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दोहरी मानसिकता का समाज

क्यों आज इक्कीसवीं सदी में भी संविधान के मूल्यों- समानता, स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय को हम अपनी जिंदगी का हिस्सा नहीं बना पाए? क्यों अनेक नारीवादी आंदोलनों के बावजूद स्त्री-पुरुष की समानता का तर्क यथार्थ का रूप नहीं ले सका? क्यों समाज बलात्कार होने पर लड़की का तिरस्कार करता है, लड़के का नहीं?

Author September 2, 2018 3:43 AM
महिलाओं के विरुद्ध बढ़ती हिंसा को देखते हुए पिछले कुछ समय से महिला सुरक्षा का मुद्दा व्यापक बहस का विषय बना हुआ है। इसके मद्देनजर पहली बार लैंगिक सुरक्षा मानक जारी किया गया।

ज्योति सिडाना

महिलाओं के विरुद्ध बढ़ती हिंसा को देखते हुए पिछले कुछ समय से महिला सुरक्षा का मुद्दा व्यापक बहस का विषय बना हुआ है। इसके मद्देनजर पहली बार लैंगिक सुरक्षा मानक जारी किया गया। शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी और हिंसा के आधार पर यह सूचकांक तैयार किया गया। इसमें गोवा सबसे सुरक्षित राज्य है, उसके बाद केरल, मिजोरम, सिक्किम हैं। बिहार सबसे असुरक्षित राज्य है। उसके बाद दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान आदि का स्थान है। सूचकांक से स्पष्ट होता है कि उत्तर भारत के राज्यों की तुलना में दक्षिण और पूर्वोत्तर में महिलाएं ज्यादा सुरक्षित हैं। सवाल है कि महिलाएं आर्थिक और सामाजिक रूप से जितनी सशक्त हुई हैं, उनके विरुद्ध हिंसा की घटनाएं उतनी ही ज्यादा क्यों बढ़ी हैं?

नारीवादी लेखिका मेरी वुलस्टोनक्राफ्ट के अनुसार अगर स्त्री-पुरुष को समान शिक्षा दी जाए, तो समाज में भी वे समान अवसर प्राप्त कर सकेंगी। वे समाज में स्त्रियों की स्थिति बेहतर बनाने के लिए व्यवस्था परिवर्तन की नहीं, बल्कि स्थापित व्यवस्था में कानूनी परिवर्तनों के माध्यम से समानता की राह तलाशने की हिमायती हैं। जॉन स्टुअर्ट मिल कहते हैं कि इसमें कोई संदेह नहीं कि समाज में एक बड़ी संख्या उन व्यक्तियों की है, जो अपने मूलभूत स्वरूप- पशुत्व और स्वार्थ- पर सभ्यता का मुखौटा चढ़ाए हुए हैं। शायद बलात्कार की घटनाओं में वृद्धि का यह भी एक महत्त्वपूर्ण कारण हो।

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इतिहास साक्षी है कि सदियों से महिलाओं पर अपना नियंत्रण/ स्वामित्व स्थापित करने के लिए पुरुष सत्तात्मक समाज प्रयासरत रहा है, महिला को हमेशा से पहले पिता की और फिर पति की संपत्ति के रूप में देखा जाता रहा है। अनेक अध्ययनों में यह सामने आया है कि बलात्कार का प्राथमिक लक्ष्य यौन-इच्छा की पूर्ति नहीं, बल्कि महिला पर हिंसा के साथ आधिपत्य स्थापित करना होता है। कई बार लड़की द्वारा उसके प्रेम प्रस्ताव की उपेक्षा, उससे दोस्ती करने से इंकार करना, प्रोफेशन में उससे आगे बढ़ जाना या तरक्की करना जैसे पक्ष भी इस प्रकार की हिंसा का कारण बनते हैं, क्योंकि लड़की द्वारा किसी भी प्रस्ताव के लिए इंकार करना उसके अहं को गवारा नहीं होता।

समाज विज्ञानी मानते हैं कि बलात्कारियों की पांच श्रेणियां होती हैं: पहला, निम्न सामाजिक-आर्थिक स्थिति वाले पुरुष, जिन्हें अवांछित साथी के रूप में स्वीकार किया जाता है, प्रजनन के लिए बलात्कार का सहारा लेते हैं। दूसरा, वे लोग जो यौन संबंधों की तुलना में बलात्कार से अधिक उत्तेजित होते हैं। तीसरा, ऐसे लोग जो बलात्कार इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें दंड का खतरा कम हो सकता है, उदाहरण के लिए विपदा की स्थिति में किया गया बलात्कार, जहां वे पीड़िता की मजबूरी का लाभ उठाते हैं। चौथा, ऐसे पुरुष जो बहुत अनौपचारिक सेक्स चाहते हैं, उनके पास उच्च आत्मसम्मान है और इनकार उन्हें पसंद नहीं है। पांचवां, ऐसे पुरुष जो अपनी पत्नी पर संदेह करते हैं या उन्हें बेवफाई का शक होता है या रिश्ते टूटने के बाद वे इस प्रकार की हिंसा करते हैं।

