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उच्च शिक्षण संस्थान और संगोष्ठियां : मकसद से भटका संवाद

सेमिनार से विचार की जो शृंखला बनती है, उसे गंभीरता से न लेने के कारण सेमिनार केवल ग्रांट लेने, नैक आदि से प्रमाणीकरण लेने और प्राध्यापकों के पद की आर्थिक कसौटी बन कर रह गए हैं।

Author नई दिल्ली | January 29, 2017 4:29 AM
सेमिनार, सेमेस्टर प्रणाली, उन्मुखीकरण और शोध ये मूल रूप से उच्चशिक्षा के स्तर की गुणवत्ता के लिए हैं, मगर इन्हें हमारा ही प्राध्यापक वर्ग कम पसंद करता है।

उच्च शिक्षा के प्रचलित सभी प्रारूप पिछले पचास वर्षों में जिस तेजी से विकृत, विरूप और विघटित हुए हैं, उससे चिंताओं और समस्याओं का विस्फोट हुआ है। उच्च शिक्षा में गुणवत्ता बढ़ाने की दिशा में यूजीसी ने कई कदम उठाए। सेमिनार उनमें से सर्वाधिक अकादमिक कदम कहा जा सकता है। सेमिनार शैक्षिक संवाद की एक ऐसी सामूहिक प्रक्रिया है, जिसमें प्रत्येक सहभागी निर्धारित विषय पर संवाद और संवाद में हस्तक्षेप कर सकता है। सेमिनार का विचार सबसे पहले चर्च में पैदा हुआ, जहां युवाओं को धर्म प्रशिक्षण दिया जाता था। इस विचार को उद्योगों ने अपना कर औद्योगिक उत्पादों की गुणवत्ता, नए उत्पादों की जिज्ञासा, प्रयोग और उपयोगिता के लिए प्रचारित किया। सेमिनार के संवाद उत्कृष्टता के लिए ही किए जाते थे और संवाद के निष्कर्ष औद्योगिक उत्पादों की गुणवत्ता और उत्कृष्टता के लिए लागू किए जाते थे। इन सेमिनारों में अब संवाद की जगह पावर पाइंट प्रेजेंटेशन ने लेकर संवाद को संक्षिप्त या पूरी तरह समाप्त कर दिया है।

शिक्षा के क्षेत्र में सेमिनार चाहे स्कूली शिक्षा के बड़े संस्थान जैसे एनसीइआरटी या उच्च शिक्षा के लिए यूजीसी आयोजित करवाए, उनका मुख्य उद्देश्य भी शिक्षा के उन्नयन, उत्कर्ष और गुणवत्ता होता है। अब प्रश्न है कि क्या उच्च शिक्षा परिसरों में होने वाले सेमिनारों से शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ी, अध्ययन, अध्यापन, अनुसंधान, प्रयोग और नवाचार की प्रवृत्ति बढ़ी और शिक्षा में उत्कृष्टता के मानक अपनाए गए? कुछेक अपवादों को छोड़ दें, तो अधिकतर उच्च शिक्षा के सेमिनार मात्र कागजी खानापूरी बन कर रह गए हैं। तकनीकी शिक्षा, मेडिकल शिक्षा, विज्ञान और प्रबंधन की कुछ उत्कृष्ट अखिल भारतीय कहलाने वाली संस्थाओं और अकादमियों द्वारा आयोजित सेमिनारों में कुछ सुधार आजमाए जाते हैं। मगर मानविकी, भाषा, अध्यापक शिक्षा और कॉलेज या विश्वविद्यालयों के विभागों द्वारा आयोजित सेमिनार मात्र फूहड़ मनोरंजन बन कर रह जाते हैं। ये सेमिनार यह सिद्ध नहीं कर पाए कि उनके विमर्श और निष्कर्ष से शिक्षा की गुणवत्ता या उत्कृष्टता बढ़ी। इनमें आने वाले प्रतिभागी पर्चे लिख या लिखवा कर लाते हैं और सेमिनार आयोजक संस्था में इस तरह जमा कर देते हैं जैसे किसी मकान या दुकान के कागज जमा कर दिए गए हों। अधिकतर पर्चे कहीं न कहीं से नकल या चोरी के होते हैं, संदर्भ सूची तो पूरी तरह फ्राड ही कही जा सकती है। पर्चों के इस कागजी ढेर से दो चार पर्चे चुन कर पढ़वा लिए जाते हैं या पावर पाइंट प्रेजेंटेशन करवा लिया जाता है। संवाद में भी दो-चार प्रतिभागी अपना मुंह खोलते हैं, जबकि सेमिनार की टेबल के आसपास बैठे हर प्रतिभागी को विषय के संबंध में अपनी राय देना आवश्यक है। भागीदारी जरूरी है।

