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चर्चा: उधार का चिंतन टिकाऊ नहीं होता

लेखन में मौलिकता की मांग की जाती है। यानी रचनाकार जो कुछ कहे अपना कहे, अपने ढंग से कहे और प्रभाव पैदा करे। पर वैचारिक लेखन और आलोचना में दूसरों की कही बातें, उनका चिंतन, उनके विचार उद्धृत करना जैसे बहुपठित होने की निशानी मानी जाने लगी है। इन दिनों यह प्रवृत्ति कुछ अधिक देखी जाती है कि अपनी बात में दम पैदा करने के लिए प्राय: पश्चिमी विद्वानों की बातें उद्धृत की जाती हैं। अंगरेजी के पूरे के पूरे पैरा दिए जाते हैं। यह कहां तक ठीक है और इससे साहित्य-आलोचना और वैचारिक लेखन पर क्या प्रभाव पड़ता है। इस बार की चर्चा इसी पर। - संपादक

Author December 9, 2018 2:41 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

विजय बहादुर सिंह

काव्य में रहस्यवाद’ शीर्षक अपने निबंध में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने जो निष्कर्षात्मक वक्तव्य दिया था वह कुछ इस प्रकार है- ‘यह अच्छी तरह समझ रखना चाहिए कि हमारे काव्य का, हमारे साहित्य शास्त्र का, एक स्वतंत्र रूप है, जिसके विकास की क्षमता और प्रणाली भी स्वतंत्र है। उसकी आत्मा को, उसकी छिपी हुई भीतरी प्रकृति को, पहले हम जब सूक्ष्मता से पहचान लेंगे तभी दूसरे देशों के साहित्य के स्वतंत्र पर्यालोचन द्वारा अपने साहित्य को देखना होगा; दूसरे देशों की दृष्टि से अपने साहित्य को नहीं।’’ बड़े और व्यापक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय फलक पर गांधी भी ‘हिंद स्वराज’ में कुछ ऐसा ही सोच रहे थे। बाद के दिनों में धर्मपाल जैसे समाजविज्ञानी चिंतक ने भी लगातार मुहावरे की जुबान में सोचते हुए कहा कि दूसरों की नहीं, हमें अपनी निगाह से खुद को देखना होगा। इसी संदर्भ में तो नहीं, पर एक अन्य प्रसंग में हिंदी के प्रवर्तनवादी कवि अज्ञेय ने रघुवीर सहाय के प्रश्न ‘भारतीय साहित्य’ पर अपनी बात रखते हुए कहा- ‘अगर हम भारतीयेतर की तुलना में भारतीय की बात करें तो सबसे पहले काव्य की अवधारणा और उसका जो प्रभाव साहित्य पर पड़ता है, उसकी दृष्टि से विचार करेंगे। क्योंकि भारत की काल की अवधारणा दूसरी है, उसके संबंध में उसकी दृष्टि दूसरी है।’ रघुवीर सहाय सहमत होकर एक और जिज्ञासा ‘संवेदनों की पहचान’ को लेकर करते हैं, जिसके जवाब में अज्ञेय कहते हैं- ‘हां, जो चीजें सभ्यता को बनाती हैं और उसकी विशेष अंतर्दृष्टि जिससे बनती है, उसी के आधार पर हम विशेष संवेदन… एक तो मानवीय संवेदन है।… चोट लगने पर आह भरनी चाहिए या कि उसे दबा देना चाहिए, यह भी हमारी संस्कृति तय करती है।’ आगे भी वे खुद अपनी एकाध कृतियों का उदाहरण लेकर यह समझाते हैं कि मृत्यु को लेकर हमारी दृष्टि पश्चिम से भिन्न है।

