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तीरंदाज: एक टुकड़ा धूप

उसके सवाल ने मुझे एक पल के लिए अवाक कर दिया। मैं सोच में पड़ गया। चारों ओर से घिरे होने की वजह से समय का सूर्य मुझ तक पहुंच नहीं पाता है। ऊंचा और ऊंचा बनने की होड़ में मैंने उसे अवरुद्ध कर दिया है।

फाइल फोटो।

मुझे भी एक टुकड़ा धूप चाहिए।’ बड़े अल्हड़पन से मेरी धूप पर उसने अपनी दावेदारी की छाया डाल दी।
मैं बिना नजर उठाए पार्क की बेंच पर एक तरफ खिसक गया। अपना हक पाकर वह खिलखिला उठी।
‘अरे वाह, आप तो फौरन मान गए। थोड़ी-सी धूप थी आपके पास और उसको भी आप बांटने में हिचके नहीं।’ उसने बैठते हुए बेतकल्लुफी से कहा।
इमारतों की भीड़ को लांघ कर बालिश्त भर धूप पार्क की एक बेंच तक पहुंचती है। कहीं और नहीं है, बस इस बेंच के आधे हिस्से में वह भी सिमटी बैठी है।
‘मैं उसके साथ था, अब तुम भी हो… दो से तीन भले।’ मैंने कहा और पहली बार उस अजनबी आवाज से तार्रूफ के लिए मुखातिब हुआ।

‘दो ठीक रहते हैं। तीन होते ही भीड़ बन जाते हैं।’ उसने मुस्करा कर कहा।
‘हां, पर यहां तीसरा शांत है। सिर्फ अपनी गुनगुनाहट से मौजूदगी का एहसास दिला रहा है।’
‘पुरानी स्मृति की तरह?’

उसके सवाल ने मुझे एक पल के लिए अवाक कर दिया। मैं सोच में पड़ गया। चारों ओर से घिरे होने की वजह से समय का सूर्य मुझ तक पहुंच नहीं पाता है। ऊंचा और ऊंचा बनने की होड़ में मैंने उसे अवरुद्ध कर दिया है। अपनी महत्त्वाकांक्षा से उसकी गुनगुनाहट को ठंडा कर दिया है। अपने जीवन की रोशनी और गरमाहट को अवरुद्ध कर दिया है। क्या मैं रोज दोपहर में अपने बंद सीलन भरे कमरे से बाहर एक टुकड़ा धूप तलशता हुआ इसलिए आ जाता हूं, क्योंकि वह कोई स्मृति जगा देती है? मुझे जिंदा कर देती है?

मेरी चुप्पी से वह समझ गई थी कि उसके सवाल ने मुझे विस्मित कर दिया है। ‘जब तक याद है सब साथ है।’ उसने हौले से कहा।
‘हां,’ मैंने सिर हिलाया, ‘सब साथ है। पर अगर छूट गया तो? क्या साथ नहीं छूट रहे हैं?’
‘समय सब छुड़ा देता है- घर, सामान, अपने-पराए और अंत में सांस भी।’

‘तो फिर क्यों समेटें? अपने हिस्से की धूप भी क्यों समेटें? और तुम भी क्यों मांग रही थी अपने टुकड़े की धूप?’
‘मैं नहीं मांग रही थी। समय मांग रहा था।’
‘समय को क्या जरूरत है?’

‘जरूरत नहीं है’, उसने मेरा हाथ पकड़ कर अपने हाथ में ले लिया, ‘यह उसकी रीत है।’
‘और मेरी?’
‘भूलना और याद रखना। जो आज याद है, कल हम भूल जाते हैं और फिर किसी दिन वह भूला हुआ फिर याद आता है। वर्तमान में भूल जाना होता है, क्योंकि कल्पना नए बीजों से अंकुरित होती है। वर्तमान का भविष्य कल्पना है। पुराने को भूल कर ही कुछ नया बन सकता है।’
‘फिर स्मृति?’

‘स्मृति धरती है।’ उसने मुस्करा कर कहा।
मैं फिर असमंजस में पड़ गया था।

‘धरती अपने से कुछ नहीं करती’, उसने कहा, ‘पर उसके बिना कुछ हो भी नहीं सकता है। स्मृति धरती की तरह होती है। हम जो भूल जाते हैं, वह उसका उर्वरक है- यानी हमारे अनुभव, वर्तमान के श्रम से उसकी जुताई होती है और कल्पना के बीज उससे फसल देते हैं।’
‘तुम ठीक कह रही हो’, मैंने कहा, ‘पर तुम कौन हो? तुम्हारा नाम क्या है?’

