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वक्त की नब्ज: तमाशा और तमाशेबाज

क्या इतने प्रसिद्ध पत्रकार को नाटकीय ढंग में हिरासत में लेना ठीक था? क्या उसको चुपके से समन नहीं भेजा जा सकता था? क्या उसकी पेशी इस दो साल पुराने मामले में चुपके से नहीं की जा सकती थी? क्या यही सवाल अपने आप से अर्णब पूछते हैं कभी रिया के बारे में?

Republic TV Editor, arnab goswamiरिपब्लिक टीवी के प्रधान संपादक अर्नब गोस्वामी। (पीटीआई)

जिस दिन पुलिस ने अर्नब गोस्वामी को उनके घर से गिरफ्तार किया, मुझे रिया चक्रवर्ती की याद बहुत आई। याद आया कि किस तरह अर्नब ने अपने चैनल को एक अदालत में तब्दील करके उन दिनों इस लड़की को सुशांत सिंह राजपूत की मौत का दोषी ठहराने का प्रयास किया था।

पहले इस टीवी अदालत में साबित करने का प्रयास किया गया कि सुशांत की हत्या की है उसकी इस गर्लफ्रेंड ने उसके पैसे हड़पने के लिए। जब हत्या और चोरी के आरोप साबित करना मुश्किल हुआ तो उस पर सुशांत को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगाया गया अर्णब की अदालत में और अंत में सुशांत के लिए चरस-गांजा खरीदने का आरोप लगा कर पुलिस ने रिया को गिरफ्तार किया। असली अदालत में केंद्र सरकार के वकीलों ने जमानत का विरोध किया और रिया को कई हफ्ते जेल में काटने पड़े।

कुछ ऐसा ही अब हुआ है अर्नब के साथ। इस अति-प्रसिद्ध टीवी एंकर को चौदह दिन के लिए जेल में रखने की कोशिश कर रही है पुलिस और आरोप वही है, जो उसने रिया पर लगाना चाहा था: आत्महत्या के लिए किसी को मजबूर करना। सुशांत के मामले में उसकी मौत के बाद कोई चिट्ठी नहीं मिली थी, जिसमें उसने कोई कारण बताया हो जीवन का यह अंतिम कदम उठाने का। मगर अन्वय नाइक ने अपनी जान लेने से पहले एक पत्र लिखा, जिसमें उसने स्पष्ट किया कि वह और उसकी मां आत्महत्या करने पर मजबूर हुए हैं सिर्फ इसलिए कि उसके तीन ग्राहकों ने उसका पैसा न देकर उसके परिवार को कर्ज में डुबो दिया है। उस पत्र में अर्नब गोस्वामी का भी नाम है, जिसके सामने लिखा है अस्सी लाख रुपए। नाइक इंटीरियर डिजाइनर थे और अर्नब के रिपब्लिक स्टूडियो को सजाने-संवारने का काम उन्होंने किया था।

अब सवाल उठता है कि क्या इतने प्रसिद्ध पत्रकार को नाटकीय ढंग में हिरासत में लेना ठीक था? क्या उसको चुपके से समन नहीं भेजा जा सकता था? क्या उसकी पेशी इस दो साल पुराने मामले में चुपके से नहीं की जा सकती थी? क्या यही सवाल अपने आप से अर्नब पूछते हैं कभी रिया के बारे में? क्या उनको कभी शर्मिंदगी महसूस होती है कि उन्होंने अपनी टीवी अदालत में इस बेबुनियाद आरोप को लेकर इतना हल्ला किया था कि केंद्र सरकार की सबसे महत्त्वपूर्ण जांच एजेंसियां इस आरोप को जांचने में लग गई थीं?

