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प्रसंग : गीत को देश-निकाला

क्या हिंदी कविता एक लुप्त होती हुई विधा है? अभी जो कविता लिखी जा रही है, उसके पाठक नहीं हैं, जो हैं वे अपवाद स्वरूप हैं। कभी-कभी लगता है कि हिंदी में कवि अधिक हैं और पाठक कम।

Author नई दिल्ली | January 23, 2016 23:04 pm
क्या हिंदी कविता एक लुप्त होती हुई विधा है? अभी जो कविता लिखी जा रही है, उसके पाठक नहीं हैं, जो हैं वे अपवाद स्वरूप हैं। कभी-कभी लगता है कि हिंदी में कवि अधिक हैं और पाठक कम।

क्या हिंदी कविता एक लुप्त होती हुई विधा है? अभी जो कविता लिखी जा रही है, उसके पाठक नहीं हैं, जो हैं वे अपवाद स्वरूप हैं। कभी-कभी लगता है कि हिंदी में कवि अधिक हैं और पाठक कम। कवि लिखते हैं, कवि पढ़ते हैं या वे लोग पढ़ते हैं, जो साहित्य पढ़ने-पढ़ाने का धंधा करते हैं। समकालीन हिंदी कविता के पास अब प्राय: वैसे पाठक नहीं हैं, कविता जिनका धंधा न हो, फिर भी कविता आत्मिक सुख के लिए पढ़ते हैं। हिंदी में बड़ी मात्रा में कविता रची जा रही है, लेकिन छोटी मात्रा में भी उसकी खपत हिंदी समाज में दिखाई नहीं पड़ती। हिंदी में खूब बारीक, खूब जटिल, खूब कलात्मक कविताएं लिखने वाले कवियों के पास भी नाममात्र के पाठक हैं। मुख्यधारा के नाम पर जो कविताएं लिखी, छापी और प्रशंसित-पुरस्कृत हो रही हैं, वे सब हिंदी पाठक की समझ से परे हैं। ऐसे में हिंदी कविता की इस दशा के जिम्मेदार कारणों पर विचार करना जरूरी है।

कविता का अर्थ तुकांत-अतुकांत सबसे है, यानी सभी काव्यरूपों से। लेकिन अतुकांत कविता के अलावा तुकांत काव्यरूपों के लिए हिंदी कविता की तथाकथित मुख्यधारा में कोई जगह नहीं है। तुकांत काव्यरूपों में पहला स्थान गीत का है और दूसरा गजल का। हिंदी कविता ने प्रयोगवाद के साथ और उसके बाद जिस काव्यरूप को अवहेलित, उपेक्षित किया, वह गीत ही था। नई कविता के दौरान यह भाव और तीव्र हुआ। क्या प्रगतिशील और क्या गैर-प्रगतिशील, सबने गीत को हिंदी कविता से देश-निकाला दे दिया। विजयदेव नारायण साही, नामवर सिंह, अशोक वाजपेयी आदि ने ऐसे काव्य-निकष बनाए और ऐसी कविताओं की पीठ ठोंकी कि गीत लिखना दोयम दर्जे का कविकर्म लगने लगा।

गजल उर्दू का लोकप्रिय काव्य रूप है। हिंदी कवियों ने भी इसे अपनाया। भारतेंदु, निराला, शमशेर, त्रिलोचन, जानकीवल्लभ शास्त्री आदि ने अच्छी गजलें लिखीं, लेकिन गजल को हिंदी आलोचना ने कभी स्वीकृति नहीं दी। हालांकि हिंदी में गजल लिखने वालों की एक बड़ी जमात है, लेकिन उन्हें हिंदी के आलोचक कभी उद्धृत नहीं करते। दुष्यंत कुमार की गजलें हिंदी समाज में सबसे अधिक लोकप्रिय हुर्इं। लोग अक्सर उनके शेर उद्धृत करते हैं। लेकिन दुष्यंत को प्रगतिशील गैर-प्रगतिशील किसी खेमे में गंभीरता से नहीं लिया जाता। एक धारणा-सी बना दी गई कि गीत-गजल लिखने वाले प्राय: मीडियाकर हैं।
गीत हिंदी का अपना एक लोकप्रिय काव्यरूप है। माना जाता है कि गीत दिल का सीधा उद्गार है। उसमें विचार कम, दिल की भावनाएं अधिक व्यक्त होती हैं। हिंदी में गीत लेखन की लंबी परंपरा रही है। भारतेंदु से लेकर प्रसाद-निराला तक। निराला ने छंद के बंधन जरूर तोड़े, पर गीतों से उनका संग-साथ कभी न छूटा। हिंदी में गीत भावना और विचार दोनों को वहन करने वाला सशक्त काव्यरूप रहा है।

