corruption can be prevented but complete elimination is impossible - तीरंदाजः लहरें गिनने वाले - Jansatta
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तीरंदाजः लहरें गिनने वाले

विकसित और संस्कार संपन्न देशों में भी भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा है। इसे अपराध माना जाता है और सामाजिक पाप भी। इस धारणा के बावजूद वहां, पूर्ण उन्मूलन नहीं हो पाया है। प्रयास जारी हैं और उनमें सबसे सार्थक प्रयास भ्रष्टाचार के मौके कम करने का रहा है।

इस तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

तमाम सरकारों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेड़ रखी है। वे कई तरह की रणनीतियों के जरिए भ्रष्टाचार उन्मूलन में जुटी हुई हैं। इन सरकारों के पास बहुत सारा तंत्र उपलब्ध है, जिसका उपयोग करके वे भ्रष्ट सरकारी कर्मियों को अपना कर्म करने से रोक रही हैं या फिर उनको भ्रष्ट कर्म करते हुए पकड़ने का दावा कर रही हैं। पर भरसक प्रयासों के बावजूद, नए और अनूठे तरीकों से भ्रष्टाचार हो रहा है। बीरबल की लहरें गिन कर पैसा कमाने वाली कहानी से हममें से बहुत लोग परिचित हैं। किस्सा यों है कि एक बार बादशाह अकबर को खबर लगी कि बीरबल बादशाह से अपनी नजदीकी दिखा कर आगरा के सेठ-साहूकारों से उगाही कर रहे हैं। बादशाह ने फौरन फैसला किया और बीरबल को शहर से बाहर यमुना नदी के किनारे तैनात कर दिया। बीरबल ने जब अपनी नई तैनाती के बारे में अकबर से पूछा, तो उन्होंने साफ कहा कि उन पर इल्जाम है कि वे बादशाह से अपनी नजदीकी को भुना रहे हैं और इसलिए उनको दूर भेज दिया गया है। ‘अब देखता हूं कि उस बियाबान में तुम कैसे पैसे कमाते हो’, अकबर ने कहा। बीरबल हल्के से मुस्कराए और यमुना किनारे जाकर अपना डेरा गाड़ दिया।

कुछ अरसे बाद अकबर के पास फिर शिकायत आई कि बीरबल अब पहले से भी ज्यादा पैसे कमा रहे हैं। उनको बताया गया कि बीरबल ने नदी किनारे कुछ मुंशी बैठा दिए हैं, जिनको लहरें गिनने का ‘सरकारी’ काम दिया गया है। जो भी नाव उनके डेरे के सामने से गुजरती है, वे उस पर यह कह कर जुर्माना लगा देते हैं कि नाव की वजह से लहरें गिनने में खलल आई है, सरकारी काम में बाधा पड़ी है। जुर्माना देते-देते मछुआरे और व्यापारी त्रस्त हो गए हैं और वे इस कर से निजात पाना चाहते हैं। अकबर ने ऐसा कोई आदेश नहीं दिया था, सो उन्होंने बीरबल को बुलवा भेजा। बीरबल ने आते ही बादशाह को सिक्कों से भरी एक बड़ी थैली भेंट की और बताया कि उन्होंने सरकार के नाम पर लहरें गिनना शुरू कर दिया था और बियाबान में भी पैसा कमाने की जुगत निकाल ली थी।

‘बादशाह सलामत,’ उन्होंने कहा, ‘अगर नीयत साफ है, तो नजदीक होने या दूर रहने से कोई फर्क नहीं पड़ता है। जो बदनीयत है वह हर जगह ‘सरकार’ के इकबाल को भुनाने का तरीका ढूंढ़ लेगा, जैसा मैंने किया है।’ वैसे सरकारी हो या गैर-सरकारी, पैसे कमाने की जुगत में लगभग हर व्यक्ति रहता है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि सामाजिक और आर्थिक नियमावली को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करना मनुष्य के डीएनए में बसा हुआ है। उनके अनुसार आर्थिक से कहीं ज्यादा लोग अपने व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में भ्रष्ट आचरण करते हैं। ऐसी भ्रष्टता बचपन से शुरू हो जाती है और धीरे-धीरे मानस में बस जाती है। यह आगे चल कर हमको विकराल रूप में सरकारी भ्रष्टाचार में दिखती है।

