ताज़ा खबर
 

चर्चाः गुमशुदा पाठक की तलाश

हिंदी में पाठकों की कमी का रोना पुरानी बात हो चली है। मगर इसके साथ सच्चाई यह भी है कि हर साल किताबों का प्रकाशन बढ़ रहा है। नए प्रकाशक इस व्यवसाय में उतर रहे हैं। हर साल पुस्तक मेलों में खूब भीड़ देखी जाती है। किताबें बिकने के भी आंकड़े आते हैं। कई किताबों के साल में कई संस्करण भी निकल रहे हैं। फिर पाठकों की कमी के पीछे कितनी सच्चाई है। कुछ का तर्क है कि तकनीकी माध्यमों के आ जाने से मुद्रित सामग्री पढ़ने की आदत बदली है, जबकि हकीकत यह है कि पाठकों की रुचियां भी बदली हैं। इस बार की चर्चा इसी पर। -

सब कुछ निराशाजनक नहीं है। पुस्तकालयों के लिए सरकारी खरीद का दौर पीछे छूट गया है। सोशल मीडिया और अनलाइन खरीद ने के्रता और विक्रेता दोनों को नेपथ्य में कर दिया है। कई नए प्रकाशक तो सोशल मीडिया पर ही पूरी तरह आश्रित हैं।

हिंदी यानी खड़ी बोली हिंदी भाषा और साहित्य के गुमशुदा पाठकों की तलाश का प्रश्न एक गंभीर और बहुआयामी विमर्श की मांग करता है। विचारपूर्वक देखने पर यह समस्या उसके अतीत में सक्रिय ऐतिहासिक प्रवृत्तियों और पृष्ठभूमि तक ले जाती है। वैसे भी खड़ी बोली हिंदी बांग्ला जैसी भाषा की तुलना में ही नहीं, बल्कि हिंदी-परिवार की ही मैथिली, ब्रज, भोजपुरी और अवधी जैसी भाषाओं की तुलना में नीरस और शुष्क ही मानी जाती है। इसके आधारभूत उद्गम क्षेत्र को ध्यान से देखें तो इसके खरेपन में जाट बहुल क्षेत्र का अक्खड़पन समाया हुआ है। अगर महाभारत के पौराणिक आख्यान को भी ऐतिहासिक मान लें तो कौरवों की जिद को भी इसकी आत्मा में शामिल मान सकते हैं।

अपने विकास के प्रारंभिक (खुसरो) और मध्यवर्ती चरण में यह मुगल शासक वर्ग और शहरी भद्रजन यानी व्यापारी अभिजन वर्ग की भाषा रही है। लोकभाषाओं के गहरे जल पर तैरती काठ की नौका के समान। कई पीढ़ियों के सृजन-संघर्ष के बावजूद यह अभिजनों के प्रभाव के कारण सहज अभिव्यक्ति की भाषा न बन कर औपचारिक शिष्टाचार और अनुवाद की ही भाषा बनी रही है। ऐसा साहित्यिक खड़ी बोली और उर्दू का भाषिक आधार दिल्ली और मेरठ के आसपास की लोकभाषा खड़ी बोली होने से हुआ। इस तरह मुगलों के समय से ही हिंदी शासक वर्ग और व्यापारी यानी अभिजन की भाषा के रूप मे दिल्ली से हैदराबाद ही नहीं, बल्कि उत्तर और मध्य भारत के सभी हिंदीभाषी शहरों तक शासक वर्ग की भाषा के रूप में ही शहरों की भाषा बनी। सच यही है कि अपने जन्मकाल से ही खड़ी बोली हिंदी सत्ता के केंद्र के आसपास की भाषा होने से स्वभाव से ही शासकीय दंभ, दर्प और हिकारत की भाषा रही है। प्रमाण के लिए देखें तो भोजपुरी आदि के ‘तू’ तथा अंग्रेजी के ‘यू’ से अलग खड़ी बोली हिंदी का ‘तुम’ अप्रतिष्ठित करने वाला या हेयार्थक सर्वनाम है।

