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वक़्त की नब्ज़ : आधुनिकता बनाम बर्बरता

दादरी के बिसारा गांव में मोहम्मद अखलाक की हत्या के लिए जो माहौल बनाया गया, उसमें इन सबका हाथ था। शुरुआत महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने की, गोश्त की बिक्री पर पाबंदी लगा कर जैनियों के पर्यूषण पर्व के बहाने..

Author नई दिल्ली | Updated: October 4, 2015 11:13 AM

इस सप्ताह इरादा तो था मेरा विदेश मंत्री के संयुक्त राष्ट्र में दिए बेहतरीन भाषण का विश्लेषण करने का, लेकिन दादरी की घटना बीच में आ गई। नहीं मिटा सकी मन से मोहम्मद अखलाक की बीवी, बच्चों की तस्वीरें, नहीं दूर कर सकी उसके बर्बाद घर की तस्वीरें, नहीं भुला सकी उसकी बर्बर, बेमतलब हत्या। याद आया यह भी कि इस हत्या से अगर कुछ अच्छा हो सकता है, तो यह कि प्रधानमंत्री को मौका मिला है अपने दुश्मनों को रोकने का। दुश्मन उनके अपने घर में हैं, कहीं और नहीं। इसलिए कि परिवर्तन और विकास के रास्ते से उनको उतारने का काम कर रहे हैं उनके अपने मुख्यमंत्री, मंत्री और संघ के उनके पुराने साथी।

मोहम्मद अखलाक की हत्या के लिए जो माहौल बनाया गया, उसमें इन सबका हाथ था। शुरुआत महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने की, गोश्त की बिक्री पर पाबंदी लगा कर जैनियों के पर्यूषण पर्व के बहाने। इस प्रतिबंध की आलोचना जब शुरू हुई, तो मुख्यमंत्री ने याद दिलाया कि ऐसा प्रतिबंध मुंबई में लगता रहा है 1994 से, लेकिन भूल गए कि इस बार जमीन पहले से उन्होंने तैयार कर रखी थी बीफ पर प्रतिबंध लगा कर। इन दोनों चीजों से इशारा आम लोगों को यही मिला कि मुसलमान जिम्मेवार हैं इस सारे व्यवसाय के लिए। महाराष्ट्र के बाद भारतीय जनता पार्टी के अन्य मुख्यमंत्रियों ने भी गोश्त की बिक्री पर प्रतिबंध लगाना शुरू किया और ऐसा करके मुसलमान निशाना बनते गए। तो क्यों न एक ऐसे गांव में पहला शिकार हो, जहां दो-चार ही मुसलिम घर थे?

उत्तर प्रदेश के बिसारा गांव में जो हुआ उसने दुनिया को याद दिलाया कि हमारे प्रधानमंत्री सिलिकॉन वैली में चाहे कुछ भी कहें, भारत की आधुनिकता सिर्फ एक कमजोर चादर है, जिसके नीचे छिपी है वही पुरानी बर्बरता और वही पुरानी मानसिकता, जिसने इस देश को आगे बढ़ने से रोका है।

प्रधानमंत्री डिजिटल भारत का सपना साकार करने का प्रयास कर रहे हैं, यह भूल कर कि यह सपना बेमतलब है अगर दिल्ली की सीमा पर बसे गांव में पुलिस हिंसक भीड़ को रोक नहीं सकती है। अचानक नहीं इकट्ठा हुए अखलाक के हत्यारे। पूरी तैयारी थी उनकी कई दिनों से डिजिटल तरीकों के जरिए। वाट्सऐप पर लोगों को गोहत्या की झूठी खबरें दी गर्इं, अफवाहें फैलाई गर्इं, लेकिन इन सारी बातों से बेखबर रही पुलिस और जिला प्रशासन। यह कैसे हुआ? अगर डिजिटल तरीकों का इस्तेमाल सिर्फ गलत चीजों के लिए होगा, तो हममें और आइएसआइएस के बर्बर जिहादियों में क्या फर्क है?

