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बाखबर: उदारवादी जलेबी

हजार बस लगा कर कांगे्रस योगी जी की ‘मजदूर सेवा’ मे सेंध लगाना चाहती थी, लेकिन यारों ने उसकी सेंध में ही सेंधमारी कर दी! मुद्दा गरीब मजदूरों की मदद का न रह कर बसों की गिनती का हो गया!

बसों को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार और कांग्रेस में गतिरोध जारी है।(indian express photo)

पूर्णबंदी खोली जा रही है। इधर वित्तमंत्री जी चार-पांच दिन तक चैनलों में ठीक चार बजे आकर आर्थिक पैकेज की किश्तें देने लगतीं, उधर रोज के वित्त-दर्शन से चिढ़ कर विपक्ष ‘पैकेज शो’ को वित्तमंत्री का ‘सीरियल शो’ कहने लगता। इसके बाद पैकेज की कुटाई शुरू हो जाती।

एक ओर पैकेज का गुणगान करने वाले पधार जाते हैं, दूसरी ओर पैकेज के निंदक पधार जाते हैं। पक्ष-प्रवक्ता कहते हैं कि बीस लाख करोड़ का ‘बूस्टर शॉट’ बंद अर्थव्यवस्था को तेजी से दौड़ाएगा, लेकिन विपक्षी प्रवक्ता कहते हैं कि यह बीस लाख करोड़ का कहां है, यह तो ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ है। असल में सिर्फ चार लाख करोड़ का है, बाकी तो पुराने ऐलानों का मिश्रण है। नई बोतल में पुरानी शराब है।

एक श्रेय लेना चाहता है, तो दूसरा उसे श्रीहीन करने पर तुला रहता है। चैनल चर्चाओं में यही होता रहता है!
एक दिन राहुल भाई अपने नए ‘हेअर कट’ के साथ आकर मीडिया से कहते हैं कि सरकार साहूकार बन कर सबको कर्ज दे रही है, लेकिन गरीब की जेब में पैसा नहीं डाल रही। गरीब की जेब में पैसा नहीं तो आपका माल खरीदेगा कौन? सत्ता पक्ष कहता है कि उत्पादन बढ़ेगा तो आर्थिक चक्र चलेगा। राहुल कहते हैं कि ग्राहक होगा तो चलेगा!बिन ग्राहक सब सून!

साफ है कि सारी लड़ाई श्रेय की है। श्रेय दानी ले कि ज्ञानी ले?
ऐसे ही एक दिन राहुल भाई तनिक देर के लिए सड़कों पर पैदल जाते मजदूरों के साथ सड़क की पटरी पर बैठ कर संवेदना का शो देने लगते हैं, तो दुष्ट भक्तों को खल जाते हैं, वे उनका मजाक उड़ाने लगते हैं कि राहुल की नौटंकी है!

श्रेय की फाइट! बड़ी ही टाइट!!
इस कोरोना काल में भी चैनलों को एक दिन अपना सबसे प्यारा अखाड़िया मुद्दा मिल जाता है : एक मुसलिम औरत एक हिंदू की दुकान से सामान खरीद लेती है, जिसे देख कुछ मुसलान उससे सामान छीन कर इस बात के लिए फटकार कर कहने लगते हैं कि खबरदार, जो किसी हिंदू की दुकान से फिर सामान खरीदा…

एक अंग्रेजी एंकर रुष्ट होकर इस ‘हिंदू फोबिया’ के लिए ‘लिबरल लॉबी’ को ललकारता है कि कहां है ‘लिबरल लॉबी’? उसको तो सिर्फ ‘इस्लामोफोबिया’ ही दिखता है। यह ‘हिंदू फोबिया’ नहीं दिखता!

एक फोबिया दूसरे फोबिया से देर तक झगड़ता रहता है। अंत में एंकर प्रबोधता है कि बाजार सबका और सबके लिए है। बाजार में धर्म मत घुसाओ!

