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चर्चा: शिक्षा बनाम परीक्षा, परीक्षा और पठन-पाठन की चुनौतियां

शिक्षा में परीक्षा की कितनी और क्या जगह होनी चाहिए, इस पर लंबे समय से चर्चा होती रही है। अंग्रेजों के जमाने से लेकर आजाद भारत तक में जितने आयोग बने, सबने शिक्षा में परीक्षा को बड़ी बाधा के रूप में स्वीकार किया। पर यह प्रश्न हर वक्त उठ खड़ा होता है कि आखिर बच्चों के पढ़ने-सीखने का मूल्यांकन किस तरह हो। मगर परीक्षा की अनिवार्यता अब धीरे-धीरे सिर्फ एक प्रमाण-पत्र हासिल करने की तरकीब तक सिमट कर रह गई है। इसका सबसे विचित्र अनुभव पिछले कुछ सालों से खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार की परीक्षाओं में नकल के रूप में सामने आ रहा है। इस बार कड़ाई हुई तो उत्तर प्रदेश में करीब दस लाख विद्यार्थियों ने परीक्षा छोड़ दी। शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण बनाने और विद्यार्थियों में सीखने की आदत विकसित करने के लिए क्या प्रयास होने चाहिए, इस बार की चर्चा इसी पर। - संपादक

Author February 25, 2018 05:39 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

अभिजीत मोहन

उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद की हाईस्कूल और इंटरमीडिएट परीक्षा में जिस तरह परीक्षा छोड़ने वालों का आंकड़ा दस लाख के पार पहुंच चुका है, उससे स्पष्ट है कि नकल के खिलाफ सरकार की सख्ती का असर दिख रहा है। परीक्षा शुरू होने से पहले ही सरकार ने तय कर लिया था कि नकल और नकल माफिया दोनों पर शिकंजा कसा जाएगा। सरकार ने सख्ती दिखाते हुए परीक्षा केंद्रों को सीसीटीवी कैमरों से लैस किया और साथ ही नकल रोकने के लिए शिक्षा अधिकारियों, केंद्र व्यवस्थापकों, प्रधानाचार्यों और अध्यापकों की जवाबदेही सुनिश्चित की। इसका असर यह हुआ कि नकल करने और कराने वाले दोनों ही हतोत्साहित हुए हैं। लेकिन इसके बावजूद कुछ जिलों में कई विषयों के प्रश्नपत्र आउट हुए हैं, जो रेखांकित करता है कि परीक्षा व्यवस्था की खामी को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सका और नकल माफिया अब भी हाथ-पांव मार रहे हैं। पर असल सवाल है कि नकल पर नकेल कसी जाने से लाखों बच्चे परीक्षा छोड़ने पर मजबूर क्यों हुए? क्या इस निष्कर्ष पर पहुंचना उचित होगा कि परीक्षा छोड़ने वाले सभी बच्चे नकल के भरोसे थे? कतई नहीं। हालांकि उत्तर प्रदेश सरकार इसे अपनी बड़ी उपलब्धि मान रही है। जबकि यह बदहाल शिक्षा व्यवस्था का एक भयावह सच है। इस पर मनन-चिंतन करना चाहिए कि आखिर ऐसे हालात क्यों पैदा हुए। परीक्षा छोड़ने वाले बच्चों में हजारों बच्चे ऐसे भी हैं, जो स्कूलों में पठन-पाठन न होने के कारण परीक्षा छोड़ रहे हैं। ऐसे में यह मान लेना कि केवल नकल पर अंकुश लगाने से शिक्षा व्यवस्था संवर-सुधर जाएगी, तो वह भ्रम ही साबित होगा।