मनोविज्ञानिकों का कहना है कि भ्रष्टाचार का पूर्ण उन्मूलन असंभव है। उसकी रोकथाम जरूर की जा सकती है, पर यह आशा करना कि ज्यादातर लोग ईमानदार हो जाएंगे, अप्राकृतिक अपेक्षा है। उनके अनुसार विश्व भर के समाज भ्रष्टाचार से सदियों से जूझ रहे हैं, पर हर दवा ने मर्ज को बदतर ही कर दिया है। कुछ ने डर दिखा कर भ्रष्टाचार पर काबू पाने की कोशिश की है, तो कई औरों ने इसको सहज तरीके से अपनी जीवन शैली में सम्मिलित कर लिया है। बहुत से विकासशील देश ऐसे हैं, जहां पर भ्रष्टाचार को उन्होंने अपने राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था का हिस्सा मान लिया है और इस पर ध्यान देना बंद कर दिया है। ये ऐसे देश हैं, जो सदियों से युद्ध और आंतरिक कलह की वजह से आर्थिक संपन्नता से वंचित रहे हैं या फिर उपनिवेशन का शिकार थे। इनके चलते जल्दी से अपना घर भर लेने की हवस भ्रष्टाचार की बड़ी वजह रही है।

विकसित और संस्कार संपन्न देशों में भी भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा है। इसे अपराध माना जाता है और सामाजिक पाप भी। इस धारणा के बावजूद वहां, पूर्ण उन्मूलन नहीं हो पाया है। प्रयास जारी है और उनमें सबसे सार्थक प्रयास भ्रष्टाचार के मौके कम करने का रहा है। इसके तहत कोई भी नई योजना लाने से पहले या चलती योजना में सुधार करते समय वे यह देखते हैं कि क्रियान्वयन के दौरान ऐसे कौन से बिंदु हैं, जहां पर भ्रष्टाचार के अवसर बन सकते हैं। वे इन अवसरों को खत्म करने के लिए नियम-कानून या नीतियां बनाते हैं। टेक्नोलॉजी इस प्रयास को सफल बनाने में विशेष रूप से उपयोगी रही है। भारत में इसका उपयोग रेल टिकट रिजर्वेशन में व्याप्त भ्रष्टाचार को लगभग समाप्त करने के लिए किया गया है। इसी तरह बहुत से और क्षेत्र हैं, जिनमें टेक्नोलॉजी के माध्यम से नाजायज तौर-तरीकों की रोक-थाम की गई है।

पर सरकारी भ्रष्टाचार से पहले आता है राजनीतिक भ्रष्टाचार। राजनीति को पैसा चाहिए, क्योंकि उसकी प्राक्रिया बेहद खर्चीली है। तानाशाही व्यवस्था हो या फिर लोकतांत्रिक, दोनों की पहली शर्त प्रचुर मात्रा में धन की उपलब्धता है। यह धन सीमित रूप में चंदे की तरह उपलब्ध हो सकता है, पर स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक यह सक्रिय राजनीति करने लिए पर्याप्त नहीं है। ज्यादा धन पाने के लिए राजनीति सरकारी कोष की तरफ प्रेरित होती है और भ्रष्ट व्यवस्था को स्थापित करने में लग जाती है। इन सूरतेहाल के चलते कोई भी समाज अपने पैसे के दुरुपयोग को तब तक नहीं रोक सकता है जब तक वह अपनी राजनीतिक व्यवस्था को सुधारने के लिए ऐसे कदम न उठाए, जिनसे राजनेताओं के हाथ सरकारी गुल्लक तक बमुश्किल पहुंचे। इसका एक तरीका सख्त कानून बनाना है, पर कानून राजनेता बनाते हैं और उनसे यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार लेंगे।

दूसरा रास्ता मुश्किल जरूर है, पर असरदार है। इसमें जन चौकसी के जरिए उन सब संस्थाओं को मजबूत किया जा सकता है, जो भ्रष्ट नेताओं और सरकारी कर्मचारियों को उनके कृत्यों पर तीव्र गति से दंडित करें। बलिष्ठ न्यायपालिका, मजबूत प्रेस और प्रभावी जन संवाद/ जन संभागिता इसके तीन आधार हैं। हम और आप, यानी आम नागरिक, व्यवस्था पर जुबानी जमा खर्च करने के बजाय अगर वास्तव में अपना ईमानदार स्वर और चार पैसे इनमें लगा दें तो पूर्णत: लूटने से अपने को बचा सकते हैं। अपने सुविचार दान देकर भ्रष्टाचार की चाल, चेहरा और चलन को बदल सकते हैं।

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