पर इन सबका शायद ही यह मत हो कि अपने अलावा किसी और सभ्यता और समाज की ओर देखना ही नहीं चाहिए। इससे तो कूपमंडूकता पनपेगी और हमारा स्वाभाविक विकास रुक जाएगा। तब हमें एक सुचिंतित तुलनात्मक और प्रतिस्पर्धात्मक दृष्टि का संधान करना होगा। यह नहीं भूलना होगा कि निसर्ग को लेकर हमारे पुरखों ने जो दृष्टि विकसित की थी उसी का समर्थन बुद्ध और गांधी ने भी किया, रवींद्रनाथ ने भी किया। संदर्भ किंतु यहां समकालीन हिंदी आलोचना का है, जिसका मुख्य काम केवल काव्य-विशेष या सृजनात्मक लेखन को लेकर अपना निर्णय सुनाना नहीं, मूल्य-निर्णय करना है। यह पहले ही कहा जा चुका है कि मूल्य-निर्णय बगैर सभ्यता और संस्कृतिबोध के संभव नहीं। रचनाकार के अनुभव तो देश-काल से बंधे होते ही हैं, उसकी निगाह भी उसी परंपरा से अपना प्रकाश ग्रहण करती है। रवींद्रनाथ, प्रेमचंद, सुब्रह्मण्य भारती, प्रसाद और निराला या फिर स्वयं आचार्य शुक्ल और उनके परवर्ती साहित्य चिंतक आचार्य नंददुलारे वाजपेयी, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, यहां तक कि परवर्ती रामविलास शर्मा भी- जिस तरह अपनी भूमिका रेखांकित करते हैं उसमें परंपरा और संस्कृति की पहचान ही नहीं, बोध भी निर्णायक है। अकारण ही नहीं आलोचक को यह लिखना पड़ता है कि कवि तो केवल अपने काव्य के लिए जिम्मेदार है, किंतु समीक्षक अपने युग की संपूर्ण साहित्यिक चेतना के लिए जिम्मेदार है। दूसरे अर्थों में वह जातीय जीवन का नियामक भी कहा जा सकता है। प्रश्न यह है कि इस बड़े या राष्ट्रीय/ सांस्कृतिक जीवन से मात्र सतही परिचय और उधार की अनुकरणमूलक दृष्टि के बल पर क्या यह गुरुतर दायित्व उसके द्वारा संपन्न किया जाना संभव है? या फिर किताबी ज्ञान और पांडित्य के बल पर यह खेल किया जाना संभव है? तब क्या यह मान लिया जाय कि समीक्षक के लिए पांडित्य-शून्यता एक सद्गुण है? कदापि नहीं, किंतु कोरे पांडित्य और उद्धरणमूलकता के बल पर न तो आज तक कोई समीक्षक हुआ है, न आगे कभी हो शायद। कोरे पांडित्य के बल पर न तो कोई कवि माना गया, न ही आलोचक। अन्यथा ढेर सारे साहित्य-शास्त्री और विद्याचार्य समीक्षक मान लिए गए होते।

