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प्रकाश और पर्व: पढ़िए, क्‍यों विशेष है यह दिवाली

यह दिवाली विशेष है। हमें तय करना है कि नफरत, असहिष्णुता और अज्ञान के अंधेरे और आंधी में हमारे ज्ञान और प्रेम का दीपक कितना और कब तक प्रकाश देगा?

यह दिवाली विशेष है। हमें तय करना है कि नफरत, असहिष्णुता और अज्ञान के अंधेरे और आंधी में हमारे ज्ञान और प्रेम का दीपक कितना और कब तक प्रकाश देगा? क्या संवादहीनता के वातावरण में हम अपने हाथ जलाएंगे या अंधेरे के अहंकार को राख कर देंगे? हमारा दीपक प्राचीन है और आधुनिक भी। वह महंगा है और सस्ता भी। वह टिकाऊ है और क्षणभंगुर भी। पर उसकी महत्ता पटाखे, फुलझड़ियों और बाजार के सेल धमाकों से कहीं ज्यादा है। बाजार को धमाके चाहिए, समाज को दीप चाहिए। बाजार को धन चाहिए, समाज को ज्ञान।

आज हमारे दीप चीन से आयात हो रहे हैं। हमारे लक्ष्मी-गणेश भी वहीं से आ रहे हैं। यह हमारे देवी-देवताओं का वैश्वीकरण, बाजारीकरण है और हमारा विश्वबंधुत्व है कि वे कहीं से भी आएं और उन्हें कोई भी बनाए, हम उन्हें उसी तरह सिर माथे पर बिठा रहे हैं। हमें किसी से कुछ सीखने और उसे प्राप्त करने में गुरेज नहीं है। पर हमें यह स्मरण है कि हमने दुनिया से पाया है, उसका कोई न कोई अंश हमारे यहां रहा है। चीन ने सबसे पहले बारूद और पटाखे बनाए। अमेरिका और फ्रांस की क्रांति ने जरूर स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व के मूल्य उत्पन्न किए।

पर संविधान निर्माता भीमराव आंबेडकर ने कहा था कि संविधान के यह मूल्य हमने बुद्ध से लिए हैं। हमारे समाज में गणतंत्र पहले से रहा है। गांधी ने सत्य, अहिंसा और प्रेम के जिन उपकरणों का आजादी की लड़ाई के लिए आविष्कार किया, वे बुद्ध और महावीर के युग में भी थे और रस्किन, थोरो और टॉलस्टाय के युग में भी। दीप की रोशनी के जिस आत्मविश्वास से हमारे विद्वानों और महात्माओं ने यह आह्वान किया था, ‘जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए’, आज वही पुकार क्षीण जरूर हुई है, लेकिन उम्मीद अब भी बाकी है। नया जमाना कह रहा है, ‘एक चिंगारी कहीं से ढूंढ़ लाओ दोस्तों, इस दीये में तेल से भीगी हुई बाती तो है।’

आंबेडकर ने हर भारतीय को एक मर्यादित विमर्श और शांतिपूर्ण सामूहिक निर्णय के लिए एक संविधान दिया तो गांधी ने क्रूर ब्रिटिश साम्राज्य से शिष्ट भाषा में संवाद और सविनय अवज्ञा के माध्यम से संघर्ष का औजार दिया। ज्ञान पर आधारित तर्क, वितर्क, विवेक और विमर्श के जो दीपक हमारे स्वाधीनता संग्राम में लाखों की संख्या में जले थे, वे अचानक अपने लिए तेल और बाती ढूंढ़ रहे हैं। ‘भारत’ शब्द जिस धातु से बना है उसका अर्थ है आलोक में नहाया हुआ। लेकिन अपने उपनिषदों ‘उठो, नींद तोड़ो, विज्ञजन के सहयोग से श्रेष्ठ को पहचानो, विद्वान गंतव्य तक पहुंचने वाले मार्ग को छूरे की धार जैसा तीक्ष्ण बनाते हैं’, जैसा आह्वान है। ‘