‘नाम से क्या फर्क पड़ता है?’
‘हां, वैसे तो कोई फर्क नहीं पड़ता, पर फिर भी हर चेहरे के लिए एक अलग संबोधन होना जरूरी है।’
वह हंसने लगी। ‘मान लीजिए कि पहली बार आप दो फल देख रहे हैं। एक सेब है और दूसरा अमरूद। पर अगर कोई व्यक्ति आपका परिचय सेब को अमरूद कह कर कराए, तो आप उसे अमरूद ही कहने लगेंगे न?’
‘हां, बिलकुल।’

‘तो फिर ऐसा ही समझ लीजिए मेरे बारे में।’
मैं उसकी बात पर हंस पड़ा। ‘तो मैं तुम्हे अमरूद कहूं क्या?’
‘हां, क्यों नहीं? हो सकता है मैं अमरूद ही हूं और अगर नहीं भी हंू तब भी आपके लिए तो सेब नहीं हंू।’
हम दोनों इस बात पर हंसने लगे। एक क्षण बाद वह रुकी और उसने बड़ी गंभीरता से पूछा, ‘नाम जो भी रख लें, पर दोनों फलों को एक ही नाम से बुलाया जा सकता है?’

‘नहीं’, मैंने कहा।
‘क्यों नहीं?’
‘क्योंकि दोनों की आकृति अलग-अलग है और उनका स्वाद भी।’
‘इसका मतलब दोनों से उत्पन्न अनुभव अलग-अलग हैं?’
‘हां।’

‘तो क्या नाम से अनुभव बदल जाते हैं?’
‘नहीं, पर नाम होने से अपेक्षाएं जरूर निर्धारित हो जाती हैं। यह सेब है तो इसका अनुभव ऐसा होगा और यह अमरूद है तो उसके नाम से ही स्वाद का पूर्वानुमान हो जाता है।’

‘अनुभवों का पूर्वानुमान क्यों हो? हमे ऐसी लालसा क्यों रहती है?’
‘मुझे नहीं पता।’
‘मुझे पता है। क्योंकि हम निर्भीक नहीं हैं। हम अनुभवों से डरते हैं।’
‘डरना भी चाहिए’, मैंने कहा, ‘हर अनुभव अच्छा नहीं होता है। और बुरे अनुभव कौन चाहता है?’
‘चाहने न चाहने से क्या होता है? आप कितना भी नाप-तोल लीजिए, पर हर अनुभव अच्छा नहीं होगा।’
‘पर बुरे से बचने की कोशिश तो की जा सकती है?’

‘बेकार कोशिश है’, उसने मुंह बनाते हुए कहा, ‘निर्भीक होना ज्यादा बेहतर है। हमेशा ऊहापोह की स्थिति में रहना ही अपने में एक दीर्घकालीन बुरा अनुभव है, जिसके चलते कोई अच्छा अनुभव नहीं हो सकता।’

मैं सोच में पड़ा गया। ‘तुम ठीक तो कह रही हो, पर क्या नाप-तोल का दूसरा नाम विवेक नहीं है?’
‘नहीं। भीरु व्यक्ति कभी विवेकशील नहीं हो सकता है। विवेक के इस्तेमाल के लिए कलेजा चाहिए, इसलिए केवल साहसी विवेक की तलवार भांज सकते हैं।’
‘पर यह तुम कैसे कह सकती हो?’

‘अनुभव से’, उसने कहा।
‘हम्म… अनुभव?’ मैंने उसकी ओर देखा। देखने में तो कम उम्र की लग रही थी। अचानक फिर से पुराना सवाल पूछने से मैं अपने को नहीं रोक पाया।
‘पर तुम हो कौन?’
वह अब धूप के बिखरे हुए टुकड़े से खिलखिलाते हुए उठी और पूरी शोखी से चल दी।
‘पर तुम हो कौन?’ मैंने पीछे से फिर आवाज दी।
‘स्मृति’, उसने एक पल रुक कर जवाब में कहा और फिर अदृश्य हो गई।

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