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वक्त की नब्ज: डरे हुए, डराए हुए

दिल्ली के दंगों का सारा दोष मुसलमानों पर डाल कर गृह मंत्रालय साबित कर रहा है कि भारत के मुसलमानों का डर जायज है। यह डर बढ़ता रहा आने वाले दिनों में, तो इसका असर अर्थव्यवस्था पर दिखने लगेगा।

Delhi Riots, Delhi police, 15 accused, UAPA,उत्तर-पूर्वी दिल्ली में 24 फरवरी को साम्प्रदायिक हिंसा भड़क गई थी, जिसमें 53 लोग मारे गए थे। (फाइल फोटो)

दिल्ली पुलिस के मुताबिक इस साल फरवरी में जो दंगे हुए, वे अन्य दंगों से अलग थे। आम दंगों में हिंदू दंगाई मुसलमानों को मारते हैं और मुसलिम दंगाई हिंदुओं को। जो सत्रह हजार पन्नों का आरोप-पत्र दिल्ली पुलिस ने पेश किया पिछले हफ्ते, उसमें साबित करने की कोशिश की गई है कि इस दंगे में मुसलमानों ने मुसलमानों को मारा। अपने ही लोगों के मकान और दुकानें जलाईं और मस्जिदों पर खुद हमले किए। सो, किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि हिंसा भड़काने के लिए जो गिरफ्तार हुए हैं उनमें ज्यादातर मुसलमान ही हैं। तीस साल बाद दिल्ली में हुए पहले दंगों में तिरपन लोग मारे गए थे, जिनमें आधे से ज्यादा मुसलमान थे, चार मस्जिदें फूंक दी गईं, एक भी मंदिर पर हमला नहीं हुआ। दंगों में ज्यादातर मुसलमानों के घर और दुकानें तोड़ी गईं।

मुझे निजी तौर पर दिल्ली पुलिस का आरोप-पत्र अजीब लगा, क्योंकि जबसे नागरिकता कानून में संशोधन लाया गया था और गृहमंत्री अमित शाह ने आश्वासन दिया था कई भाषण देकर कि इसके बाद लाया जाएगा एनआरसी (भारतीय राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर), मैंने अपने कई लेखों में लिखा था कि संशोधन लाने के पीछे मकसद जो भी रहा होगा, इसने भारतीय मुसलमानों में डर का माहौल पैदा कर दिया है और उनको ज्यादा डर एनआरसी से है, क्योंकि उन्हें अपनी नागरिकता खोने का खतरा लगने लगा है। सीएए-एनआरसी का विरोध जब देश भर में मुसलमान करने लगे तो प्रधानमंत्री ने रामलीला मैदान में कहा कि उनकी सरकार ने एनआरसी लाने की योजना अभी तक बनाई नहीं है। अगले दिन लेकिन उनकी सरकर ने स्पष्ट किया कि एनपीआर (राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर) जरूर बनेगा।

दंगों का असली कारण एनआरसी-सीएए का विरोध था। दिल्ली में जामिया मिल्लिया के छात्रों ने जब सड़कों पर उतर कर इस कानून का विरोध किया तो दिल्ली पुलिस ने विश्वविद्यालय के अंदर जाकर छात्रों की पिटाई की थी। अगले दिन शाहीन बाग में मुसलिम महिलाओं ने सड़क के बीच धरना देना शुरू किया। इन औरतों से जब मैंने बात की तो उन्होंने बताया कि एनआरसी का विरोध इसलिए कर रही हैं, क्योंकि गरीब मुसलिम परिवारों के पास सबूत नहीं होता है अपनी नागरिकता का। यह भी कहा कि जबसे नरेंद्र मोदी की सरकार बनी है तबसे आम मुसलमानों को लगने लगा है कि उनको दूसरे दर्जे के नागरिक बनाने का प्रयास चल रहा है।