कहना यह चाहती हूं मैं कि न अर्नब के साथ ऐसा होना चाहिए था और न रिया के साथ। नाटकीय ढंग से टीवी पत्रकारों को साथ ले जाकर किसी नागरिक को गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि इस पहले कदम से ही अपनी बेगुनाही साबित करने का बोझ उस तथाकथित अपराधी को करना पड़ता है। यानी पुलिस के ऊपर से उसको अपराधी साबित करने का बोझ हट जाता है। रही बात जमानत की, तो जमानत मिलना हमारा अधिकार है, कोई सरकारी खैरात नहीं।

अर्नब इतने जानेमाने पत्रकार हैं कि न वे भाग सकते हैं और न ही वे गवाहियों में हस्तक्षेप कर सकते हैं, सो उनको जमानत मिलनी चाहिए थी, लेकिन बिल्कुल इसी बिना पर रिया को भी मिलनी चाहिए थी। नहीं मिली अगर तो इसलिए कि महाराष्ट्र सरकार ने उसी तरह इसका विरोध किया जिस तरह केंद्र सरकार ने रिया के मामले में किया था। खेल राजनीतिक यह भी है और वह भी था।

रही बात अर्नब की पत्रकारिता की, तो मैं स्पष्ट शब्दों में कहना चाहती हूं कि अर्नब जिस तरह मोदी सरकार के भोंपू बने हैं, वे पत्रकार न रह कर सरकारी प्रवक्ता बन गए हैं। सबूत इसका उसी दिन मिल गया था, जिस दिन उनकी गिरफ्तारी हुई और नरेंद्र मोदी के वरिष्ठ मंत्रियों ने ट्विटर पर आकर उसके लिए आवाज उठाई। वित्तमंत्री और गृहमंत्री से लेकर छोटे-मोटे भाजपा प्रवक्ता भी ट्विटर पर दिखे अर्नब के लिए गुहार लगाते हुए। मुंबई शहर में आरएसएस के स्वयंसेवकों ने विरोध प्रदर्शन किया। इतनी सरकारी सहायता पहले कभी किसी पत्रकार के लिए नहीं मिली है।

अर्नब ने अपना चैनल शुरू करते ही उसको अदालत का रूप दे दिया था। पहला मुकदमा उन्होंने चलाया कांग्रेस नेता शशि थरूर पर, उनके ऊपर उनकी पत्नी, सुनंदा पुष्कर की हत्या का आरोप लगा कर। रिपब्लिक के पत्रकार कई दिनों तक शशि थरूर के घर पहुंच कर उनकी घेराबंदी करके पूछते दिखते थे कि ‘क्या आपने अपनी पत्नी की हत्या की’। शशि थरूर को गिरफ्तार तो नहीं किया दिल्ली पुलिस ने, लेकिन कई महीनों तक उनको रोज थाने में बुलाया जाता था पूछताछ के लिए। किसी को इस तरह बिना सबूत के बदनाम करना पत्रकारिता नहीं, फौजदारी है। लेकिन इसी तरह की पत्रकारिता के लिए रिपब्लिक चैनल ‘नंबर एक’ बना अंग्रेजी में और बाद में हिंदी में भी।

ऐसा कहने के बाद लेकिन यह भी कहना चाहती हूं कि जो अर्नब के साथ हुआ है, किसी के साथ नहीं होना चाहिए अपने लोकतांत्रिक देश में, जहां हम अपनी न्याय प्रणाली पर गर्व करते हैं। साथ में यह भी कहना होगा कि अर्नब छाप पत्रकारिता भी ‘स्वतंत्र’ मीडिया को इतना बदनाम कर देती है कि मीडिया पर आम आदमी का विश्वास हट जाता है।

दूसरी बात यह है कि जब केंद्र सरकार के सबसे आला मंत्री आपके पक्ष में खुल कर इस तरह बोलते हैं तो आप अपने आप को पत्रकार कहलाने का अधिकार खो देते हैं। इसलिए अर्नब के साथ इतनी सहानुभूति मीडिया से नहीं दिखी उनकी गिरफ्तारी के बाद। रिपब्लिक चैनल की लोकप्रियता देख कर कई अन्य समाचार चैनल उनकी नकल करने लगे हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि अब समाचार चैनल लोग देखते हैं मनोरंजन के लिए। टीवी पत्रकारिता अब तमाशा बन गई है।

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