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मुद्दा: मंदिर निर्माण की अड़चनें

राम मंदिर का निर्माण भीड़ जुटा कर नहीं, निर्णयों द्वारा ही संभव है, जिसमें लंबा समय भी लगेगा। इसलिए राम मंदिर निर्माण को लेकर इन दिनों चलाए जा रहे प्रचार से यह संदेश जाता है कि सरकार निर्माण के बजाय इस मामले को गरम बनाए रखने की दिशा में ही प्रयत्न कर रही है।

Author October 28, 2018 3:54 AM
राम मंदिर निर्माण को लेकर इन दिनों चलाए जा रहे प्रचार से यह संदेश जाता है कि सरकार निर्माण के बजाय इस मामले को गरम बनाए रखने की दिशा में ही प्रयत्न कर रही है।

इन दिनों सत्तापक्ष से जुड़े कुछ नेता निरंतर यह प्रचार कर रहे हैं कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का शुभारंभ छह दिसंबर के पूर्व आरंभ हो जाएगा। इससे पहले दिल्ली में विश्व हिंदू परिषद की बैठक में भी यह बात उठी थी कि इस वक्त जब केंद्र और पंद्रह राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं, ऐसी स्थिति में भी अगर मंदिर निर्माण नहीं आरंभ हो सका तो रामभक्तों में अविश्वास पनपेगा और इसका प्रभाव 2019 के लोकसभा चुनावों में पड़े बिना नहीं रहेगा। विश्व हिंदू परिषद की ओर से निरंतर यह प्रचार चल रहा है कि अयोध्या में राममंदिर निर्माण अब स्वप्न नहीं, बल्कि जल्दी ही यह हकीकत में बदल जाएगा। उस रास्ते की सभी बाधाएं समाप्त हो चुकी हैं।

विश्व हिंदू परिषद की ओर से राम मंदिर आंदोलन के दौरान निरंतर यह प्रचार किया जा रहा था कि इसका निर्धारण करने में कोई अदालत सक्षम नहीं है। यह तो संतों के निर्देश और इनके सुझावों के अनुसार होगा। मगर कठिनाई यह थी कि भारत के संविधान में संतों को न तो कोई विशेषाधिकार है, न वे अपनी इच्छा और अपेक्षा के अनुसार कोई ऐसा कार्य करने में सक्षम हैं, जो विधि सम्मत हो। यही कारण है कि देश के कम से कम सात विशिष्ट लोग, जो अपने को ईश्वर का रूप कहते थे, उनकोे मानने वालों की संख्या भी करोड़ों में कही जाती है, जिनकी आरती उतारी जाती थी, जिन्हें मनुष्य कोटि के बजाय विशिष्ट कोटि में गिना जाता है, वे आज अदालत के आदेशों से जेल की सजाएं भुगत रहे हैं। कइयों को तो जमानत तक नहीं मिली। यह इस धारणा को समाप्त करता है कि ये साधु-संन्यासी कानून से अधिक शक्तिशाली हैं।

जहां तक अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का प्रश्न है, तो रामभक्तों का एक बड़ा समुदाय है जिसकी आकांक्षा राम की जन्मस्थली पर मंदिर बनाने की है। यह समुदाय करोड़ों नहीं, अरबों रुपए की सहायता करने के लिए भी तत्पर है। जिस स्थल पर मंदिर की आवश्यकता बताई जाती है, वह बाबरी मस्जिद के बजाय रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवादित स्थल के रूप में प्रचारित किया जाता है। वह स्थल 6 दिसंबर, 1992 को विश्व हिंदू परिषद की जुटाई भीड़ द्वारा ध्वस्त किया जा चुका है। लेकिन ध्वस्त स्थल पर मंदिर बन सकता है, अगर यह मान्यता सही होती, तो पिछले छब्बीस वर्ष से इसकी प्रतीक्षा न करनी पड़ी होती।

आज भी आंदोलन के कई विशिष्ट नेताओं, फैजाबाद के जिलाधिकारी और पुलिस कप्तान पर आपराधिक मामला न्यायालय में विचाराधीन है। सर्वोच्च न्यायालय भी इसका शीघ्र निपटारा चाहता है, लेकिन मंदिर निर्माण में लखनऊ उच्च न्यायालय के तीन जजों का फैसला, जिसकी अपील उन तीनों पक्षों ने दायर की है, जिनके पक्ष में विवादित स्थल को तीन भागों में बंटवारे का फैसला हुआ था, पर सुनवाई आरंभ हो गई है। इसमें यह स्पष्ट कर दिया गया है कि यह मामला किसी आस्था, विश्वास, धर्म और मान्यता पर नहीं, बल्कि भूमि कानून के अनुसार ही चलेगा।