उत्तिष्ठ जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत क्षुरस्य धारा निशिता दुख्यया दुर्गम पथस्यत्यकवयो वदंति’, लेकिन हम भूल गए हैं कि छुरे की उस धार पर कैसे चलें। हम उसका उपयोग गंतव्य तक पहुंचने के बजाय एक दूसरे को घायल करने में कर रहे हैं। हम एक दूसरे के दीपक से प्रकाश लेने के बजाय उन्हें बुझाकर उन्हें लूटने में लगे हैं।

ज्ञान प्रकाश है। प्रकाश ऊर्जा है। वह हमें अंधेरे के भय से बचाता है। हम हमें सत्य को देखने का साहस देता है। वह मनुष्य को मनुष्य के करीब लाता है। वह मनुष्य को प्रकृति के करीब लाता है। वह मनुष्य को जीव के करीब ले जाता है। लेकिन, हमने ज्ञान को, तर्क और विवेक की कसौटी पर कसने के बजाय उसे सूचनाओं और घटनाओं का गुलाम बना दिया है। ज्ञान के अभाव ने हमें सूचनाओं और घटनाओं की हिंसा में उलझा दिया है। संस्थाएं व्यक्ति की स्वतंत्रता को दोयम दर्जे का बना रही हैं।

समाज को चलाने के लिए जाति, धर्म और राष्ट्र के जो सिद्धांत हमने गढ़े थे, वे हमें जोड़ने के बजाय तोड़ रहे हैं। स्वार्थ और भावनाओं ने हमारी चेतना को उन संस्थाओं का गुलाम बना दिया है। हम संस्थाओं को बदलने और उसे नया रूप देने चले थे, लेकिन उन्होंने हमें ही बदल दिया। हमने ज्ञान (जिसमें सूचनाएं और घटनाएं प्रधान हो गई हैं) को आत्मध्वंस का साधन बना दिया है। वह समुदाय पर और व्यवस्था पर विजय का साधन बन गया है। वह समझदारी और समन्वय का साधन बनने के बजाय उनके भीतर सभ्यतामूलक संघर्ष पैदा कर रही है।

इतिहास, समाजशास्त्र, कला, संस्कृति और अर्थशास्त्र कहीं भी सहमति और समन्वय का उपाय नहीं बन पा रहा है। एशिया और यूरोप, यूरोप और दक्षिण अमेरिका का सर्वमान्य इतिहास नहीं लिखा जा सकता। उसे छोड़िए, महज एशिया के समाजों के विश्लेषण में सर्वानुमति नहीं है। भारत और चीन, भारत और पश्चिम एशिया का सर्वस्वीकार्य इतिहास लिख पाना असंभव है। भारत और पाकिस्तान के बीच दोनों को स्वीकार्य इतिहास कब लिखा जाएगा ?

सारे मतभेदों को भुला देने और सभी को उदारीकरण वैश्वीकरण के कड़ाह में घोंट देने का दावा करनेवाला नया अभियान युद्ध, आतंकवाद और कट्टरता के किले बना दे रहा है। मनुष्य बेचैन है, सभ्यताएं लहूलुहान हैं। बुद्ध के शब्दों में अप्प दीपो भव, बनना कठिन हो रहा है और नए प्रकाश स्तंभों की बत्ती गुल है। यूरोप के विपरीत भारत की दीप परंपरा की प्रतीकात्मक विशेषता यह है कि यहां अंधकार युग कभी रहा नहीं। यही वजह है कि हमारे यहां ज्ञानोदय जैसे काल निर्धारण की जरूरत नहीं पड़ी। जो लोग अंग्रेजों से अतिप्रभावित थे वे जरूर भारत में रेनेशां और पुनर्जागरण ढूंढ़ते रहे हों, लेकिन उस तरह की जरूरत अंग्रेजों के आने के नाते ही पड़ी। उनके यहां क्रमबद्धता है और रैखिक विकास की परंपरा है।

