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चर्चाः कविता और मिथक – कविता में पुराकथा और जनमानस

आज अगर सूर और तुलसी जैसे कवि जन-जन के अपने कवि बने हुए हैं, तो कारण यही है कि पुराण चरित्रों को दार्शनिक आभा देते हुए उन्होंने जो काव्य-प्रतिभा प्रदर्शित की है उससे कविता और लोक के संबंधों में केवल निखार भर नहीं आया है, उदात्त सपनों के शिखर के भी अधिकारी दोनों हो उठे हैं।

Author October 28, 2018 3:53 AM
प्रतीकात्मक चित्र

साहित्य में पुराकथाएं या मिथक क्या भूमिका निभाते हैं? उनके माध्यम से क्या नए रूपक रचे जा सकते हैं या फिर इनका सहारा रचनाकार सिर्फ आवरण के रूप में लेता है। ऐसे सवाल जब-तब उठते रहते हैं। प्रगतिशील धारा इसे नकारती है। पर हकीकत यह है कि आज भी हिंदी कविता और कथा के क्षेत्र में पुराकथाओं और मिथकों के माध्यम से समकालीन विषयों को उठाने का प्रयास हो रहा है। इनके नए अर्थ खोलने के प्रयास हो रहे हैं। खासकर कविता में पुराकथाओं और मिथकों का क्या महत्त्व है, इस बार की चर्चा इसी पर। – संपादक

विजय बहादुर सिंह

उन्नीस सौ बानबे में संस्कृतिविद भगवान सिंह ने अपने चर्चित उपन्यास ‘अपने अपने राम’ के मुखपृष्ठ पर तुलसी के मानस की इन चौपाइयों को उद्धृत किया था- ‘एतेहु पर करिहंहि जे असंका/ मोहि ते अधिक ते जड़मति रंका। कबि न होऊं नहिं चतुर कहाऊं/ मति अनुरूप राम गुन गावऊं।’ जब उनसे पूछा गया कि उपन्यास में आपने वशिष्ठ को जिस रूप में चित्रित किया है, वहां कहां तक उचित और न्यायसंगत है, तो उन्होंने कहा कि मैंने तो वही किया है जो वशिष्ठ को लेकर वैदिक साहित्य में उपलब्ध है। पर उपन्यास के मुखपृष्ठ पर वे यह तो कबूल कर ही रहे हैं कि जो कुछ मैं लिख रहा हूं वह वैसा ही है जैसा तुलसी ने मानस की कथा रचते हुए अपने रचनाकार की आजादी को लेकर लिखा है- ‘मति अनुरूप राम गुन गावऊं।’ यानी पुराकथाओं के संदर्भ में रचनाकार की स्वतंत्रता है।

हड़प्पा सभ्यता और वैदिक साहित्य वाली चर्चित किताब में उन्होंने यह सप्रमाण प्रदर्शित किया है कि पुरखों ने सभ्यता के क्रमिक विकास सोपानों पर लिंग प्रतीक में पहले जलहरी और कृषि सभ्यता के काल में नंदी को महत्त्व देते हुए शिव लिंग जैसे प्रतीक को समृद्धतर किया है। इससे स्पष्ट होता है कि जमाने के यथार्थ के विकसित होने और बदलाव आने पर पौराणिक मान्यताओं के रूपों में भी विकास और बदलाव प्रकट होते चलते हैं। मानव सभ्यता यह कार्य स्वाभाविक और सहज ढंग से करती चलती है। साहित्य चूंकि मानव-अनुभवों की मूल पूंजी पर ही आश्रित रहता आया है, इसलिए उसमें देश और काल के अनुसार ये सृजनात्मक बदलाव होते ही चलते हैं। इन्हें नकारना या अनदेखा करने की कोशिश स्वयं रचनाकार को अप्रासंगिक बना देती है।