एक चैनल खबर देता है कि कोरोना महामारी फैलाने के लिए जिम्मेदारी आयद करने के संदर्भ में चीन के खिलाफ जिन एक सौ तेईस देशों ने पहल की, उसमें भारत आगे-आगे रहा है। इसका खंडन करते हुए एक विदेश नीति विशेषज्ञ स्पष्ट करता है कि भारत ने कहीं ‘लीड’ नहीं किया, बल्कि भारत का ‘स्टैंड’ तो बड़ा ही ‘भेद भरा’ है! इसे सुन कर एंकर अपना-सा मुंह लेकर रह जाता है! लेकिन जब भारत डब्ल्यूएचओ की कार्यकारिणी का सदस्य चुन लिया जाता है, तो एंकर इसी का गायन करने लगते हैं!

एक दिन दिहाड़ी मजदूर की भटकन को देख प्रियंका जी का दिल पसीज जाता है और उनकी पार्टी अपनी ओर से एक हजार बसों की व्यवस्था करती बताई जाती है, लेकिन कुछ खबर चैनल इस पुण्य में भी पाप देख लेते हैं और गिन-गिन कर दिखाने लगते हैं कि हजार बसों के नाम पर कुल आठ सौ से कुछ अधिक बसें ही भेजी हैं। बाकी तो कारें, आटो हैं। टैंपो हैं। यह है कांग्रेस का झूठ! वह क्या मदद करेगी?

हजार बस लगा कर कांगे्रस योगी जी की ‘मजदूर सेवा’ मे सेंध लगाना चाहती थी, लेकिन यारों ने उसकी सेंध में ही सेंधमारी कर दी! मुद्दा गरीब मजदूरों की मदद का न रह कर बसों की गिनती का हो गया!

अरे भाई, जितनी थी उतनी ही ले लेते, लेकिन क्यों ले लेते? कांगे्रस को श्रेय कैसे दे देते?

इस बीच ‘मिरर नाउ’ ने साफ किया कि ये अपने घरों को जाने वाले मजदूर क्यों घर नहीं जा पा रहे? कारण यह कि पहले इनको एक फार्म के लिए पुलिस थाने मे दस-बारह घंटे इंतजार करना पड़ता है। न मिलने पर फार्म को किसी ‘फोटो कॉपियर’ से पंद्रह-बीस रुपए में खरीदना पड़ता है, फिर उसे दस-पंद्रह रुपए देकर भरवाना पड़ता है, फिर थाने में लाइन लगानी पड़ती है। इसी में दस पांच दिन निकल जाते हैं…

बहरहाल, कोरोना काल में भी मंदिर की लड़ाई जारी है। वृहस्पतिवार को दो चैनल अपने प्राइम टाइम में ‘राम मंंिदर’ की नींव की खुदाई में निकले शिवलिंग, कमल चक्र तथा स्तंभों को लेकर बहसें कराने लगते हैं कि एक बार फिर प्रमाण मिले हैं कि बाबरी मस्जिद हिंदू-मंदिर तोड़ कर ही बनाई गई थी। एक वामपंथी प्रवक्ता इन अवशेषों को वीएचपी की ‘तिकड़म’ बताने लगता है और ठुकने लगता है। बीच-बीच में बोलने की आदत के काण एंकर उससे इस कदर नाराज हो उठता है कि उसे साइलेंट कर देता है और ललकार कर कहने लगता है कि हम तुम जैसे लोगों को एक्सपोज करके रहेंगे…

एक शाम एक अंग्रेजी चैनल पर उच्चकोटि के एक गुरुज्ञानी आते हैं और आधे घंटे तक अंग्रेजी में उदारवादी किस्म की जलेबी बनाते रहते हैं! ज्ञानी ते ज्ञानी मिले तो होत ज्ञान की बात!

परम ज्ञान की बातें सुन कर एंकर मुसकुराता है। उधर गुरुज्ञानी कहने लगते हैं कि सज्यसत्ता दमनकारी होती जा रही है (बकौल कामरेड लेनिन जी के, राज्यसत्ता तो दमनकारी होती ही है सर जी!) और कि यह सरकार ‘सिविल सोसाइटी’ से सलाह लेती ही नहीं!
बताइए, कितनी गंदी है यह ‘दमनकारी राज्य सत्ता’ कि इधर सलाहकार मुफ्त सलाह देने के लिए मरे जा रहे हैं, उधर वह उनको लिफ्ट तक नहीं देती!

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