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प्रसंग: इस निद्राचारी समय में

हम एक रौ में चलते रहते हैं, मानो नींद में हों। एक ठोकर लगती है और सहसा नींद खुल जाती है और हम जाग जाते हैं। तो क्या कोरोना हमारी नींद खोलने वाला है?

कोरोना वायरस लगातार अपने पैर पसार रहा है।

आज दुनिया महामारी के खतरे से जूझ रही है। अज्ञात-सा भय है। करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी छिन गई है। करोड़ों के आशियाने उजड़ गए, करोड़ों घर से बेघर हुए हैं। यह दुनिया के विपन्न ही नहीं; संपन्न और शक्तिमान देशों का भी हाल है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद दुनिया शायद पहली बार ऐसे संकट से गुजर रही है।

हालांकि द्वितीय विश्वयुद्ध से कोरोना समय की तुलना करना जल्दबाजी लग सकती है; लेकिन हवाई जहाजों से रहित आकाश और रेलगाड़ियों से खाली रेल की पटरियां, कोलतार से बनी सड़कों का खाली पड़ा विशाल संजाल द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर महासन्नाटे की गवाही देने के लिए पर्याप्त हैं। विश्व की सबसे ताकतवर कुर्सियां, जो कल तक इस सारे प्रकरण को प्रतिपक्ष द्वारा खड़ा किए गए हौवे के रूप में देख रही थीं, आज उन्हें भी सांप सूंघ गया है। इस भकुआयेपन में वे किसी शत्रु या प्रतिद्वंद्वी देश को जिम्मेदार ठहराते हुए अपनी कमजोरियां छिपा रही हैं। तालाबंदी और वैश्विक मंदी की आशंकाओं के बीच अनिश्चितता के जो बादल घिर आए हैं, दूर-दूर तक उनके छंटने के आसार नहीं दिखाई दे रहे।

यह संकट अभूतपूर्व तो है, पर आकस्मिक नहीं। हम क्रमश: इस ओर कदम बढ़ाते चले जा रहे थे। प्रकृति विज्ञानी, पर्यावरणविद और ऐसे ही अनेकानेक विशेषज्ञ न जाने कब से चेताते चले आ रहे हैं, लेकिन हमें ज्ञान और विज्ञान की बातें सुनने का अभ्यास नहीं है। हमें केवल फायदे की आवाजें सुनाई देती हैं। कोरोना को लेकर वैज्ञानिक 2019 के अंत से ही सचेत कर रहे थे। मगर दुनिया मुनाफे और आगामी चुनाव की चिंता में मुब्तिला थी। जब खतरे ने महामारी का रूप धारण कर लिया और लोग पटपटा कर मरने लगे तब समझ में आया कि अरे, यह तो महामारी है। और फिर अचानक आई आंधी में घिरे आदमी की तरह इधर-उधर भागने लगे।

हमारी आधुनिक दुनिया को मुनाफे के अलावा और कोई तर्क न तो सुनाई और न ही सुझाई पड़ता है। ऐसे ही लोगों के लिए कभी फिराक गोरखपुरी ने लिखा था- पूछते हैं वो इश्क से क्या फायदा/ पूछता हूं मैं फायदे से क्या फायदा? हम एक रौ में चलते रहते हैं मानो नींद में हों। एक ठोकर लगती है और सहसा नींद खुल जाती है और हम जाग जाते हैं। तो क्या कोरोना हमारी नींद खोलने वाला है? क्या यह हमारे किसी सुदीर्घ सपने को तोड़ने वाला है? सवाल यह भी है कि क्या अभी तक हम नींद में थे?

‘हिंद स्वराज’ का एक वाक्य याद आता है- ‘नींद में आदमी जो सपना देखता है उसे वह सही मानता है, जब उसकी नींद खुलती है तभी उसे अपनी गलती मालूम होती है।’ गांधी के पहले, खासकर हमारे भक्त कवियों ने, इसे बार-बार कहा है और बहुत काव्यात्मक ढंग से कहा है। लेकिन भक्त कवियों से अलग गांधी यह बात आधुनिक दुनिया का आलोचनात्मक पाठ प्रस्तुत करते हुए कहते हैं।

गांधी आगे कहते हैं कि ‘इंसान नींद से उठता है तो अंगड़ाई लेता है, इधर-उधर घूमता है और अशांत रहता है। उसे पूरा भान आने में वक्त लगता है।’ पता नहीं, इस झटके से हमारी नींद या बेहोशी टूटेगी या नहीं। जिस आधुनिक दुनिया में हम जी रहे हैं या जिसमें जीने का अभ्यास हो गया है, हिंद स्वराज उसकी बुनियादी आलोचना करता है।