गीत हिंदी का जातीय काव्यरूप तो है ही, सबसे लोकप्रिय काव्य रूप भी रहा है। भक्तिकाल में पद के नाम से यह गीत ही था, जो सूर, तुलसी, मीरा, कबीर आदि की अमरवाणी का वाहक बना। महाकाव्य और खंडकाव्य जैसे कठिन काव्य-दुर्ग में प्रवेश की गीत भूमिका तैयार करता रहा। गीत की ताकत को आधुनिक काल के पूर्व के कवि तो जानते ही थे, आधुनिक काल के भी बड़े कवियों ने इसे पहचाना। भारतेंदु, मैथिलीशरण गुप्त, प्रसाद, निराला आदि ने हिंदी गीत को अमरता दी। गीत आधुनिक हिंदी कविता की जमीन को उपजाऊ बनाने में हमेशा सहायक रहे। गीत और गीत लिखने वाले कवियों की ओर हिंदी समाज हमेशा प्रेम और सम्मान से देखता रहा। जब तक हिंदी कविता में गीत रचना होती रही और उसे प्रबुद्ध समाज का प्यार मिलता रहा, हिंदी समाज कभी कविता विमुख नहीं हुआ, कविता और कवियों के प्रति जनता में आदर बना रहा। गीत के प्रति उदासीनता का सिलसिला प्रयोगवाद-नई कविता के साथ शुरू हुआ। क्षणवाद, व्यंग्य, विडंबना, तनाव आदि हिंदी कविता के मुख्य प्रतिमान बन गए। कविता रचना छंद से पूरी तरह मुक्त हो गई। अज्ञेय, मुक्तिबोध आदि ने भले कभी-कभार गीत लिखे हों, उनकी मुख्य अभिव्यक्ति का माध्यम गीत नहीं थे। गीत के प्रति सम्मान और गंभीरता का वह भाव जाता रहा, जो प्रयोगवाद के पूर्व था।
नई कविता के बाद कविता पूरी तरह छंदमुक्त और अतुकांत हो गई। ऐसी स्थिति में गीत लिखने वाले कवियों की एक अलग जमात सामने आई। शंभुनाथ सिंह, ठाकुर प्रसाद सिंह आदि नई कविता के समांतर नवगीत के गीतकार कहे जाने लगे। इस तरह कवि और गीतकार की दो श्रेणियां पहली बार हिंदी कविता में बनीं। कवि प्रथम श्रेणी के रचनाकार और गीतकार द्वितीय श्रेणी के, जैसी अघोषित धारणा विकसित होती गई। कवियों में अपने लिए श्रेष्ठताबोध और गीतकारों के लिए उपेक्षा का भाव आता गया।

कवि और गीतकार के विभाजन ने एक और काम किया। कवि सम्मेलनों में काव्यपाठ के जरिए कविता और जनता को जोड़ने का जो काम होता था, वह भी विभाजित हो गया। कवियों ने कवि सम्मेलनों में जाना एक तरह से बंद कर दिया। नागार्जुन, भवानीप्रसाद मिश्र, जानकीवल्लभ शास्त्री आदि शायद अंतिम पीढ़ी के कवि थे, जो कवि सम्मेलनों में जाते रहे और कविताएं सुनते-सुनाते रहे। कवि सम्मेलनों में काव्यपाठ जनता के काव्यबोध को बनाए रखने और उसे विकसित करने का एक सशक्त माध्यम था, जिसकी हिंदी की मुख्यधारा के कवियों ने उपेक्षा की। फल यह हुआ कि कवि-सम्मेलनों का मंच पूरी तरह सस्ते गीतकारों और फूहड़ हास्य कवियों के हवाले हो गया।

गीतों की रचना में बाधक बने वे काव्य निकष, जो नई कविता के दौरान विकसित हुए। क्षणवाद, व्यंग्य, विडंबना, तनाव आदि को अच्छी और श्रेष्ठ कविता की कसौटी माना गया और इन्हें ही श्रेष्ठ काव्य मूल्य के रूप में प्रतिष्ठित किया गया। श्रव्यता को पुरानी कविता का गुण घोषित करके उसे पठ्य बनाने पर जोर दिया गया। अज्ञेय ने तो बाजाप्ता इस पर लिखा भी और आधुनिक कविता के लिए श्रव्यता को अच्छा गुण नहीं माना।

हिंदी कविता जब छंद से मुक्त हुई थी तो कहा गया कि लय मुख्य है। बनावट-बुनावट की लय, भाषा की लय और भाव-विचार की लय के सहारे नई कविता और उसके बाद की कविता लिखी जाती रही। इधर के वर्षों में वैचारिक लय की प्रधानता बढ़ी। ऐसी कविताओं ने यथार्थ के सूक्ष्म अंकन के सुंदर उदाहरण पेश किए, लेकिन पाठक से उनकी दूरी कम नहीं हुई, कुछ बढ़ी ही। ऐसे में प्रश्न उठता है कि उर्दू कविता क्यों गजल और नज्म के अपने जातीय रूप विधान में आधुनिक और समकालीन बनी रही? क्यों अहमद फराज समकालीन भी लगते हैं और शायरी प्रेमियों में लोकप्रिय भी हैं? हिंदी के पास कोई अहमद फराज क्यों नहीं है?

उर्दू काव्य रूपों- गजल और नज्म- की तुलना में हिंदी में अनेक काव्यरूप हैं। गीत उसका सफल और दिल को छूने वाला शक्तिशाली काव्यरूप है। उसको तुक्कड़ कवि सम्मेलनी कवियों के भरोसे छोड़ कर हिंदी कविता का भला नहीं हो सकता। संप्रेषणीयता किसी कविता का दोष नहीं होती। व्यंग्य, विडंबना, तनाव ही कविता के सार्वभौम और स्थायी निकष नहीं हैं। यों हिंदी के अच्छे गीतकारों ने इस कसौटी की अनदेखी नहीं की। रमेश रंजक के एक गीत का टुकड़ा इस संदर्भ में द्रष्टव्य है: ‘अजगर के पांव दिए जीवन को और समय को डैने/ ऐसा क्या पाप किया था मैंने।’ समय की विडंबना यहां भी है। जरूरत है गीत के प्रति आलोचना दृष्टि बदलने की।

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