सेमिनार पर बहस के दौरान कई बार आधे या एक तिहाई प्रतिभागी तो गायब ही हो जाते हैं। सेमिनार के जो भी निष्कर्ष निकलते हैं वे एक सजी-धजी रिपोर्ट के साथ छपवा कर दस्तावेज के रूप में भेज दिए जाते हैं, जिन्हें शायद ही कोई संस्था उस रिपोर्ट में की गई अनुशंसाओं और सुझावों को लागू करती हो। ऐसे में सेमिनारों से उच्च शिक्षा के स्तर का गुणवत्ता या उत्कृष्टता का तो प्रश्न ही नहीं उठता। सेमिनार, सिंपोजियम या उन्मुखीकरण उच्च शिक्षा के उत्कर्ष के लिए हैं। समस्याओं को संवादों से हल करने के लिए हैं, नए विचारों, प्रयोगों, नवाचारों को अपनाने के लिए हैं, अनुसंधान की दिशा में आगे बढ़ने के लिए हैं, ताकि उच्च शिक्षा का स्तर ऊंचा हो और हमारी उच्च शिक्षा, विश्व भर में बराबरी से प्रतिष्ठित हो। कितने दुर्भाग्य की बात है कि एक हजार से अधिक विश्वविद्यालय, सौ से अधिक उच्च शिक्षा संस्थान और अकादमी तथा लगभग तीस-चालीस हजार कॉलेजों के बावजूद शिक्षा का स्तर उठने के बजाय गिरता जा रहा है। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्रों की उपस्थिति, विशेष रूप से हिंदी क्षेत्र में काफी गिर गई है।

आखिर किन्हें पढ़ाएं? प्राध्यापक ही अपने दायित्व के प्रति ईमानदार नहीं रहे। अनेक प्राध्यापक राजनीति के धुरंधर बन कर नेताओं की छत्रछाया में कर्त्तव्यहीनता का घुमक्कड़ी सेमिनार कर रहे हैं। उत्कृष्टता बढ़े तो कैसे? संस्थाओं के ग्रंथालय धूल खा रहे हैं, संदर्भ सामग्री का अभाव है, लिखे जा रहे पर्चों पर किए जा रहे संदर्भ पुराने पर्चों, किताबों या शोधग्रंथों की संदर्भ सूची से चुराए गए हैं। प्रस्तुत किए जाने वाले पर्चों या पावर पाइंट प्रेजेंटेश में कोई नया विचार नहीं, नई चुनौती नहीं, किसी भी नए अनुसंधान के प्रति जिज्ञासा नहीं और यहां तक कि संवाद में ठीक से भागीदारी भी नहीं। ऐसे में सेमिनारों से उच्च शिक्षा को क्या मिला?
सेमिनार संवाद की संस्कृति है, विचार और विमर्श से उत्कर्ष की नई राह तलाशने का साधन है, लेकिन जब साधना रहित संस्थाएं और उनका स्टाफ होगा, तो सेमिनारों से उत्कृष्टात की उम्मीद करना बेकार है।

सेमिनार अगर शिक्षा में कर्म संस्कृति पैदा करते, कोचिंग क्लासों का व्यापारीकरण खत्म करते, ऊंची तनख्वाहों पर नौकरी पाने वाले प्राध्यापकों को अपने दायित्व के प्रति प्रेरित करते, छात्र-छात्राओं को कक्षाओं तक ले आते, उनके भी सेमिनार करते, सरकारी संस्थाओं की प्रतिष्ठा बढ़ाते और एक स्वतंत्र देश में शिक्षा की स्वायतत्ता की स्थापना कर दुनिया भर के विश्वविद्यालयों में हमारे देश का नाम न होने का कलंक धो देते तो माना जा सकता था कि सेमिनार से शिक्षा सुधरी, वरना एक बिगड़ी हुई व्यवस्था से सेमिनारों द्वारा सुधार की अपेक्षा करना केवल अपने ईमान पर आंसू बहाना है। अब तो सेमिनार देश-विदेश की सरकारी यात्रा बन कर या संस्थाओं के स्तरहीन संवादों की ऊब बन कर रह गए हैं। पूरी व्यवस्था ही जब गुणवत्ताविहीन है, तो सेमिनारों से उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और उत्कृष्टता कैसे बढ़ेगी?

सेमिनार, सेमेस्टर प्रणाली, उन्मुखीकरण और शोध ये मूल रूप से उच्चशिक्षा के स्तर की गुणवत्ता के लिए हैं, मगर इन्हें हमारा ही प्राध्यापक वर्ग कम पसंद करता है। सेमिनार से विचार की जो शृंखला बनती है, उसे गंभीरता से न लेने के कारण सेमिनार केवल ग्रांट लेने, नैक आदि से प्रमाणीकरण लेने और प्राध्यापकों के पद की आर्थिक कसौटी बन कर रह गए हैं। आज तक ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं आई, जिसमें यह लिखा हो कि सेमिनार से सचमुच शिक्षा का स्तर सुधरा है। इसलिए सेमिनार केवल अपनी संस्था से कहीं अन्य जगह जाने का पासपोर्ट है या कुछ ऊबे हुए लोगों का वाणी-सुख है। सेमिनार को गंभीरता तभी मिलेगी जब उसके निष्कर्षों पर कठोरता से अमल कराया जाकर उच्च शिक्षा के चेहरे को उज्ज्वल बनाने की कोशिश की जाए।

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