निस्संदेह नकल पर रोक लगनी चाहिए, लेकिन सबसे जरूरी है कि बदहाल शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त कर विद्यालयों में पठन-पाठन का माहौल बनाया जाए। यह तभी संभव होगा जब विद्यालयों में छात्रों के अनुपात में शिक्षक और जरूरी संसाधन उपलब्ध होंगे। इसके लिए सरकार को शिक्षा पर खर्च बढ़ाना होगा। विकसित देशों में शिक्षा पर जहां कुल बजट का छह से सात प्रतिशत खर्च होता है, वहीं भारत अपनी राष्ट्रीय आय का दो प्रतिशत से भी कम खर्च करता है। भला इस सीमित बजट के जरिए शिक्षा के उच्च लक्ष्यों को कैसे हासिल किया जा सकता है? शिक्षा में बेहतर नतीजे और समुचित संसाधनों के लिए भारत सरकार को चाहिए कि वह राष्ट्रीय आय का छह प्रतिशत खर्च करे। अगर बजट बढ़ता है तो भारत दुनिया का सबसे बड़ी प्रतिभा का स्रोत होगा। पर यहां विडंबना है कि एक ओर केंद्र और राज्य सरकारें शिक्षा में सुधार के लिए प्रतिबद्धता जता रही हैं वहीं शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों की भारी कमी से शिक्षण कार्य बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।

आज देश के तकरीबन सभी शिक्षण संस्थान शिक्षकों की भारी कमी से जूझ रहे हैं। मानव संसाधन मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक देश एक हजार से ज्यादा केंद्रीय स्कूलों में बारह लाख से अधिक बच्चे पढ़ते हैं, लेकिन छात्रों के अनुपात में शिक्षकों की भारी कमी है। पिछले साल मानव संसाधन विकास मंत्रालय की एक रिपोर्ट से सामने आया कि देश में एक लाख से अधिक सरकारी स्कूल ऐसे हैं, जो एक अकेले शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। पिछले साल सर्व शिक्षा अभियान की वास्तविक स्थिति जानने के लिए केंद्र सरकार के संयुक्त समीक्षा मिशन के सामने यह खुलासा हुआ कि उत्तर प्रदेश में सात हजार चार सौ उनतीस परिषदीय स्कूल सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। राज्य के तकरीबन साढ़े सैंतालीस हजार यानी बयालीस प्रतिशत परिषदीय प्राथमिक विद्यालय ऐसे हैं, जिनमें छात्र-शिक्षक अनुपात पैंतीस पर एक के मानक से अधिक है। आंकड़े बताते हैं कि अकेले उत्तर प्रदेश में शिक्षकों के तीन लाख से अधिक पद रिक्त हैं। शिक्षकों की नियुक्ति के लिए गठित आयोग भी निष्क्रिय हैं। जो नियुक्तियां हुई हैं वे भी भ्रष्टाचार के कारण अदालतों के पास विचाराधीन हैं। नतीजा, विद्यालयों में पठन-पाठन की स्थिति सुधरने के बजाए लगातार बिगड़ती जा रही है। ऐसे में अगर छात्र परीक्षा छोड़ने को मजबूर हैं तो इसे उपलब्धि मानने के बजाय सरकार को इस पर आत्ममंथन करने की जरूरत है। विद्यालयों में मूलभूत सुविधाएं भी बेहद दयनीय स्थिति में हैं। यह सच्चाई है कि राज्य की सभी सरकारों ने समय-समय पर मान्यता के नियमों को शिथिल करते हुए रेवड़ियों की तरह विद्यालय खोलने की अनुमति दी। उसी का नतीजा है कि आज गली-गली में मानकविहिन विद्यालय मौजूद हैं। विडंबना यह है कि ऐसे विद्यालयों की रुचि पठन-पाठन के बजाय येन केन प्रकारेण नकल करा कर धन उगाहने की होती है। उनका मकसद नकल के भरोसे नतीजे सुधार कर छात्रों को आकर्षित कर धन कमाना होता है। ऐसे विद्यालयों को चिह्नित कर उनकी मान्यता रद्द होनी चाहिए।

