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वक्‍त की नब्‍ज: बुनियादी उसूल और उसूलों की बुनियाद

देश के अधिकतर लोग इन झगड़ों से आगे निकल चुके हैं। यह इन दिनों बिहार के चुनावों में देखने को मिलता है। आम लोगों से जब पूछा जाता है कि उनकी राय में इस बार सबसे बड़ा मुद्दा क्या है, तो बेझिझक सब कहते हैं कि एक ही मुद्दा है और वह है बेरोजगारी।

UP CMयूपी के सीएम योगी आदित्य नाथ। ( फाइल फोटो:पीटीआई)

एक अध्यापक पिछले हफ्ते फ्रांस का सबसे बड़ा हीरो बना। फ्रांस के राष्ट्रपति ने उसके अंतिम संस्कार से पहले उसे समानित करते हुए कहा कि सैम्युअल पाती ने अपनी जान गंवाई उन उसूलों को जीवित रखते हुए, जो फ्रांस की नीव के पत्थर हैं। स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व। उन्होंने यह भी कहा कि इन उसूलों के बारे में अगर स्कूलों में बच्चों को सिखाया नहीं जाएगा तो उनको सुरक्षित रखना मुश्किल है।

सैम्युअल पाती को सजा-ए-मौत एक जिहादी हत्यारे ने इसलिए दी, क्योंकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब समझाते हुए इस अध्यापक ने इस्लाम के रसूल के वे कार्टून दिखाए, जिसे लेकर चार्ली एब्दो पत्रिका पर जिहादी हमला हुआ था पांच साल पहले। कार्टून दिखाने से पहले अध्यापक ने यह भी कहा था कि जिन मुसलिम छात्रों को इनका दिखाया जाना गलत लगता है, वे कक्षा छोड़ कर जा सकते हैं। इसके बावजूद इस तथाकथित ‘गुनाह’ की खबर सोशल मीडिया पर पहुंच गई और अठारह वर्ष के एक मुसलिम युवक ने इस अध्यापक को ढूंढ़ निकाला और सरेआम उसकी हत्या कर दी, तलवार से उसका सिर काट कर।

एक बार फिर दुनिया को याद दिलाया गया है कि इस्लाम में कोई चीज है, जो इस किस्म के कट्टरपंथी पैदा करती है। इस चीज को अंग्रेजी में ‘ब्लैस्फमी’ कहते हैं। एक समय था जब ईसाई भी उन लोगों की हत्या किया करते थे, जो उनकी नजरों में ईसा मसीह की बेअदबी करते थे। फिर दुनिया में आधुनिकता आई और इस किस्म की हत्याओं को ईसाई गलत मानने लगे। मगर आज भी इस्लाम में इस किस्म का परिवर्तन नहीं आया है।

अपने देश में भी अगर आज हिंदुत्व कट्टरपंथी दिखते हैं, तो उसका असली कारण है कि देश को इस्लाम के नाम पर तोड़ने के बाद भी जिहादी सोच इन दिनों जगह-जगह फैल रही है। इसके आसार दिखते हैं नौजवान लड़कियों के हिजाब पहनने में और लड़कों की बढ़ती हुई दाढ़ियों में। इस सोच को हिंसा में बदलते देखा है हाल में हमने बंगलुरु के उन दंगों में, जो सिर्फ इसलिए हुए कि सोशल मीडिया पर किसी हिंदू राजनेता के बेटे ने इस्लाम के रसूल के खिलाफ कुछ कहा।

सनातन धर्म वाले अपने देश में ‘ब्लैस्फमी’ के लिए जब हिंदी का शब्द मैंने ढूंढ़ने की कोशिश की तो ईश निंदा मिला। यह शब्द अजीब इसलिए लगता है, क्योंकि किसी भी भारतीय धर्म में इस तरह की सोच ही नहीं है। सनातन धर्म का मतलब यही है कि हर इंसान को अपना इष्ट चुनने का पूरा अधिकार है। लेकिन आज के हिंदुत्व दौर में जिहादी हिंसा को बर्दाश्त नहीं किया जाता है, सो हिंदू-मुसलिम तनाव इतना बढ़ गया है कि खतरे की घंटी बजने लगी है जोर से। इस तनाव पर विराम लगाना जरूरी है, वरना विकास और परिवर्तन के बदले हमारे भविष्य में नफरत और हिंसा होगी। समय आ गया है मुसलिम धर्मगुरुओं और राजनेताओं को मिल-बैठ कर कुछ फैसले लेने का।