आज अगर सूर और तुलसी जैसे कवि जन-जन के अपने कवि बने हुए हैं, तो कारण यही है कि पुराण चरित्रों को दार्शनिक आभा देते हुए उन्होंने जो काव्य-प्रतिभा प्रदर्शित की है उससे कविता और लोक के संबंधों में केवल निखार भर नहीं आया है, उदात्त सपनों के शिखर के भी अधिकारी दोनों हो उठे हैं। हमारे अपने समय में निराला जैसे स्वच्छंद मनोभावों के सर्वतंत्र-स्वतंत्र कवि ने ‘राम की शक्तिपूजा’ जैसा पौराणिक आख्यान रच कर लोकजीवन के संघर्षों और परंपरा से चल कर हम तक आए ‘हृदयेन अपराजिता’ के सत्य को पुनर्जीवन-सा दे दिया है। याद करें तो मैथिलीशरण गुप्त, हरिऔध, दिनकर जैसे कवियों ने रामायण और महाभारत के, यहां तक कि लोकव्यापी पुराण श्रीमद्भागवत के चरित्रों को आधार बना कर पुराकथाओं को नई चमक दे दी है। मैथिलीशरण गुप्त का ‘जयद्रथवध’, ‘साकेत’; हरिऔध का प्रियप्रवास और दिनकर का ‘रश्मिरथी’ और ‘कुरुक्षेत्र’ इस संदर्भ में अविस्मरणीय हैं।

महाभारत-कथा तो लगभग प्रत्येक उदग्र प्रतिभा के लिए आकर्षण और चुनौती की कथा गद्य और पद्य दोनों में ही बनी रही है, सो भी संपूर्ण भारतीय भाषाओं में। इससे यह बात भी समझ में आती है कि हमारे अपने जीवन की निकटस्थ सच्चाइयों और रोज-रोज उठते-गिरते चरित्र के आसपास का जो यथार्थ है वह हमें कहीं अधिक लोमहर्षक और उद्दीपक लगता है। महान सर्जक जयशंकर प्रसाद का महाभारत को लेकर कहा यह वाक्य भूलता ही नहीं कि वह महान चरित्रों की क्षुद्रताओं की कथा है। जो भी हो, पर यह तो सच है कि हिंदी कविता में इन दोनों ग्रंथों और इनमें वर्णित चरित्रों को लेकर समय-समय पर महत्त्वपूर्ण लिखा गया है। धर्मवीर भारती का ‘अंधायुग’, नरेश मेहता का ‘संशय की एक रात’ के अलावा ठेठ पौराणिक चरित्र शंकर को लेकर लिखा गया दुष्यंत कुमार का काव्य-नाटक ‘एक कंठ विषपायी’ या फिर नागार्जुन जैसे चर्चित वामपंथी कवि का ‘भस्मांकुर’ हमें याद दिलाते हैं कि पुरा-कथाओं की ओर जाना अपनी जातीय स्मृतियों के प्रति रचनात्मक उत्तरदायित्व निभाना भी है। इस सांस्कृतिक आईने में बार-बार अपनी हकीकतों के नए चेहरों को देखना और पहचानना हम लेखकों और कवियों की एक सांस्कृतिक जिम्मेदारी है।

यहीं एक सैद्धांतिक सवाल भी उठता है कि हमारे यहां जो पुराण हैं, क्या वही पश्चिम में ‘माइथोलॉजी’ है? क्या दोनों समानार्थक हैं और एक-दूसरे के पर्याय के रूप में प्रयुक्त किए जा सकते हैं? कई संस्कृतिविदों के अनुसार यह शायद ही संभव किया जा सके, क्योंकि दोनों ही दो स्वतंत्र संस्कृतियों और वैचारिक अवधारणाओं की उपज हैं। पुराण कथाओं की अपनी स्वतंत्र परिभाषा और लक्षण हैं। ‘माइथोलॉजी’ संज्ञा पर विचार करने वाले विद्वानों ने यद्यपि इसे भी पश्चिमी धर्मगाथाओं के रूप में लिया है और मानवीय चरित्रों का लोकोत्तर उत्कर्ष दिखाते हुए उनका चित्रण देवोपम जैसा किया है, पर कइयों की दृष्टि में यह सब अन्योक्ति प्रधान कथन हैं, जिनमें बाद में परा-प्राकृतिक (सुपरनेचुरल) शक्ति का प्रवेश हो चला है। संभव है, इस बहाने इन धर्मगाथाओं के आधार पर प्राकृतिक व्यापारों को समझने की कोशिश की गई हो। पश्चिम में इस संदर्भ में एक और शब्द ‘लीजेंड’ आता है, जिसका केंद्र और आधार केवल और केवल मनुष्य होता है। फिर भी प्राकृतिक और परा-प्राकृतिक शक्तियों से इस शब्द का शायद ही कोई रिश्ता बनता हो।

