ताज़ा खबर
 

तीरंदाज: रहेंगे कहां!

मैं अब आश्वस्त था कि मेरे काम का कोई अंत नहीं था। मैं चिरंजीवी था। मेरे पिता का चेहरा मेरे सामने आकर कुछ देर ठहर गया था और फिर मुझमें समा गया था। उसके बाद मेरे बेटे मेरे सामने आ गए थे और मैं उनमें पैठ गया था।

Serum Institute of India (SII), Indian Council of Medical Research (ICMR)Coronavirus Vaccine के लिए दुनिया भर के मुल्कों में रिसर्च और ट्रायल पर काम जोरों पर है। (फोटोः एजेंसी)

कोरोना का ज्वर सिर चढ़ कर बोल रहा था। कभी लगता था कि कान पर जैसे कुछ ढपढप तेज बज रहा है, तो कुछ देर बाद ये आवाजें किसी अंधे कुएं में फिसल कर गिर जाती थीं और शरीर शीतल हो जाता था। पसीने से कपड़े तरबतर हो जाते थे, पर फिर तुरंत ही बढ़ते ताप से सूख जाते थे। अस्पताल में आसपास क्या हो रहा है, समझ में तो नहीं आ रहा था, पर धुंधला-सा महसूस जरूर हो रहा था।

आइसीयू में मेरे बिस्तर पर लगातार डॉक्टर और नर्स आ-जा रहे थे। उनके चेहरे नहीं थे- एक नीले मास्क के बाद दूसरा, या फिर वही मास्क आता था और उसके झक सफेद हाथ मेरी तरफ बढ़ते थे। सुई लगने का एहसास बांह में होता था- बांह मुझसे जुड़ी नहीं थी- लग रहा था जैसे कहीं दूर रखी थी। वे नीले सपाट चेहरे हवा में तैरते हुए बता जाते थे कि अब ब्लड सैंपल ले रहे हैं या फिर ब्लड प्रेशर आदि नाप रहे हैं। उनके स्वर मेरे कानों में एक पल के लिए गूंज कर फर्श पर गिर-बिखर जाते थे।

अस्पताल में भर्ती होते ही डॉक्टर आए थे, मुझे एक नजर देखा था, कुछ सवाल पूछे थे और फिर नर्स को दवाओं की फेहरिश्त थमा गए थे। नर्स उसके बाद मुस्तैदी से अपने काम में लग गई थी। उसने कुछ दवाएं मुझे खिलाई थीं और कुछ चढ़ाने के लिए ड्रिप में लगा दी थी। उसके सामने मेरा संक्रमित शरीर था, पर मेरे लिए स्थूल देह ओझल हो चुकी थी। लग रहा था जैसे अस्पताल की बोझिल हवा में घुल कर मैं छटपटा रहा था उसको ढूंढ़ने के लिए, जिसे मैं कहीं रख आया हूं।

एक तरह से मैं स्वविचरण के लिए देह से मुक्त हो गया था, पर दूसरी तरफ मैं अपने में धंसता भी जा रहा था। अदृश्य पाश मुझे पकड़े हुए थे। नर्भनाल कटी नहीं थी- उसका स्थूल कभी सूक्ष्म होकर चैतन्य हो जाता था, तो कभी उसकी जड़ता तरल होकर मेरे स्वयं को गोता लगवा देती थी। मैं बुरी तरह हांफ उठता था।

अर्ध निद्रा में झूलते हुए दृश्य उभरा था। मैं अपने पिता के साथ था।
‘जब आपका काम खत्म हो जाएगा तो आप कहां रहेंगे?’ मैंने अपने पिता से मासूम-सा सवाल पूछ रहा था।
‘कौन-सा काम खत्म हो जाएगा?’ उन्होंने मुस्करा कर कहा था।

लहरों का ज्वर पता नहीं कैसे मुझे अपने उस घर ले आया था, जहां मैं बड़ा हुआ था। गर्मियों में पिताजी रोज सुबह सात बजे बड़े से बंगले के बगीचे में बैठ कर पहले मां के साथ चाय पीते थे और फिर अपनी दाढ़ी बनाते थे। यह दृश्य मेरे दिमाग में दशकों से छाया हुआ है।

उनका चेहरा, कद-काठी, उनके बोलने का अंदाज और उनकी मंद-मंद मुस्कान- हर चीज पूरी बारीकी से मेरे जेहन में महफूज थी। पर आज मैं उनको देख नहीं पा रहा था। सिर्फ महसूस कर रहा था कि वे मेरे सामने बैठे हैं और मैं उनसे बात कर रहा हूं। मैं खुद भी गायब था, बस उनके और अपने होने का एहसास था, जो किसी झीने पर्दे की तरह हल्की बयार में लहरा रहा था।

‘आपके काम से मेरा मतलब है कि कुछ दिनों बाद आप नौकरी से रिटायर हो जाएंगे। तब यह मकान तो रहेगा नहीं। कहां रहेंगे आप?’
‘मेरा घर तो बस गया है, वह हमेशा रहेगा। हां, यह मकान जरूर नहीं रहेगा।’
‘मैं भी तो यही कह रहा हूं। आप किस मकान में रहेंगे।’