मेरी राय में उनका पहला फैसला होना चाहिए कि कृष्ण जन्मभूमि को वापस हिंदुओं को सौंपा जाए। एक साल जन्माष्टमी मैंने वृंदावन में मनाई थी और याद है मुझे कि जब मैंने उस काल कोठरी को देखा, जिसमें हिंदू मानते हैं कि कृष्ण भगवान का जन्म हुआ था और उसके ऊपर देखा एक बड़ी ईदगाह, जिस पर हिंदू श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी हुई थीं, तो मेरे नास्तिक दिल में भी एक अजीब गुस्सा पैदा हुआ। इसी तरह गुस्सा आता है धार्मिक हिंदुओं को जब काशी में विश्वनाथ मंदिर के ऊपर देखते हैं उस विशाल मस्जिद को, जो औरंगजेब ने बनवाई थी। क्यों न तय किया जाए कि इन दोनों धर्मस्थलों को वापस हिंदुओं को देने के बाद मंदिर-मस्जिद के तमाम झगड़े समाप्त किए जाएं?

ऐसा करने के बाद हमारे हिंदू राजनेताओं को यह भी तय करना चाहिए कि बेगुनाह मुसलमानों की ‘लिंचिंग’ करने के बजाय उनके साथ विचारों की लड़ाई लड़नी चाहिए? जैसे फ्रांस के बुनियादी उसूल हैं, उस तरह भारत के भी हैं, जिनमें सनातन धर्म को आधार बना कर हमारे संविधान ने इजाजत दी है हरेक भारतीय को अपना इष्ट चुनने की, लेकिन किसी को इजाजत नहीं दी है धर्म-मजहब के नाम पर किसी की हत्या करने की, सो न यहां हिंदुत्ववादी कट्टरपंथियों के लिए जगह है और न ही जिहादियों के लिए। प्रधानमंत्री वास्तव में परिवर्तन और विकास लाना चाहते हैं, तो उनको खुल कर कहना चाहिए कि भारत तभी विकसित देशों की श्रेणी में आ सकेगा, जब मंदिर-मस्जिद के झगड़ों से हम आगे निकल सकेंगे। सो, देश की दोनों सबसे बड़ी कौमों के रहनुमाओं को मिल कर तय करना पड़ेगा कि यह कैसे समाप्त किया जा सकता है।

देश के अधिकतर लोग इन झगड़ों से आगे निकल चुके हैं। यह इन दिनों बिहार के चुनावों में देखने को मिलता है। आम लोगों से जब पूछा जाता है कि उनकी राय में इस बार सबसे बड़ा मुद्दा क्या है, तो बेझिझक सब कहते हैं कि एक ही मुद्दा है और वह है बेरोजगारी। पटना के बाजारों में इन दिनों दिखते हैं बेरोजगार मजदूरों के थके-हारे चेहरे। राजमिस्त्री हैं इनमें, मिस्त्री हैं, तरखान हैं, जो कभी मुंबई और दिल्ली में अपने हुनर के बल पर अच्छा कमा लेते थे। आज कूड़ा बीन रहे हैं और ढाबों में गंदे बर्तन धोने पर मजबूर हैं ये लोग।

मगर जब योगी आदित्यनाथ जैसे भारतीय जनता पार्टी के आला प्रचारक पहुंचते हैं बिहार के मतदाताओं का वोट मांगने, उनके भाषण भरे रहते हैं राम मंदिर और पाकिस्तान जैसे मुद्दों से। भूल जाते हैं शायद योगी जैसे राजनेता कि मुद्दे आज के दौर में बिल्कुल अलग हैं। भूल जाते हैं यह भी कि भारत के बुनियादी उसूल क्या हैं और उनको सुरक्षित रखना राजनेताओं का प्राथमिक दायित्व है।

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