याद है मुझे कि मैंने जब इन महिलाओं की बातों के बारे में लिखा तो भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता और समर्थक सोशल मीडिया पर हाथ धोकर मेरे पीछे पड़ गए थे। उसी समय दिल्ली विधानसभा चुनाव का अभियान शुरू हुआ था, जिसमें गृहमंत्री ने खुद कहा था ‘बटन इतनी जोर से दबाना वोट करते समय कि करंट शाहीन बाग में लगे’। सुनियोजित तरीके से भारतीय जनता पार्टी ने साबित करने की कोशिश की थी कि शाहीन बाग में जो महिलाएं विरोध प्रदर्शन कर रही हैं उनको पैसा मिल रहा है जिहादी संस्थाओं से, जो देश को तोड़ना चाहती हैं। चुनाव अभियान में भाषण देते समय वित्त राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर ने ‘देश के गद्दारों को, गोली मारो…’ कहलवाया अपनी एक आमसभा में। दंगा शुरू होने के एक दिन पहले भारतीय जनता पार्टी के कपिल मिश्रा ने धरने पर बैठी मुसलिम महिलाओं को कहा कि ‘ट्रंप को जाने दो, फिर देखना हम क्या करते हैं’।

ऐसा नहीं कि सारा दोष हिंदुओं का था, लेकिन ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि दंगों को जिहादी संस्थाओं ने करवाया सीएए-एनआरसी को बहाना बना कर। मुसलमानों में खौफ का माहौल बना हुआ है लंबे समय से और नफरत फैलाई जा रही है उनके खिलाफ ट्विटर पर उन लोगों द्वारा, जो अपने नाम के साथ लिखते हैं कि उनको गर्व है कि प्रधानमंत्री उनको फॉलो करते हैं। ये वही लोग हैं, जिन्होंने शाहीन बाग को जिहादी साजिश साबित करने की कोशिश की थी। सो, जब दिल्ली पुलिस अपने आरोप-पत्र के तहत सिर्फ मुसलमानों को गिरफ्तार करती है, समझना मुश्किल हो जाता है कि यह न्याय की प्रक्रिया है या अन्याय की।

ऐसा नहीं कि हिंसक, जिहादी संस्थाएं नहीं हैं देश में, जिनका मकसद है भारत के टुकड़े-टुकड़े करना। ऐसी संस्थाएं अवश्य हैं, लेकिन इनका असर अभी तक आम मुसलमानों में उतना नहीं है जितना यूरोप के कई देशों में दिखता है। जिहादी आतंकवाद की घटनाएं भी भारत में इतनी नहीं हुई हैं, जितनी फ्रांस, जर्मनी, स्पेन और इंग्लंड में हुई हैं। मुंबई में 26/11 वाले हमले के पीछे अब साबित हो गया है कि हाथ पाकिस्तानी सेना का था, किसी जिहादी संगठन का नहीं। लेकिन ऐसे संगठन हैं, जिनके सदस्य भारतीय नौजवान हैं। इनका असर बढ़ा है, जबसे हमारी संसद ने पहली बार ऐसा कानून पारित किया, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि मुसलिम शरणार्थियों के लिए भारत के दरवाजे बंद होंगे। हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाइयों के लिए नागरिकता मिलना आसान कर दिया गया है। यानी एक तरह से नागरिकता को हथियार बना दिया गया है। सो, अगर हमारे मुसलिम नागरिक घबरा गए हैं तो उनकी घबराहट को समझने की कोशिश की जानी चाहिए।

दिल्ली के दंगों का सारा दोष मुसलमानों पर डाल कर गृह मंत्रालय साबित कर रहा है कि भारत के मुसलमानों का डर जायज है। यह डर बढ़ता रहा आने वाले दिनों में, तो इसका असर अर्थव्यवस्था पर दिखने लगेगा। एक तरफ प्रधानमंत्री अपने हर दूसरे भाषण में विदेशी निवेशकों को आमंत्रित करते हैं भारत में आकर ‘मेक इन इंडिया’ के लिए, लेकिन कौन आएगा ऐसे देश में, जहां अशांति और अराजकता का माहौल हो? विदेशी निवेशक उन्हीं देशों में जाते हैं जहां उनका निवेश सुरक्षित होता है।

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