इसलिए इस प्रकरण में यह सवाल उठता है कि जब लाहौर में जिस मस्जिद को गिरा कर सिखों ने गुरुद्वारा बनाया था, वह पाकिस्तान के इस्लामी शासन के बावजूद अभी तक बदला नहीं जा सका, बल्कि गुरुद्वारा यथावत विद्यमान है। भारत और पाकिस्तान में बजाब्ता दीवानी वही लागू है, जिसे अंग्रेजों ने 1864 में बना कर लागू किया था। अंग्रेजों के काल के दीवानी मामले में बारह वर्षों की वह सीमा भी लागू है, जो कब्जेदार को स्वामित्व का अधिकार प्रदान करती है। इसलिए इसे इस प्रसंग से अलग नहीं किया जा सकता।

इस प्रसंग में बाबरी मस्जिद के ध्वस्त हो जाने के बाद 7 जनवरी, 1993 को अयोध्या विशिष्ट क्षेत्र भूमि अधिग्रहण अध्यादेश आया था। बाद में इसे संसद ने कानून के रूप में परिवर्तित कर दिया था। उसके बाद 24 अक्टूबर, 1994 को संविधान पीठ के पांच सदस्यों ने इस स्थल पर राममंदिर, मस्जिद, पुस्तकालय, वाचनालय, संग्रहालय और तीर्थयात्रियों की सुविधा वाले स्थानों का निर्माण करने को कहा है। संविधान पीठ ने इस अध्यादेश को वैध माना है और मुसलिमों का यह कथन कि मस्जिद धार्मिक स्थल है, जिसका अधिग्रहण नहीं हो सकता, अस्वीकार कर दिया है।

मगर संसद के कानून के बावजूद उसके प्रावधानों के आधार पर निर्धारण इसलिए नहीं हो पाया, क्योंकि संविधान पीठ ने इस मामले में चल रहे मुकदमे को समाप्त करने के लिए जो व्यवस्था की थी, उसे न्यायालय ने संविधानेतर मान लिया है। इसी मामले में यह भी व्यवस्था दी गई है कि जो पक्ष स्वामित्व वाला मुकदमा जीते, उसे बड़ा भाग और जो हारे उसे छोटा भाग दिया जाए। पर विश्व हिंदू परिषद के लोग निरंतर यह प्रचार करते हैं कि अयोध्या में मस्जिद नहीं बनने देंगे। अब सवाल उठता है कि क्या यह देश और संविधान उनकी इच्छाओं के अनुसार चलेगा या निर्धारित प्राविधानों के?

इस विचाराधीन अपील पर तीन न्यायधीशों की पीठ सुनवाई कर रही है, जो संविधान पीठ के किसी निर्णय को समाप्त करने में सक्षम नहीं है। अब विश्व हिंदू परिषद की ओर से यह आवाज उठाई जा रही है कि संसद प्रस्ताव पारित करके मंदिर निर्माण आरंभ कराए। इस रास्ते में सबसे बड़ी बाधा 1993 में बना कानून है। एक ही विषय पर संसद दो व्यवस्थाएं नहीं कर सकती। संसद अपनी शक्ति का प्रयोग करके किसी कानून को समाप्त तो कर सकती है, लेकिन किसी अध्यादेश से नहीं। इसलिए क्या 6 दिसंबर से पूर्व इन बाधाओं से मुक्ति के लिए कदम उठाए जा सकते हैं? क्या प्रधानमंत्री देश में यह संदेश देने के पक्ष में हैं कि देश के सर्वोच्च न्यायालय, जिसमें यह प्रसंग विचाराधीन है, उस पर उनका विश्वास नहीं है?

साथ ही अगर संसद कोई कानून बनाएगी भी तो उसकी वैधता पर अंतिम निर्णय तो सर्वोच्च न्यायालय के अधीन ही होगा कि कहीं वह संविधानेतर प्रयत्न तो नहीं? या वह संविधान के अनुच्छेद-21 और 25 के प्रावधानों के विपरीत तो नहीं? इस प्रकार राम मंदिर का निर्माण भीड़ जुटा कर नहीं, निर्णयों द्वारा ही संभव है, जिसमें लंबा समय भी लगेगा। इसलिए राम मंदिर निर्माण को लेकर इन दिनों चलाए जा रहे प्रचार से यह संदेश जाता है कि सरकार निर्माण के बजाय इस मामले को गरम बनाए रखने की दिशा में ही प्रयत्न कर रही है।

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