ताज़ा खबर
 

कलाः संप्रेषण का संकट

हाल के वर्षों में दुनिया-भर के कलाकारों, कलाविदों और कला-समीक्षकों ने गंभीर चिंता व्यक्त की है कि नए उपभोक्ता-समाज में कला की संप्रेषणीयता का संकट उत्पन्न हो गया है।

Author January 22, 2017 2:39 AM

ज्योतिष जोशी

कला-कर्म केवल मानवीय न रह कर व्यावसायिक क्रिया-व्यापार बनता गया है, जिसमें संकट उस हर कलाकार के लिए है, जो अपनी ‘निजता और स्वत्व’ की शर्तों पर सृजन को महत्त्व देता है; क्योंकि उसके लिए, उसकी मनस्विता के लिए आज कोई ऐसा समुदाय शेष नहीं रह गया है, जिसमें उसका कलात्मक संप्रेषण सहजता से संभव हो पाए।

हाल के वर्षों में दुनिया-भर के कलाकारों, कलाविदों और कला-समीक्षकों ने गंभीर चिंता व्यक्त की है कि नए उपभोक्ता-समाज में कला की संप्रेषणीयता का संकट उत्पन्न हो गया है। यह चिंता केवल ललित कला तक सीमित नहीं है। समग्र कलारूपों में संप्रेषण की मुश्किलें खड़ी हुई हैं। अर्थ-केंद्रीयता से निर्मित समाजों में जैसे-जैसे पैसे का प्रभुत्व बढ़ रहा है, कला अपनी जातीय पहचान खोकर प्रचलन और मांग का शिकार हो रही है। आज का मानव-समुदाय अपनी आकांक्षाओं, मूल्यों, संस्कारों और रुचियों में असंख्य धड़ों में विभाजित और विखंडित है, वह एकाकी और शिथिल भी है। कलाकारों में भी अधिकतर ऐसे हैं या परिस्थितिवश ऐसे बना दिए गए हैं, जो अपनी सृजनात्मक क्षमताओं और वैयक्तिक दृष्टियों से बनी निर्मितियों के बदले उन प्रचलित विषयों की ओर उन्मुख हो रहे हैं, जिनकी या तो ‘मांग’ है या जिनकी पूर्ति कर वे अपने कलाकार होने को प्रमाणित कर सकें या फिर भौतिक रूप से समृद्ध होने का सुख लें। ऐसा करते हुए कलाकार को आत्मिक सुख मिलता है और वह परम संतोष का अनुभव करता है- ऐसा नहीं है। कई बार तो ऐसा करते हुए वह अपने अंत:करण को खंडित पाता है, क्षुब्ध होता है और अपनी कलात्मक इयत्ता पर व्यथित होता है, पर परिस्थितियां जब उसे उल्टी दिशा में हांक देती हंै, तो प्रतिरोध उससे करते नहीं बनता।

सच्चाई है कि जिन कला-अभ्यासों को बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में कला मानने से भी इनकार किया जाता रहा, उन्हें न केवल आज स्वीकार, बल्कि उन्हें विश्वकला-विरासत की एक बहुमूल्य परंपरा मान लिया गया है। निश्चय ही यह प्रवृत्ति पश्चिमी कला-चिंतन की देन है, जिसने कलाओं को अपनी दृष्टि, पद्धति और आवश्यकताओं के अनुरूप समझने और व्याख्यायित करने की अनवरत कुचेष्टा की है।

इसके साथ एक तथ्य यह भी है, जिस पर पूरब और पश्चिम के कला-चिंतकों की एक स्वर से सहमति है कि कला को एक अनिवार्य बौद्धिक क्रिया में बदलने की प्रक्रिया यूरोपीय नवजागरण से शुरू हुई, जिसे धीरे-धीरे कला-संग्रहालयों और दीर्घाओं के विकास ने एक पुष्ट आधार दिया। कला-इतिहास की रचना, कला-दर्शन की तात्त्विक मीमांसा और कला-आलोचना के प्रतिमानों की निर्मिति इन संग्रहालयों और दीर्घाओं के ही समेकित प्रयास से संभव हुआ, जो आगे चल कर कला और कला विमर्श का अनिवार्य हिस्सा बने। संग्रहालयों और दीर्घाओं द्वारा आरंभ हुए कला-विमर्श का चिंतन से कम और व्यावसायिकता से अधिक गहरा संबंध था। इस बौद्धिक कला-विमर्श से संग्रहालयों की पूंजी बढ़ी, कलाकारों और कला से संबद्ध लोगों में भी इस कला-ज्ञान की ललक बढ़ी, जिसके बिना कला के बौद्धिक परिवेश में उन्हें आसानी से स्वीकृति न मिलने का भय था।