पुराणों या पुराकथाओं को लेकर अपने यहां विपुल सामग्री तो है ही, प्रचुर सृजनात्मक साहित्य भी है। इसे वेदोत्तर वांगमय को जब-तब वेदों से पहले का भी कह दिया गया है। कालिदास और भवभूति जैसे रचनाकारों ने तो ‘अभिज्ञान शाकुंतल’ और ‘उत्तर रामचरित’ में महाभारत और रामायण की कथाओं को ही आधार बनाया है। कामायनीकार जयशंकर प्रसाद ने जरूर जिस देवासुर संग्राम का जिक्र किया है, उसका संबंध स्पष्टत: पुराणों से ही लिया है। दिनकर जी के मतानुसार- ‘यह घटना भी तभी घटी थी, जब आर्य भारत नहीं आए थे और भारत के अंतर्गत पश्चिमोत्तर भारत से लेकर ईरान तक का भूभाग एक ही देश के समान शामिल रहा होगा।’

पुराण में वैदिकेतर सामग्री काफी है। दूसरे यह सृष्टि के आरंभिक विकास की कथा से लेकर भारत के अनेक प्राचीन राजवंशों का सांकेतिक या लाक्षणिक इतिहास भी समेटे हुए है। तीसरे, यह ब्राह्मणेतर शूद्र एवं व्रात्य जातियों के बीच भी समान अधिकार भाव से श्रवण योग्य है। ब्राह्मणों ने वेदों की तरह पुराणों पर अपना कोई कब्जा या दबदबा कभी प्रदर्शित नहीं किया। हां, धर्मग्रंथों जैसी प्रतिष्ठा तो इन्हें आज भी सहज प्राप्त है। इस विवादास्पद चर्चा के बावजूद यह कहना फिर भी जरूरी है कि आम भारतीय जनमानस पर हमारे पुराणों का गहरा असर है। इन्हीं से शक्ति और रस ग्रहण कर सूर-तुलसी जैसे महान कवि आज भी कांतिवान हैं। निराला का उल्लेख हो ही चुका है। अपवादस्वरूप पश्चिम के मिथकों तक भी अज्ञेय और धर्मवीर भारती ने जाने की पहल और कोशिश तो की, पर इस कोशिश में वे सफल इसलिए नहीं हो पाए कि आम भारतीय जनमानस में इन कथाओं और चरित्रों की कोई पैठ नहीं थी। गालिब इस्लाम और फिराक हिंदू पुरा-कथाओं का उपयोग करते हैं। तब यह निष्कर्ष निकाल लेना तर्कसंगत नहीं होगा कि हमें अपने युगीन यथार्थ और सत्यों को आम जनमानस तक पहुंचाने के लिए उन्हीं की पौराणिक कथाओं का सहारा लेना होगा, जिनका संबंध हमारी अपनी परंपरा और लोकचेतना से होगा।

इस संदर्भ में हमारी आधुनिकता या उत्तर-आधुनिकता शायद ही बाधक बने। अंतत: इनका संबंध भी हमारे अपने राष्ट्रीय विकास और उत्तर विकास से ही होगा। इनसे किनारा कर हम न तो ब्रेख्त बन सकते हैं, न नेरूदा। हमें अपने ही राष्ट्रीय संदर्भों में अपनी क्रांतिकारी चेतना के अदृश्य शक्तिपुंजों की तलाश करनी होगी। और यह इसलिए भी जरूरी है कि हमारी रचनात्मकता और इसके साथ जुड़ी संप्रेषणशील बौद्धिकता ही इस लोक समाज का नया पथ-प्रदर्शन कर सकेगी।

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