कवि केदारनाथ सिंह ने अनौपचारिक बातचीत में एक बार कहा था- ‘समीक्षक तो वही है जो चमकती हुई पंक्ति पर उंगली रख दे।’ उनका आशय प्रतिभा की असाधारण चमक से था, जिसे आलोचक अपनी दृष्टि प्रखरता से पहचान ले। पिछले कई दशकों में विचारधारावाद के अतिशय दुराग्रहों के चलते कई स्वाधीन प्रतिभाओं की अनदेखी की गई। आलोचना ने यहां ईमानदारी और तटस्थता से काम नहीं लिया। इस रूप में उसने प्रतिभा की सृजनशीलता को तो नकारा ही, अपने दायित्व के प्रति भी अन्याय किया। इधर बीस-तीस बरसों में पश्चिम के विचारों और वहां के लेखकों के उद्धरणों से हिंदी समीक्षा का कथित नया परिसर बाढ़ग्रस्त जैसा है। यही क्यों, उधार की अवधारणाओं के बल पर मौलिक होने और दिखने का दावा ही नहीं, दंभ भी किया जाने लगा है। इसे हम अपनी स्वतंत्र कमाई के बल पर चिंतन-प्रवणता और मूल्य-विवेक कहें या फिर क्या? जयशंकर प्रसाद के शब्दों में- क्या इसे ‘स्वरूप-विस्मृति’ कहें या फिर कोई मुगालता। मार्क्सवाद पर बतियाते हुए कवि नागार्जुन ने ‘राष्ट्रीय मार्क्सवाद’ का आग्रह समकालीनों से किया था। चीन से भारत के युद्ध के दिनों में नागार्जुन की भंगिमा और सक्रियता का इतिहास हमारे पास पहले है। ‘मंत्र कविता’ जैसी कविता लिख कर वे प्रायोगिक मार्क्सवाद का एक उदाहरण ठेठ भारतीय जमीन पर देते हैं। ऐसी जगहों पर आलोचना की जिम्मेदारियां कुछ और बढ़ जाती हैं। नामवर सिंह तब ठीक ही यह सवाल उठाते हैं कि ‘यह कैसा ऐतिहासिक भौतिकवाद है, जो एक जड़ शास्त्र की वेदी पर समूचे इतिहास की बलि चढ़ाने में भी नहीं हिचकता।’ अपने निबंध ‘मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र के विकास की दिशा’ में वे एक और विचारणीय बात कहते हैं- ‘आयात से ही विकास संभव होता तो विचारों के मामले में तो सरकार से किसी लाइसेंस की भी जरूरत नहीं है। कल जो कांट, हेगेल और क्रोचे के सहारे भारत में सौंदर्यशास्त्र का विकास कर रहे थे वे आज भी आयात में किसी से पीछे नहीं है।… इसलिए जैसा कि पहले कहा गया, असल सवाल उस सौंदर्यशास्त्र का है, जो हमारे सौंदर्यबोध को बदलने में कारगर हो।’

नोबेल विजेता बोलशोयिन्का ने अपनी पुस्तकों के हिंदी अनुवादक और हिंदी के रचनाकार वीरेंद्र कुमार बरनवाल को एक पत्र में लिखा था कि यह आश्चर्य की बात है कि भारत के लेखक, जिनके पास साहित्य चिंतन की हजारों सालों की सुदीर्घ परंपरा है, उसकी तरफ से आंखें मूंद कर केवल पश्चिम की ओर देखा करते हैं। अपनी इतनी समृद्ध और सुदृढ़ विरासत की यह अनदेखी भले ही हमें अधुनिकता के मिथ्या मुगालते में रखे, पर वैज्ञानिक तो कदापि कही नहीं जा सकती। समकालीन हिंदी आलोचना को तब केवल अपनी दृष्टि नहीं, दिशा परिवर्तन के बारे में सोचना चाहिए। निश्चय ही यह काम सिर्फ किताबी पहलवानी और आयातित उद्धरणीयता से नहीं, स्वाधीन और स्वतंत्र चिंतन के बल पर ही सधेगा। इसके लिए जो पूर्व तैयारियां करनी पड़ेंगी उस बारे में भी सोचना होगा। आज की स्थितियों में तो यह काम और भी जटिल हो चुका है। धार्मिक संप्रदायवाद, कट्टरतावाद, आतंकवाद, बर्बरता और फासीवाद मिलजुल कर एक नई सामाजिक संरचना में लगी हुई हैं। क्या यह एक प्रकार की प्रेस क्रांति नहीं है? नया जातिवादी उभार आधुनिक कहे जाने वाले सपनों में और भी खलल पैदा करने लगा है। ऐसी स्थिति में मूल्य-निर्णय भी आसान बात नहीं। तब अंधेरा केवल कविता या गद्य-विधा में नहीं, आलोचना में भी एक चुनौती है। इस चुनौती से हम कैसे निपटेंगे- यही सवाल सबसे बड़ा है।

 

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