इस प्रक्रिया के व्यापक प्रसार से ही कला में कलाकार के अंतर्मन और उसकी दृष्टि के साथ-साथ सौंदर्य, अनुरक्ति और सृजनात्मक कुशलता की अनवरत साधना से अर्जित क्षमता का कोई मूल्य नहीं रह गया। मूल्य रह गया उसका, जिसे कला का बौद्धिक जगत अपने प्रतिमानों से तोल कर श्रेष्ठ मानता था। कृति की श्रेष्ठता का आधार बौद्धिक कला-विमर्श से संबद्ध समुदाय, उस समुदाय से संबद्ध विचारधारा और उस विचारधारा से संबद्ध देश या देशों का मंडल था, जो बाद में कला के व्यावसायिक निगमों में परिवर्तित हो गया। भूमंडलीकरण के विकास ने केवल वस्तुओं का बाजार नहीं बनाया, उसने कला को एक उपभोक्ता-सामग्री के रूप में भी प्रस्तुत किया है, जिसे जो चाहे खरीद ले, जो चाहे वह कलाकार से मांग करे; कीमत निगमों द्वारा तय होगी, संग्रहालय और दीर्घाएं कलाकार को प्रायोजित करेंगी और प्रश्रय भी देंगी।
इस तरह कला-कर्म केवल मानवीय न रह कर व्यावसायिक क्रिया-व्यापार बनता गया है, जिसमें संकट उस हर कलाकार के लिए है, जो अपनी ‘निजता और स्वत्व’ की शर्तों पर सृजन को महत्त्व देता है; क्योंकि उसके लिए, उसकी मनस्विता के लिए आज कोई ऐसा समुदाय शेष नहीं रह गया है, जिसमें उसका कलात्मक संप्रेषण सहजता से संभव हो पाए। यह कम हैरानी की बात नहीं है कि ‘कला’ के क्षेत्र में पूंजी निवेश करना आज बहुत लाभप्रद हो गया है और कलाकार आसानी से पूंजी निवेश का ‘शिकार’ बन कर अपने को धन्य मान बैठा है।
कला के क्षेत्र में विविध प्रकार की तकनीकों, प्रयोगों प्रविधियों और संयोजनों के स्तर पर बदलाव का आग्रह अरसे से व्यावसायिकता की पूर्ति की दिशा में की गई साजिश ही है, जिसे कभी गंभीरता से देखने-परखने की चेष्टा नहीं की गई। इससे कला की मूलभूत छवि, उसकी जातीय निर्मिति को जितनी क्षति पहुंची है, उतनी किसी और कारण से नहीं। ऐसा क्यों है कि अब नैसर्गिक प्रतिभा नई तकनीकों की धुंध में खो गई लगती है? क्यों कलाकृति को उसके सृजनात्मक आयामों और परिवेश की संचित विश्वदृष्टि के अंतर्गत नहीं देखा जाता? वह क्यों आज एक उपभोक्ता-उत्पाद मान ली जाती है? अगर किसी उपभोक्ता समाज की तात्कालिकता को वह कृति व्यक्त करती है, तभी वह ‘उत्पाद’ भी है, वरना एक निरर्थक क्रिया है। क्या यह संप्रेषण का संकट नहीं है?
इस संकट की गंभीरता को देखते हुए पश्चिम में भी इसका प्रतिरोध बहुत पहले शुरू हो गया था। जब किसी भी कलाकृति का मूल्यांकन उसकी ‘अंतर्निहित सामर्थ्य’ से बाहर अपने तर्कों और निकषों पर किया जाने लगता है, तब भले लगता है कि कला को नए संदर्भों में समझने की कोशिश हो रही है, पर यह एक कुचेष्टा होती है, कला को अपने अनुकूल मानने या समझने की, और इसी से ‘कलाहीनता’ का भयानक वातावरण बनता है। 1917 में जब मार्शल डूसां ने चीनी मिट्टी के एक ‘यूरिनल’ को न्यूयॉर्क की एक प्रदर्शनी में प्रदर्शित करने के लिए ‘फव्वारा’ शीर्षक से भेजा था, तो उनका यह एक जबर्दस्त प्रतिरोध ही था। उनका स्पष्ट कहना था कि जब कला एक अवधारणा-मात्र है और उसे संग्रहालयों में ही अपना संदर्भ पाना है, तो इससे क्या पर्क पड़ता है कि कलकार क्या सृजित कर रहा है और उसे क्या नाम दे रहा है!

प्रतिरोध की यह प्रक्रिया संग्रहालयों और कला के व्यावसायिक निगमों के विरुद्ध पिछले सौ वर्ष से जारी है और हैरत यह है कि यह प्रतिरोध भी उन्हीं हिस्सों में प्रभावी रहा है, जहां ‘कला’ को नियंत्रित करने के सिद्धांत गढ़े जाते रहे हैं। 1970 में भी अनेक कलाकारों ने न्यूयॉर्क के एक संग्रहालय की सीढ़ियों पर धरना देकर मांग की थी कि ‘संग्रहालयों’ को बंद कर दिया जाए। लंदन, पेरिस, मास्को आदि नगरों में भी ऐसे प्रदर्शन खूब हुए हैं, जिनमें कलाकारों की ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ और उनकी ‘अस्मिता’ पर हावी होते बाजार तंत्र का जबर्दस्त विरोध किया गया है।

कला में ‘संरक्षण’ और प्रश्रय देने की पद्धति को अंगरेजी शासन की एक ऐसी नीति के तहत देखना चाहिए, जो अपने उपनिवेशों को ठीक समझने के लिए खोजी गई थी। यही पद्धति क्रमश: पश्चिम के लिए एक ऐसा हथियार बनती गई है, जिससे वह जिसका जैसा चाहे शिकार कर सकता है। सभ्यताओं की मीमांसा का अधिकार अब उन्हें है, जिनके पास अकूत आर्थिक संसाधन हैं, पूरी दुनिया को निचोड़ लेने की क्षमता है और अपने आर्थिक हितों के लिए भारी मानवीय तबाही फैलाना जिनके लिए चुटकी का खेल है। यह संकट दरअसल, उसी कला के लिए अधिक है, जो उपभोक्ता समाज के लिए ‘उपभोग की वस्तु’ बन जाने की नियति से प्रेरित है, जो कला अपने को नैतिक बनाए रखने के लिए हर संभव खतरों का सामना करने को प्रतिबद्ध रही है, उसके लिए तात्कालिक दबावों का कोई अर्थ नहीं होता। कला मनुष्यता की उपस्थिति है, वह रहेगी, बनी रहेगी और रचे जाकर अपना संपूर्ण अर्थ पाएगी अवश्य, अगर उसकी कसौटी आत्मा होगी, मुद्रा नहीं।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App