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वक्त की नब्ज: भय के इस माहौल में

प्रधानमंत्री का अगला कदम यही होना चाहिए कि वे राज्य सरकारों के स्वास्थ्य मंत्रियों को दिल्ली बुला कर उनके साथ सलाह-मशविरा करें कि कम से कम सफाई के मामले में हमारे अस्पतालों में सुधार कैसे हो सकता है। इसके लिए न पैसों की जरूरत है न किसी नई जानकारी की।

Coronavirus LIVE Updates: दुनिया के 173 देशों में कोरोनावायरस के 2 लाख से ज्यादा मामले सामने आए। (सोर्स- सोशल मीडिया)

देखते-देखते मुंबई बदल गया पिछले सप्ताह। अब भी यकीन नहीं आ रहा है कि जिस महानगर के बारे में कहा जाता था कि रात को भी सोता नहीं है, उसकी सड़कों पर दिन में भी सन्नाटा छाया रहता है। बाजार जो भरे रहते थे खरीदारों से, अब खाली हैं। कई दुकानें अब बंद रहने लगी हैं। बंद हो गए हैं स्कूल सारे। बंद हो गए हैं रेस्तरां सारे और पांच सितारा होटल वीरान से दिखने लगे हैं। पिछली बार ऐसा माहौल तब देखने को मिला था जब 26/11 वाला हमला हुआ था। उस बार जल्दी ही मालूम हो गया था कि दुश्मन कौन था। इस बार दुश्मन अदृश्य है।

मैंने एक जिम्मेदार नागरिक के नाते अपने आप को लोगों से दूर रखा है, जबसे न्यूयॉर्क से लौट कर आई हूं एक हफ्ते पहले। अगर मैं करोना वायरस को अपने साथ लाई हूं तो उसका असर दिख सकता है चौदह दिन बाद। एकांत में बैठे हुए भारत सरकार की रणनीति पर विचार करती रहती हूं। एकांत में प्रधानमंत्री का भाषण सुना और आज के दिन मैं भी जनता कर्फ्यू का पालन कर रही हूं। अच्छा लगा कि प्रधानमंत्री ने पड़ोस के राजनेताओं के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंस करके उनके विचार सुने। अच्छा लगा कि विदेशी पर्यटकों के भारत आने पर पाबंदियां लग गई हैं। बहुत अच्छा लग रहा है कि प्रधानमंत्री रणनीति की जिम्मेवारी खुद ले रहे हैं।

समस्या यह है कि असली समस्या अब शुरू होने वाली है। विशेषज्ञों के लिए भी अंदाजा लगाना मुश्किल है कि विश्व की अर्थव्यवस्था पर यह अदृश्य दुश्मन कितना असर कर सकेगा। दुनिया के सबसे जाने-माने डॉक्टर भी कह नहीं सकते कि यह वायरस कब तक फैलता रहेगा, जिस रफ्तार से अब फैल रहा है। इतना जरूर कह सकते हैं हम अनाड़ी भी कि नुकसान अभी से दिखने लगा है। करोड़ों का नुकसान मुंबई शहर में ही दिखता है अभी से। जिनका जीवन दिहाड़ी पर निर्भर था वे इस महानगर को छोड़ कर वापस अपने गांव जा रहे हैं, क्योंकि काम मिलना मुश्किल हो गया है।

बड़े-बड़े कारोबार अपने आधे से ज्यादा मुलाजिमों को घर बैठने को कह रहे हैं। खबर है कि लोकल रेलगाड़ियों पर यात्री आधे हो गए हैं। हवाई यात्राएं तकरीबन बंद हो गई हैं अभी से। ऐसा सिर्फ भारत में नहीं, पूरी दुनिया में हो रहा है, लेकिन जिन देशों की अर्थव्यवस्था स्वस्थ थी वहां थोड़ी-बहुत मंदी बर्दाश्त हो जाएगी। भारत में मंदी पहले से छाई रही है अर्थव्यवस्था पर कई महीनों से, सो हमारा क्या होगा, कहना मुश्किल है।

