जिसके लिए बाबा ने कहा है- का मांगउं कछु थिर न रहाई। पर ये रचनाएं अपने छपित रूप में अपना काम करती रहेंगी।

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