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योग दर्शन: वायु ध्यान के आयाम

ध्यान की अनेक विधि है और ध्यान का केवल एक ही लक्ष्य नहीं बल्कि अनेक लक्ष्य हो सकते हैं। अलग-अलग ध्यान की विधि के अलग-अलग लाभ और लक्ष्य हो सकते हैं। वायु तत्व पर ध्यान लगाने की विधि का वर्णन यहां सरल रूप से किया जा रहा है।

Author Published on: May 24, 2020 12:17 AM
ध्यान की अनेक विधि है और ध्यान का केवल एक ही लक्ष्य नहीं बल्कि अनेक लक्ष्य हो सकते हैं।

डॉ. वरुण वीर
पंचतत्व में वायु तत्व का स्थान दूसरा है और यह बहुत शक्तिशाली भी है। बिना भोजन के व्यक्ति कई दिनों तक जीवित रह सकता है लेकिन वायु के बिना जीवन कुछ मिनटों तक भी नहीं चल सकता है। वायु ही प्राणशक्ति का वहन कर समस्त पृथ्वी पर जीवन प्रदान करती है और इसी के सहयोग से अन्य तत्व अग्नि, जल, तथा पृथ्वी की उत्पत्ति एवं विकास क्रम से होता है। शुद्ध वायु में एक प्रकार से परम उपयोगी तत्व ओजोन मिला होता है जो जंगल, पहाड़ और समुद्र के किनारे की वायु में ही अधिक पाया जाता है। ओजोन की गंध तीव्र होती है तथा अस्थमा रोगियों का उपचार तथा रक्षा इस ओजोन से भलीभांति होती है। वेद में तो वायु को परम औषधि माना गया है।

वात आ वातु भेषजं शंभु
मयार्भुवोहृदे प्रण आयूषि तारिषत्॥ (ऋग्वेद)

शुद्ध वायु हमारे हृदय में शांति देने वाला हो तथा सुख देना वाला होकर हमारे पास बहता रहे और हमारी आयु को दीर्घ करें।
यददो वात ते गहे मृतस्य निर्धिहित:
ततोनो देहि जीवसे॥ (ऋग्वेद)

हे वायु! तेरे घर में जो अमृत का खजाना है, उसमें से थोड़ा सा हमारे लंबे सुखमय जीवन के लिए प्रदान कर। जिस प्रकार से हम नाक से सांस लेते हैं उसी प्रकार से हमारे शरीर का एक-एक रोम कूप भी शुद्ध-स्वच्छ सांस को अनुभव करता है। वायु का स्वभाव चंचलता, गुण में हल्का, रुक्ष, चलायमान है। वायु तत्व पर ध्यान लगाने से मस्तिष्क में ऊर्जा का संचार होता है। आलस्य दूर होना, काम को टालने की आदत तथा शरीर और मन का ढीलापन दूर होता है।

ध्यान की अनेक विधि है और ध्यान का केवल एक ही लक्ष्य नहीं बल्कि अनेक लक्ष्य हो सकते हैं। अलग-अलग ध्यान की विधि के अलग-अलग लाभ और लक्ष्य हो सकते हैं। वायु तत्व पर ध्यान लगाने की विधि का वर्णन यहां सरल रूप से किया जा रहा है।

वायु ध्यान : विधि-1
सुखपूर्वक स्वच्छ व शुद्ध वातावरण में बैठें। सभी ध्यान करने से पहले दस बार श्वास-प्रश्वास से आरंभ करें। कुछ समय के लिए खुली आंखों से अपने चारों ओर के वातावरण को निहारें। यदि हवा बह रही है, पक्षी उड़ रहे हैं, चहचहा रहे हैं तो इन सभी गतिविधियों को ध्यान से अनुभव करें। अब इसी प्रकार यह सभी कुछ बंद आंखों से अनुभव करें कि वायु का स्पर्श शरीर को छू रहा है, चारों ओर शुद्ध सात्विक तथा स्वच्छ वायु का वास है, वह वायु पेड़, पौधे, जल इत्यादि पदार्थों को जीवन प्रदान कर रही है।
पांच मिनट खुली आंखों से तथा 15 मिनट बंद आंखों से वायु तत्व का ध्यान करें। शरीर के भीतर पांच मुख्य प्राण कार्य करते हैं। प्रत्येक प्राण का अपना-अपना अलग-अलग कार्य है। मुख्य प्राण इस प्रकार से हैं- प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान।

प्राण वायु ध्यान : विधि- 2
प्राण वायु का स्थान हृदय है। यह सात छिद्रों, एक मुख, दो नाक, दो कान, दो आंख के जरिए अंदर से गंदे परमाणुओं को बाहर फेंकता है। सुखासन में बैठकर अपने अनाहत चक्र पर ध्यान केंद्रित करें और प्राण वायु के प्रभाव को वहां अनुभव करें। हृदय, आत्मा का निवास स्थान भी माना जाता है। इसे चिरा का भी कहते हैं। हृदय चक्र ही है, जहां आत्मा से परमात्मा का मिलन होता है। ध्यान में अपने हृदय की आकृति और उसकी गति के साथ यह अनुभव करें कि हृदय प्रतिपल शुद्ध रक्त को समस्त शरीर में भेज रहा है और यह कार्य बिना रुके जन्म से मृत्यु तक चलता रहता है। यह सब ध्यान के माध्यम से अनुभव करने से हृदय शक्तिशाली बनता है।