सरकारी विद्यालयों की हालत जर्जर है। यहां छात्र टाट-पट्टी पर बैठने को मजबूर हैं। लड़कियों के पचास प्रतिशत से ज्यादा स्कूलों में शौचालयों की व्यवस्था नहीं है। जहां शौचालय भी हैं, वे इस्तेमाल के लायक नहीं हैं। स्कूलों में न तो जरूरत के मुताबिक कमरे हैं और न ही सुविधाओं से युक्त लाइब्रेरी और प्रयोगशाला। प्रैक्टिकल की आड़ में धन वसूली की खबरें आम हैं। इन हालात में बच्चों को वैज्ञानिक ढंग से शिक्षा देने की बात स्वयं में बेमानी हो जाती है। दूसरी ओर स्कूलों से शिक्षकों का पलायन, विषय पर कमजोर पकड़, शिक्षण कार्य के प्रति अरुचि और छात्रों हितों की उपेक्षा आदि कई अन्य समस्याएं हैं, जिससे विद्यालयों में पठन-पाठन का माहौल नहीं बन रहा है। महत्त्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि सरकारी विद्यालयों में छात्रों की संख्या लगातार घट रही है। उत्तर प्रदेश के कई विद्यालयों में छात्रों के अनुपात में कई गुना ज्यादा शिक्षक हैं। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि स्कूलों में उपलब्ध शिक्षक भी अपने उत्तरदायित्वों का समुचित निर्वहन नहीं कर रहे हैं। जब भी शिक्षा अधिकारियों द्वारा विद्यालयों का दौरा किया जाता है कई शिक्षक गायब मिलते हैं। यह स्थिति चिंताजनक तो है ही, साथ ही रेखांकित भी करती है कि शिक्षक समुदाय अपने उत्तरदायित्वों के प्रति गंभीर नहीं हैं। आज उसी का नतीजा है कि बच्चों को समुचित शिक्षण का लाभ नहीं मिल पा रहा और वे पठन-पाठन में बेहद कमजोर हैं। कई रिपोर्टों से स्पष्ट हो चुका है कि सरकारी प्राथमिक विद्यालयों के आधे से अधिक बच्चे दो अंकों वाले घटाने के सवाल हल करने में सक्षम नहीं हैं। अधिकतर बच्चे गणित विषय में बेहद कमजोर हैं। भाषा पर भी उनकी पकड़ न के बराबर है। चार में से एक छात्र एक वाक्य तक नहीं पढ़ सकता। दो तिहाई छात्र दूसरी कक्षा के पाठ सही तरीके से पढ़ नहीं पाते। आठवीं और दसवीं के बच्चे जोड़-घटाना और भाग तक नहीं जानते। सत्तर प्रतिशत बच्चों को अंकों की पहचान नहीं है।

विडंबना यह है कि पढ़ाई में कमजोर बच्चों को उसी कक्षा में रोकने के बजाय उत्तीर्ण कर दिया जाता है। गौरतलब है कि देश में कक्षा आठ तक फेल न करने की नीति लागू है। यही बच्चे हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की कक्षाओं तक पहुंचते हैं और विषयों पर उनकी पकड़ नहीं बन पाती है। फिर ऐसे बच्चों के लिए परीक्षा उत्तीर्ण करना चुनौती बन जाता है। नकल माफिया ऐसे बच्चों को उत्तीर्ण कराने का ठेका लेते हैं और शिक्षा विभाग के भ्रष्ट अधिकारी उनके इस कृत्य में सहयोग देते हैं। सरकारों को समझना होगा कि शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन तभी होगा जब स्कूलों में पठन-पाठन का माहौल बनेगा और शिक्षकों की जवाबदेही सुनिश्चित की जाएगी। केवल नकल पर अंकुश लगा कर बेपटरी हो चुकी शिक्षा-व्यवस्था को संवारना-सुधारना संभव नहीं है।

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