इसकी दंभी शुष्क व्यवहार वाली जातीय भाषिक प्रकृति को देखते हुए भारतेंदु युग के साहित्यकारों को तो यह विश्वास ही नहीं था कि खड़ी बोली हिंदी भाषा कविता करने के लायक भी है! बीसवीं शताब्दी के शुरुआती वर्षों में इस बात को लेकर अच्छी-खासी बहस भी चली थी कि ब्रजभाषा को छोड़ कर खड़ी बोली हिंदी में कविताएं की भी जानी चाहिए या नहीं? मध्यकाल तो अधिकांशत: ब्रज और अवधी पर निर्भर था। रामचरित मानस जैसी सार्वकालिक कृति भी अवधी में ही है। दरअसल, अपने प्रकृत रूप में खड़ी बोली हिंदी को स्थानीय बोली से शाहजहां के काल के बाद मुगल सत्ता के अधिकारियों, कर्मचारियों तथा व्यापारियों ने मिल कर उत्तर और मध्य भारत की शहरी भाषा बना दिया था। शहरी भाषा होने के कारण यह मानक के नाम पर हिंदी जाति की विशाल शब्द-संपदा से बिल्कुल ही अपरिचित लगभग भद्रलोक की अनुवादधर्मी भाषा बन गई है।

यहां अनुवादधर्मी से आशय वास्तव में बोली जाने वाली भाषा से भिन्न खड़ी बोली में की जाने वाली अनुवादधर्मी प्रस्तुति है। स्वयं प्रेमचंद भी अपने पात्रों की वास्तविक सामाजिक भाषा का खड़ी बोली हिंदी अनुवाद प्रस्तुत करते रहे। राहुल सांस्कृत्यायन, फणीश्वरनाथ रेणु, नागार्जुन तथा इधर के साहित्यकारों में शिवमूर्ति आदि ने अनुवादधर्मी खड़ी बोली साहित्यिक हिंदी से बाहर निकल कर लोकभाषाओं से संवाद करने की कोशिश की, लेकिन हिंदी में संस्कारगत कारणों से विशिष्ट अभिरुचियों वाला लेखकों का ऐसा अभिजन-समूह निरंतर सक्रिय रहा कि जो हिंदी को संस्कृत का उपनिवेश यानी दूसरी संस्कृत बनाने में लगा रहा। आज की स्थिति भी भिन्न नहीं है। हिंदी के जातीय-स्थानीय यानी देशज शब्दों को हिंदी साहित्य की मुख्य धारा में न आने देने की जैसे अघोषित साजिश ही चल रही है।

तत्समीकरण कर हिंदी को शत-प्रतिशत संस्कृत की बेटी बनाए रखने की चाहत ने इसे हिंदी परिवार की मां-मौसी-बहन जैसे अन्य स्वरूपों में विकसित होने ही नहीं दिया। इसे एक लोकोत्तर कृत्रिम भाषा में बदल कर रख दिया गया है। आज ऐसी मानसिकता बना दी गई है कि अंचल विशेष का साहित्यकार भी मानक के चक्कर में स्थानीय शब्दों से यथासंभव बचने तथा पाठकों को परिचित कराने का कष्ट या जोखिम नहीं उठाना चाहता। वह देशज या स्थानीय हो जाने के भय तथा हीनता ग्रंथि का शिकार है। इससे एक ऐसा परिदृश्य निर्मित होता है कि भोजपुरी अंचल का हिंदी पाठक अगर कभी राजस्थान चला जाए तो वह राजस्थानी को ही बिल्कुल अजनबी भाषा के रूप मे देखेगा और ऐसे ही राजस्थानी पृष्ठभूमि का लेखक और पाठक भोजपुरी के शब्द-संसार को। ऐसी मानसिकता को जीने वाले हिंदी के साहित्यकारों में स्थानीय को वैश्विक बनाने वाली कला कहां से आएगी? जीवंतता और प्राणतत्व तो लोक के पास ही है! आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भी साहित्यिक भाषा के पुनर्जीवन के लिए साहित्यकारों को लोक के पास जाने की सलाह दी थी।