ऊपर से हमारी समस्या यह भी है कि अगर यह वायरस उस रफ्तार से फैलता है जैसे यूरोप और अमेरिका में फैल चुका है, तो हमारी बीमार स्वास्थ्य सेवाएं इसको झेल भी सकेंगी? सो, शायद प्रधानमंत्री का अगला कदम यही होना चाहिए कि वे राज्य सरकारों के स्वास्थ्य मंत्रियों को दिल्ली बुला कर उनके साथ सलाह-मशविरा करें कि कम से कम सफाई के मामले में हमारे अस्पतालों में सुधार कैसे हो सकता है। इसके लिए न पैसों की जरूरत है न किसी नई जानकारी की। जरूरत है सिर्फ उनको समझाने की कि थोड़ी-सी गंदगी कितना बड़ा नुकसान कर सकती है।

पिछले सप्ताह विदेश से आए किसी यात्री ने सोशल मीडिया पर कुछ तस्वीरें डाली थीं उस जगह की, जहां उसको कोरेंटीन में रखा गया है पंद्रह दिन के लिए। तस्वीरों में साफ दिखते थे गंदे फर्श, दीवारें और टॉयलेट इतने टूटे हुए कि उनका इस्तेमाल करना असंभव। तस्वीरों को देख कर भारतीय जनता पार्टी की ट्रोल सेना हरकत में आ गई और खूब गालियां देने लगे। कुछ जानेमाने पत्रकार भी शामिल हुए धिक्कार के इस प्रयास में, इस आधार पर कि सरकारी व्यवस्था की आलोचना करना बिल्कुल गलत है, इसलिए कि भारत सरकार ने पूरी कोशिश की है अच्छी व्यवस्था उपलब्ध कराने की। लेकिन इन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि इस नए वायरस को रोकने का सबसे बड़ा हथियार है हद से ज्यादा सफाई रखना। हाथ लगातार धोना और अपने आसपास जरूरत से ज्यादा सफाई रखना। ऐसी सफाई हमारे सरकारी अस्पतालों में भी नहीं है। महानगरों में फिर भी सरकारी अस्पतालों के अंदर थोड़ी-बहुत सफाई की कोशिश दिखती है, कस्बों में प्रयास भी नहीं दिखता और देहाती क्षेत्रों में स्वास्थ्य केंद्र अक्सर बेकार हैं।

इस नई बीमारी से कुछ अच्छा निकल सकता है तो यह कि कम से कम सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में सफाई लाई जाए। मुंबई और दिल्ली के अस्पतालों में थोड़ी बहुत इलाज की उम्मीद हम कर सकते हैं। छोटे शहरों और गांवों में स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों में कई बार डॉक्टर तक नहीं दिखते हैं। मैं जब भी ग्रामीण क्षेत्रों में जाती हूं, तो हमेशा कोशिश करती हूं स्थानीय अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्रों में जाकर उनका हाल अपनी आंखों से देखने की। और सच यह है कि मैंने अक्सर देखा है कि ये सेवाएं सिर्फ नाम के वास्ते बनाई गई हैं, इलाज के लिए नहीं। इमारतें कई जगह आलीशान दिखती हैं बाहर से, लेकिन अंदर जाते ही पता लगता है कि यहां सफाई नाम की चीज ही नहीं है। बिस्तरों पर गंदी चादरें होती हैं, बदबू से भरे रहते हैं मरीजों के कमरे। अस्पतालों के बागों और बरामदों में दिखते हैं कूड़े के ढेर, जिनमें खतरनाक किस्म का कूड़ा होता है, जिससे फैल सकती हैं कई बीमारियां।

सो, दुआ करनी चाहिए हम सबको की प्रधानमंत्री का अगला कदम यही होगा कि उस जोश से अस्पतालों में सफाई अभियान शुरू करवाएंगे जिस जोश से स्वच्छ भारत अभियान चलाया गया था उनकी छत्रछाया में, वरना इस वायरस से हम लड़ नहीं पाएंगे।

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