अपान वायु ध्यान : विधि-3
अपान वायु का स्थान नाभि में है। यह बाहर से भीतर शुद्ध वायु को लाता है और गंदे वायु तथा मल-मूत्र को गुदा और उपस्थ इंद्रियों द्वारा बाहर निकालता है। स्त्री अपान वायु के कारण वीर्य को गर्भाधान के समय गर्भ में धारण करती है। ध्यान को नाभि पर केंद्रित करें। इसे मणिपुर चक्र कहा जाता है। ध्यान में अनुभव करना है कि शरीर की दूषित वायु अपान वायु के कारण बाहर निकलती है। इस ध्यान में मूलाधार स्वाधिष्ठान तथा मणिपुर चक्र पर ध्यान केंद्रित कर अपान वायु के कार्य को गहन रूप से अध्ययन कर अनुभव करना चाहिए। इस ध्यान से कामशक्ति मजबूत होती है। इस ध्यान को करते समय मूलबंध का प्रयोग करना यौन शक्तिको बढ़ाता है।

समान वायु ध्यान : विधि-4
इस वायु का स्थान हृदय से लेकर नाभि तक के अवकाश में है। यह शरीर में सर्वत्र रस पहुंचाता, भोजन को पचाकर तथा रस बनाकर उसे अस्थि, मज्जा, चर्म बनाने वाली नाड़ियों को अलग-अलग देता है। जो भी अन्न-जल ग्रहण किया जाता है उसका परिणाम 40 दिन बाद वीर्य के रूप में मिलता है। सुखासन में बैठते हुए ध्यान नाभि तथा हृदय के बीच में केंद्रित करें। ध्यान को थोड़ी-थोड़ी देर के लिए हृदय चक्र से मणिपुर चक्र तक सहज भाव से लाना चाहिए। इस दौरान सांस की गति अत्यंत शांत रहे। यहां तक कि साधक को अपनी सांस की आवाज तक नहीं आनी चाहिए। इस ध्यान में उस ऊर्जा पर ध्यान केंद्रित करें जो भोजन से मिलती है। यही वायु ऊर्जा को उत्पन्न कर पूरे शरीर को भेजती है।

उदान वायु ध्यान : विधि-5
इस वायु का स्थान कंठ में है और वह इसी उदान वायु के कारण अन्न-जल को भीतर खींच कर सामान वायु को सौंप देता है। इसको ‘यम’ भी कहते हैं क्योंकि मृत्यु के समय यह अन्न-जल ग्रहण नहीं करता है तथा मृत प्राणी की जीवात्मा को उसके कर्मों के अनुसार यथायोग्य भोगों के स्थान पर पहुंचा देता है। सोते समय सत्व गुणी गहरी नींद में आत्मा को परमात्मा के आधार में स्थित कर देता है तब जीव को गहरे आनंद की अनुभूति होती है, जिसे जीव जान नहीं पाता कि ऐसा आनंद कैसे हुआ? सुखासन में बैठ ध्यान कंठ विशुद्धि चक्र पर केंद्रित करें तथा ‘ॐ ध्वनि’ का उच्चारण बंद मुख से करें। इससे रीढ़ की हड्डी में कंपन उत्पन्न होगा, उस पर ध्यान केंद्रित होने से जो आध्यात्मिक ऊर्जा उत्पन्न होगी, उसे सूक्ष्म रूप से अनुभव करें। इस ध्यान को करने से नींद अच्छी और गहरी आती है। ध्यान रहे कि ध्यान में यदि उज्जाई प्राणायाम किया जाए तो लाभ और भी अधिक बढ़ जाता है।

व्यान वायु ध्यान : विधि-6
व्यान वायु शरीर के प्रत्येक कोने में विद्यमान है। इसके कारण शरीर में चेष्टा आदि कर्म मन के सहयोग से होते हैं। सामान्य वायु द्वारा बनाया हुआ रस रक्तबनकर व्यान वायु द्वारा शरीर में भिन्न-भिन्न नाड़ियों द्वारा संचरण करता है। व्यान वायु के कार्यों पर ध्यान केंद्रित करना तथा अपने ध्यान को एक-एक नाड़ी पर केंद्रित कर उसके अंदर प्रवाहित व्यान प्राण को अनुभव करना है। संपूर्ण देह में जो रक्त प्रवाह हो रहा है, जो हमेशा बहता ही रहता है, कभी रुकता नहीं है, यह केवल व्यान वायु के कारण बह रहा है, यह अनुभव करने के साथ अपने ध्यान को नाड़ियों के भीतर बह रहे रक्त पर केंद्रित करना चाहिए। पांचों प्राण पर ध्यान केंद्रित करने से उनका लाभ भी अलग-अलग मिलता है। योग दर्शन में प्राणायाम, जिसका सीधा संबंध वायु से है; अत्यधिक महत्त्वपूर्ण अंग है। प्राणायाम के बिना ध्यान तथा आत्मसाक्षात्कार संभव नहीं ह,ै इसी कारण से महर्षि पतंजलि ने प्राणायाम को अत्यधिक महत्त्वपूर्ण माना है।

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