यद्यपि आज की नई पीढ़ी के साहित्यकारों को तो यह शहरी-साहित्यिक तत्समीकृत खड़ी बोली ही मातृभाषा के रूप में प्राप्त हुई है, लेकिन यह भी सच है कि इसने हिंदी में कृत्रिम भाषा का उबाऊ आलंकारिक रीतिकाल पैदा किया है। यह प्रवृत्ति हिंदी के अधिकांश लेखन को औपचारिक, अनाकर्षक और अरुचिपूर्ण बनाती है, क्योंकि पाठक अपने दैनिक व्यवहार की भाषा से भिन्न भाषा में हुई साहित्यिक अभिव्यक्ति पाता है। यद्यपि साहित्य के पाठक कम होते जाने के लिए किसी एक कारण को ही जिम्मेदार मानना उचित नहीं होगा- भारत की ही दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं जैसे बांग्ला, गुजराती, ओड़िया, तेलुगु और तमिल आदि में जिस प्रकार स्थायी महत्त्व की साहित्यिक कृतियों और साहित्यकारों के होने की सूचना मीडिया में आती रहती है तथा अनुवाद के माध्यम से ही सही, उन्हें हिंदी में भी जानने और पढ़ने वालों की संख्या कम नहीं है। इसके अलावा अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों का बढ़ना भविष्य के हिंदी पाठकों को अल्पसंख्यक बना सकता है।

वास्तव में यह आदर्शों के विघटन और विकेंद्रीकरण का दौर है। हमारा समाज अपने निश्चित और निर्णायक प्रतिमानों की नई पीढ़ी को प्रभावी प्रस्तावना नहीं कर पा रहा है। एक साहित्यिक संकट यह है कि हिंदी जगत विज्ञान-युग की आधुनिकता और आजादी के बाद का कोई लोकप्रिय क्लासिक भी नहीं रच पाया है। यहां आशय जीवन-मूल्यों की निर्णायक प्रस्तावना करने वाली लोकप्रिय और समकालीन मानक तथा सर्वमान्य कृतियों से है।

हिंदी में पाठकों के लिए विश्वसनीय सूचना और सुझाव का तंत्र भी नहीं है। कुछ विचारधारा आधारित संगठन स्थानीयता के आधार पर सक्रिय-निष्क्रिय अवस्था में अब भी अस्तित्व मे हैं, लेकिन स्थानीय तथा नगरीय साहित्यिक समूहों की भी एक प्रभावी भूमिका सामने आई है।
हिंदी में केंद्रीय तथा प्रांतीय विश्वविद्यालयों की एक बड़ी संख्या विद्यार्थी उपभोक्ताओं का निर्माण करती है। यह एक स्थायी बाजार है, जो विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा से लेकर नेट परीक्षा दिलाने तक ले जाता है। इस सफल-असफल यात्रा में हर विद्यार्थी जरूरी पुस्तकों का एक निजी लघु पुस्तकालय तो निर्मित कर ही लेता है। लेकिन यह परीक्षाओं के लिए उपयोगी पुस्तकालय इसके पाठकों में अलग तरह का कुपोषण पैदा करता है। इस संग्रह में मूल कृतियां बहुत कम शामिल रहती हैं, अधिकांश पुस्तकें अध्ययन-सामग्री यानी समीक्षा और आलोचना वर्ग की होती हैं।
इसके बावजूद सब कुछ निराशाजनक नहीं है। पुस्तकालयों के लिए सरकारी खरीद का दौर पीछे छूट गया है। सोशल मीडिया और अनलाइन खरीद ने के्रता और विक्रेता दोनों को नेपथ्य में कर दिया है। कई नए प्रकाशक तो सोशल मीडिया पर ही पूरी तरह आश्रित हैं।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 किताबें मिलींः ‘स्त्री कविता’ और ‘प्रेम नाम है मेरा- प्रेम चोपड़ा’
2 बाख़बरः एक कविता जो सबकी है
3 वक्त की नब्जः मुद्दे से अलग
ये पढ़ा क्या?
X