मध्यकाल के बाद पुनर्जागरण और उसके बाद ज्ञानोदय। ऐसा इसलिए क्योंकि वहां धार्मिक कट्टरता थी। शासक अहमतियों से घबराते थे। सुकरात को जहर दिया गया, ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाया गया और गैलीलियो को फांसी का आदेश हुआ। यूरोपीय ज्ञानोदय के पुरोधा बेकन ने ज्ञान के केंद्र में मनुष्य को रखा था। भारत में मनुष्य को प्रमुख स्थान दिया जाता रहा है लंबे समय से, कम से कम, सिद्धांत रूप में ऐसा ही था। हमारे यहां कहा गया है,‘नहिं मानुषात ही श्रेष्ठतर किंचित्’। पंद्रहवी सदी से यूरोप के आधुनिक युग का आरंभ माना जाता है।

उसके पहले वहां धर्म की सत्ता हावी थी। ज्ञान, विज्ञान, चेतना, प्रोद्योगिकी-सब कुछ धर्म की सत्ता निर्धारित करती रही है। यहां तक पूंजीवाद का विकास भी तभी हुआ जब धार्मिक बंधन टूटे, लेकिन भारत में चौदहवीं से सत्रहवीं सदी के मध्य तक चले भक्ति आंदोलन में वे तमाम मूल्य और गुण मौजूद हैं, जो यूरोपीय ‘ज्ञानोदय’ के माने जाते हैं। उदाहरण के लिए विवेक, तर्क, सहिष्णुता,व्यक्ति सत्ता आदि। उससे भी बड़ी बात है कि भारत में ज्ञान के आलोक को लोक से संबद्ध किया गया है।
यहां शास्त्र की जगह पर लोक को प्रतिष्ठित करने का प्रयत्न है। लेकिन उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन की जिस परंपरा के पुष्प चौदहवीं सदी से खिलते हुए दिखाई देते हैं, उनके पौधरोपण की शुरुआत नवीं-दसवीं सदी से ही हो गई थी। आलवार नयनार का भक्ति आंदोलन उसकी जड़ में है। जब यूरोप स्त्री अधिकारों के बारे में सोच नहीं सकता था तब कन्नड़ की भक्त कवयित्री अक्क महादेवी ने अपने राजा पति की उलाहना से आजिज आकर वस्त्र त्याग दिए थे। पर ऐसा उदाहरण नहीं मिलता कि किसी ने उन्हें प्रताड़ित किया हो या उनकी हत्या का प्रयास किया हो। लेकिन आज जब उसी कन्नड़ समाज में एमएम कलबुर्गी की हत्या होती है तो सिहरन पैदा होती है। उसी तरह की सिहरन तब भी पैदा होती है जब महाराष्ट्र में नरेंद्र दाभोलकर और गोविंद पानसरे को मारा जाता है। बस इतना ही शुक्र है कि यह हत्याएं राज्य ने नहीं करवार्इं। राज्य उन्हें बचा नहीं पाया।

हालांकि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उसी महाराष्ट्र में जब स्वामी दयानंद सरस्वती अपना जुलूस निकालने गए तो कट्टरपंथियों से उनकी रक्षा के लिए ज्योतिबा फुले खड़े हुए। ज्योतिबा ने पुराणों और धर्मशास्त्र की जो कठोर आलोचना की है, वह इक्कीसवीं सदी में भी एक दुस्साहस ही कहा जाएगा, बल्कि बीसवीं सदी में डॉ राममनोहर लोहिया ने स्त्री पुरुष संबंधों और वशिष्ठ, विश्वामित्र, सावित्री, द्रौपदी जैसे पात्रों को नए प्रकार का आदर्श ढूंढ़ना चाहा, वे व्याख्याएं आज के राजनेताओं की समझ और साहस से परे है। जो लोग यह सुनकर चौंक जाते हैं कि मकबूल फिदा हुसेन को रामायण पर चित्रकला बनाने की प्रेरणा डॉक्टर लोहिया ने ही दी थी। आज की कट्टरता देखकर तो लगता है कि न वेदव्यास पुराणों की रचना कर पाते, न वात्स्यायन कामसूत्र लिख पाते और न ही कालीदास कुमारसंभव। प्रकाश, जिसे हम ज्ञान का प्रतीक और पर्याय मान कर चल रहे हैं उसका संबंध मुक्ति से है।

हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इसे जड़ता से, अज्ञान से, परामुखोपक्षिता से, दंभ से, अहंकार से दासत्व से मुक्ति कहा है। क्या हम दीपावली को इन अर्थों में मनाने को तैयार हैं? या इस दीपावली को इन रूपों में मना पाएंगे? पिछली सदी में भारत में कंप्यूटर क्रांति की पहल करने वाले और भारी बहुमत से सत्ता में पहुंचने वाले राजीव गांधी अक्सर कहते थे कि हमें इक्कीसवीं सदी में जाना है। एक दिन उनसे चुटकी लेते हुए अटल बिहारी वाजपेयी ने पूछा कि अकेले ही जाना है या हमें भी ले चलेंगे? उसी संदर्भ में आज के शासक से भी पूछा जा सकता है कि तमाम अज्ञान, अहंकार और कटुता कट्टरता का बोझ लेकर हम कैसे विश्व गुरु बन पाएंगे, कैसे महाशक्ति बन पाएंगे? या कहीं यह दावा भी एक शेखचिल्लीपन ही है?

बेकन ने ‘ज्ञान’ और ‘शक्ति’ को एक दूसरे का पर्याय कहा है। आज शक्ति ही ज्ञान है। ज्ञान और शक्ति के इसी अहंकार ने ब्राह्मणों में कट्टरता पैदा की और उसी के चलते कम्युनिस्टों ने तानाशाही की शुरुआत की। सत्ता के घमंड ने नाजीवाद और फासीवाद को जन्म दिया।

भारत में अगर ज्ञान की सत्ता ने ब्राह्मणों को पतित बनाया तो ‘सत्ता का ज्ञान’ गैर-ब्राह्मणों को पतित कर रहा है। बिहार चुनाव में भाषा का स्तर हो या उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनावों में अपराधीकरण के रूप में लोकतंत्र का पतन। इतिहास की पक्षपातपूर्ण व्याख्या से अगर कई नायकों की उपेक्षा हुई तो आज कई नायकों को खलनायक बनाया जा रहा है। जबकि इस दौर में वैसे किसी नायक को पैदा करने का न तो प्रयास है और न ही सामर्थ्य।

दीपावली का संबंध राम-रावण युद्ध की समाप्ति, समुद्र मंथन, दुर्गा की विजय, राम की अयोध्या वापसी और कृष्ण के निधन से है। यह सब महज अन्याय पर न्याय की अधर्म पर धर्म की और धन और ज्ञान की सत्ता पर नैतिकता और मर्यादा की विजय का पर्व ही नहीं है, बल्कि तमाम तरह के द्वंद्वों की समाप्ति का समय भी है। क्या हम न्याय का ऐसा सिद्धांत विकसित कर रहे हैं जिसमें इन द्वंद्वों को मिटाने का प्रयास है? दीपावली को धन, सत्ता और ज्ञान के अहंकार का पर्व न बनाएं उसे सबकी खुशी और सभी के समभाव का अवसर बनाएं। दीप जलाएं पर न तो किसी का दिल जलाने के लिए और न ही अपना हाथ जलाने के लिए। इस दिवाली को विशेष बनाएं और ज्ञान, प्रेम और लोक कल्याण का प्रकाश फैलाएं।

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