मनोवैज्ञानिक नॉर्म स्पांसर के अनुसार मनुष्य के व्यवहार पर सर्वाधिक प्रभाव वंशानुगतता की अपेक्षा सामाजिक दबाव और संस्कृति का पड़ता है। जब कोई महिला पुरुष को ‘ना’ या ‘रुको’ कहती है, अपने व्यवहार पर प्रश्न उठाने के बजाय वे महिलों पर इसका गुस्सा निकालते हैं। मनोवैज्ञानिक पीटरसन के अनुसार जो लोग मानते हैं कि बलात्कार के बाद वे बिना किसी दंड के छूट जाएंगे, वे ऐसे दुष्कर्मों में अधिक संलग्न होते हैं। दूसरी तरफ, समाजशास्त्री यौन हिंसा और सामाजिक समर्थन के मध्य सकारात्मक संबंध पाते हैं। विभिन्न अध्ययनों में उन्होंने पाया कि जिन पुरुषों के पास ऐसे मित्र या साथी होते हैं, जो महिलाओं के प्रति आक्रामकता को स्वीकृति प्रदान करते हैं, उन लोगों के आक्रामक व्यवहार में शामिल होने की संभावना अधिक होती है। यह एक तथ्य है कि इनमें से कुछ पुरुष हिंसा और जोखिम को मर्दानगी के रूप में देखते हैं। पर समाजशास्त्री यह भी मानते हैं कि इसके कोई प्रमाण नहीं हैं कि मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्तियों की तुलना में मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति ही इस तरह के कृत्यों में शामिल होते हैं। ऐसे अनेक उदाहरण देखे जा सकते हैं जिनमें मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति ही दोषी पाए गए हैं।

जब किसी महिला का बलात्कार या उसके साथ किसी भी तरह की हिंसा होती है तो सारा समाज उसके पीछे औरत की ही गलती ढूंढ़ने लग जाता है, जैसे उसके कपड़े छोटे या कम थे, देर रात को अकेले घर से बाहर थी, लड़कों के साथ घूमती है, आवारा है, आदि। हमारी परवरिश कुछ इस कदर की गई है कि हम हर बात के लिए लड़कियों को ही दोषी ठहराते हैं। क्यों है ऐसी मानसिकता? कुछ अरसा पहले एक खबर के अनुसार स्कूल में एक लड़की के साथ उसके ही सहपाठी ने दुष्कर्म किया, पर स्कूल का इंसाफ देखिए, उस लड़के को स्कूल आने से नहीं रोका, लड़की को स्कूल से निकाल दिया ताकि दूसरी लड़कियों पर बुरा असर न पड़े। उस लड़की का लड़की होना ही सबसे बड़ा दोष है या उसका लड़की होना पुरुष समाज को यह अधिकार दे देता है कि वह उसके साथ कुछ भी कर सकता है?

महाश्वेता देवी ने लिखा है- ‘वर्तमान युग के पुरुष ने स्त्री के वास्तविक रूप को न कभी देखा था, न वह उसकी कल्पना कर सका।’ स्त्री के परिचय का आदि-अंत इससे अधिक और क्या हो सकता था कि वह किसी की पत्नी है, पुत्री है, बहन है, पर इंसान नहीं है। इस धारणा ने ही संभवत: स्त्री-पुरुष के बीच असंतोष को जन्म दिया। पुरुष द्वारा स्त्री को महज सजावट की वस्तु मानना, यौन-इच्छा पूर्ति का साधन मानना, बिना मस्तिष्क के शरीर के रूप में स्वीकार करना न केवल उसके अस्तित्व को नकारने के समान, बल्कि उसके प्रति विश्वासघात भी है।

क्यों आज इक्कीसवीं सदी में भी संविधान के मूल्यों- समानता, स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय को हम अपनी जिंदगी का हिस्सा नहीं बना पाए? क्यों अनेक नारीवादी आंदोलनों के बावजूद स्त्री-पुरुष की समानता का तर्क यथार्थ का रूप नहीं ले सका? क्यों समाज बलात्कार होने पर लड़की का तिरस्कार करता है, लड़के का नहीं? क्यों मंदिरों में स्त्री के देवी रूप की पूजा की जाती है और मंदिर के बाहर घर या सड़कों पर उसका शोषण करने से भी गुरेज नहीं होता? इन प्रश्नों पर गहन चिंतन की जरूरत है। इसके लिए आवश्यक है कि महिला खुद अपना सम्मान करना सीखे, अपने बच्चों को समान शिक्षा और समान संस्कार दे, लड़का-लड़की में अंतर करना बंद करे, अपने पुत्र/ भाई को महिलाओं का सम्मान करने की शिक्षा दे, लड़की को डर कर जीना सिखाने के बजाय मानसिक रूप से मजबूत बनाए, उसे हर जोखिम का सामना करना और संघर्ष करना सिखाए, शायद तभी समाज की मानसिकता में महिलाओं के प्रति सोच में बदलाव और महिलाओं के प्रति हिंसा में कमी लाई जा सके। समाजीकरण की प्रक्रिया में बदलाव लाकर ही इस समस्या से निजात पाया जा सकता है।

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