उन्होंने अपने हाथ में मेरा हाथ ले लिया। पर्दे फड़फड़ाने लगे थे। हमारे हाथ एक-दूसरे में पिघल गए थे। तरल अनुभूतियां अतल झील की तरह किनारों को थपकी दे रही थीं। मुझे नींद का आलस अपनी गोदी में उठा कर हल्के से झुला रहा था। मैं शून्य में लुप्त हो ही रहा था कि बयार फिर चली और मैंने अपने को एक सुनसान जगह पर पाया, जहां से दूर कुछ मकान दिख रहे थे। रहने की जगह तलाश रहे हैं? किसी ने पूछा था।

मैंने सिर हिला दिया था और हम चल पड़े थे। एक क्षण में हम कई मकानों के सामने खड़े थे। मैं पहले मकान में दाखिल हुआ था और फौरन ही बाहर आ गया था। सीलन की जबर्दस्त गंध मुझसे बर्दाश्त नहीं हुई थी। दूसरा मकान कुछ दूरी पर था। दरवाजा खोल कर अंदर गया तो दीवारें ढह रही थीं। छत बिना सहारे सिर पर लटक रही थी और फर्श अपने आप उखड़ कर खुद समतल भी हो रहा था। छत और फर्श के बीच बियाबान था, जिसमें काली आंधी फूट पड़ने से पहले हिसहिसा रही थी। ‘ऐसे मकान में कौन रहेगा?’ मैंने चिड़चिड़ा कर पूछा था। ‘बहुत लोग रहते हैं’, उस आवाज ने हल्के से जवाब दिया था।

हड़बड़ा कर मैंने दो कदम पीछे कर लिए थे और अपने घर के लॉन में अपने को कुर्सी पर बैठा पाया था। मेरा बेटा पास बैठा था। ‘जब आपका काम खत्म हो जाएगा तो आप कहां रहेंगे?’ उसके सवाल ने मुझे चौंका दिया था। मैंने उसे गौर से देखा। अरे, वह मैं ही था और सवाल मैं अपने पिता से कर रहा था। पता नहीं कैसे मैं कभी अपने पिता का बेटा हो रहा था, तो कभी अपने बेटे का बाप। सब कुछ घालमेल हो रहा था।

‘मेरे रहने की जगह मिल गई?’ मेरे पिता ने पूछा।
‘नहीं’, मेरे बेटे ने जवाब दिया, ‘बहुत ढूंढ़ा, पर ऐसी कोई जगह नहीं मिली जहां आप रह सकें।’
‘पर मैं कहीं और रहूं क्यों? यहां क्या बुराई है?’ उन्होंने कहा था।
‘पर जब आपका काम खत्म हो जाएगा, तो जाना ही पड़ेगा न।’ मैंने अपने पिता को जवाब दिया था।
‘पर मेरा काम तो कभी खत्म नहीं होगा।’

‘कैसे?’ मेरे बेटे ने मुझसे पूछा था।
‘मेरा काम तो तुम हो। यह हमेशा चलता रहेगा। नौकरी से रिटायर हो जाऊंगा, पर क्या कोई पिता के रूप से रिटायर होता है?’ उन्होंने बड़े स्नेह से मेरे सिर पर हाथ फेरा था। मैं भावुक हो गया था।
‘पर फिर भी पिताजी’, मेरे बेटे ने मुझसे कहा, ‘आपको कोई न कोई तो जगह चाहिए ही। आप और मां रहेंगे कहां?’
‘तुम्हारे साथ’, मैंने दुलारा था।

‘पर मैं खुद कहां रहूंगा, मुझे पता नहीं है। सब कुछ अनिश्चित है। मुझे आपकी चिंता है।’ मेरे बेटे ने कहा था।
‘मैं तुम्हारे साथ रहंूगा।’ मेरे पिता ने मुझको जवाब दिया था।
‘पर कैसे? जगह कहां होगी?’

‘मैं तुममें समा जाऊंगा। मुझे जगह की क्या जरूरत है? कहीं और रह कर करूंगा भी क्या जब मेरा सारा काम तुम हो। और यह काम कभी खत्म नहीं होगा। तुम, और तुम्हारे बाद, और फिर उसके बाद भी मेरा काम चलता रहेगा। मैं तुममें समा जाऊंगा, तुम अपने बेटे में और वह अपनी औलाद में। हम सब एक साथ एक घर में रहेंगे। घर में हम सबके लिए बहुत जगह होगी।’ मेरे पिता ने मुझे आश्वस्त किया था।

मैं गफलत में था, पर फिर भी हर शब्द मेरे भीतर उतर गया था। मेरा तेज ज्वर एकाएक थम गया था। मेरा हांफना गायब हो गया था। मैं अब आश्वस्त था कि मेरे काम का कोई अंत नहीं था। मैं चिरंजीवी था। मेरे पिता का चेहरा मेरे सामने आकर कुछ देर ठहर गया था और फिर मुझमें समा गया था। उसके बाद मेरे बेटे मेरे सामने आ गए थे और मैं उनमें पैठ गया था। अस्पताल की हलचल के बीच मैं चैन की नींद सो रहा था।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 दूसरी नजर: सुधार किसलिए, विकास या गौरवगान के लिए?
2 बाखबर: टीका बाजार
3 वक्‍त की नब्‍ज: घाटी के अनुत्तरित सवाल
यह पढ़ा क्या?
X