इस बुनियादी आलोचना के लिए हम तैयार नहीं थे। इस दुनिया की कुछ चीजों के प्रति इस कदर मोह है कि लगता है जैसे उसके बगैर दुनिया संभव ही नहीं है। गांधी कहते हैं कि ‘जब तक आदमी अपनी चालू हालत से खुश रहता है, तब तक उसमें से निकलने के लिए उसे समझाना मुश्किल है।… चालू चीज से ऊब जाने पर ही उसे फेंक देने को मन करता है।’

यह चालू चीज क्या है? गांधी की नजर में यह चालू चीज आजकल की सभ्यता है। गांधी ने आजकल की सभ्यता की परत-दर-परत आलोचना की है। आज से पहले गांधी की आलोचना नहीं समझ में आती थी। क्या आज से पहले हम यह सोच सकते थे कि ट्रेन के बगैर हमारा जीवन संभव है! हिंद स्वराज में गांधी ने ट्रेन की आलोचना करते हुए लिखा है- ‘रेल से महामारी फैलती है। अगर रेलगाड़ी न हो तो कुछ ही लोग एक जगह से दूसरी जगह जाएंगे और इस कारण संक्रामक रोग सारे देश में नहीं पहुंच पाएंगे।

पहले हम कुदरती तौर पर ही सेग्रेगेशन- सूतक- पालते थे। रेल से अकाल बढ़े हैं, क्योंकि रेलगाड़ी की सुविधा के कारण लोग अपना अनाज बेच डालते हैं। जहां महंगाई हो वहां अनाज खिंच जाता है, लोग लापरवाह बनते हैं और उससे अकाल का दुख बढ़ता है। रेल से दुष्टता बढ़ती है। बुरे लोग अपनी बुराई तेजी से फैला सकते हैं। हिंदुस्तान में जो पवित्र स्थान थे, वे अपवित्र बन गए हैं। पहले लोग बड़ी मुसीबत से वहां जाते थे। ऐसे लोग वहां सच्ची भावना से ईश्वर को भजने जाते थे; अब तो ठगों की टोली सिर्फ ठगने के लिए वहां जाती है।’

यह सिर्फ रेलगाड़ी की आलोचना नहीं है। रेलगाड़ी महज प्रतीक है। यह आज की सभ्यता की आलोचना है। आज की सभ्यता को गांधी बहुत संक्षेप में परिभाषित करते हैं- ‘शरीर का सुख कैसे मिले, यही आज की सभ्यता ढूंढ़ती है; और यही देने की कोशिश करती है। पर वह सुख भी नहीं मिल पाता।’ गांधी आज की सभ्यता के रूप में उस रोग की पहचान करते हैं, जिससे भारत और यूरोप दोनों पामाल हैं। गांधी दोनों के ही दुखों के मूल में आज की सभ्यता को देखते हैं। यूरोप के ज्ञान-विज्ञान और पुरुषार्थ के मूल में ‘शरीर सुख की खोज में धन्यता’ का भाव है। इस सारे उद्यम के मूल में गांधी अकर्मण्यता को पाते हैं। सारी खोज इस बात के लिए कि ‘आदमी को हाथ पांव हिलाने की जरूरत नहीं रहेगी।’

हिंद स्वराज में गांधी ने अफ्रीका के मरहूम प्रेसिडेंट पाल क्रूगर के एक प्रसंग का जिक्र किया है। पाल कू्रगर से पूछा गया था कि ‘चांद में सोना है या नहीं।’ उसने जवाब दिया- ‘चांद में सोना होने की संभावना नहीं है, क्योंकि सोना होता तो अंग्रेज अपने राज्य के साथ उसे जोड़ लेते। पैसा उनका (अंग्रेजों का) खुदा है। इस प्रसंग से गांधी यह बताना चाहते हैं कि आज की सभ्यता का मूल मंत्र है- पैसा। पैसा उनका खुदा है। पैसे की तलाश में यह सभ्यता इस कदर मुब्तिला हुई कि उसने प्रेम और मनुष्यता को भुला दिया।

आदमी लोभ के चरम पर पहुंचा। वह धरती के गर्भ से सारी संपदा आज ही निकाल लेने पर तुल गया। उसने ऐसे विनाशक हथियार बनाए हैं, जिनसे समूची पृथ्वी कई बार नष्ट की जा सकती है। पैसे के लोभ ने दुनिया को युद्ध और हथियारों की होड़ में डाल दिया। धर्मोन्माद इस होड़ में आग में घी का कम कर रहा है। क्या कोविड-19 हमें इस नींद से जागने में मदद करेगा!

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