दादरी की इस दर्दनाक घटना से यह भी स्पष्ट हुआ है कि प्रधानमंत्री के अपने साथी उनके साथ नहीं हैं। एक तरफ मोदी कहते हैं कि वे ‘सबका साथ, सबका विकास’ चाहते हैं और दूसरी तरफ हैं भारतीय जनता पार्टी के स्थानीय नेता, जो अखलाक की हत्या को जायज साबित करने में लगे रहे हैं। दादरी के पूर्व विधायक ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अगर अखलाक के फ्रिज में मिला गोश्त गाय का निकला, तो हत्यारों का गुस्सा समझ में आता है। यह कहने के बाद हत्यारों को रिहा कराने में लग गए। भाजपा के अन्य स्थानीय राजनेताओं ने भी अखलाक की हत्या को अलग-अलग तरीकों से जायज ठहराने की कोशिश की। किसी ने अगर कहा कि नौजवानों के ‘एक्साइटमेंट’ की वजह से हत्या हुई, तो किसी और ने हत्या को ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ कह कर टाल दिया।

कैसे लोग हैं ये? कहां है इनकी इंसानियत? वहां अखलाक का टूटा-हारा परिवार गांव छोड़ कर जाने को मजबूर हो गया है और यहां ऐसी बातें हो रही हैं जैसे कुछ हुआ ही नहीं। प्रधानमंत्री अब भी आपके कानों में बज नहीं रही है खतरे की घंटी तो आपको दिख नहीं रहा है कि आपका जनादेश चोरी कर रहे हैं ऐसे लोग, जो अपनी सीट न जीत सकते, अगर अपने बल पर लड़ते।

पूर्ण बहुमत तीस साल बाद अगर किसी प्रधानमंत्री को मिला है, तो इसलिए कि परिवर्तन और विकास की बातें मतदाताओं को बहुत अच्छी लगीं। मुझे याद है कि जब मोदी कानपुर आए थे अक्तूबर 2013 में उत्तर भारत में अपनी पहली जनसभा को संबोधित करने, तो वहां भगवा पटका पहने कुछ नौजवानों ने जय श्रीराम के जब नारे लगाए तो लोगों ने कहा, ‘ये नारे अगर लगेंगे तो भारतीय जनता पार्टी नहीं जीतेगी।’ मंच पर थे उत्तर प्रदेश के तमाम बड़े नेता, जिनके भाषण जनता सुनने को तैयार ही नहीं थी।

ये बातें मोदी को भी याद होंगी, इसलिए समझ में नहीं आता है क्यों प्रधानमंत्री बन जाने के बाद उन्होंने घर वापसी जैसे आंदोलन नहीं रोके। समझ में नहीं आता है क्यों नहीं अपने उन मंत्रियों को बर्खास्त किया, जिन्होंने गंदे, सांप्रदायिक बयान दिए। जब भारत सरकार के मंत्री ही ‘रामजादे, हरामजादे’ जैसी बातें कर सकते हैं, तो क्यों न अनपढ़, देहाती गांवों को ऐसा लगे कि हिंदुत्व को सुरक्षित रखने के लिए अखलाक जैसे मुसलमानों को मारना जरूरी है?

अब भी अगर प्रधानमंत्री अपने मंत्रियों, सांसदों और संघ के पुराने साथियों को रोकने का काम नहीं करते हैं, तो एक-दो चीजें बिल्कुल तय हैं। एक यह कि परिवर्तन का वह सपना कभी पूरा नहीं होने वाला है और दूसरा यह कि देश के विकास के लिए जो निवेश हमको चाहिए, वह नहीं आने वाला है। विदेशी निवेशक उन देशों में निवेश करने नहीं जाते हैं, जहां जंगल राज का प्रभाव उस देश की राजधानी की सीमाओं तक पहुंच जाता है। अखलाक की हत्या के बाद कई भाजपा नेताओं ने दोष अखिलेश यादव की सरकार पर डालने की कोशिश की। भूल गए थे शायद कि दुनिया की नजरों में आजकल भारत का एक ही राजनेता है। उसका नाम है नरेंद्र मोदी।

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