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सिनेमा : नजर और नजरिया

निश्चित रूप से फिल्म की संवेदना और सरोकारों का असर सभी दर्शकों पर स्थायी नहीं रहता। वे मनोरंजन के तराजू से फिल्मों को ज्यादा याद रखते हैं।

Author नई दिल्ली | March 26, 2016 11:24 PM
मार-धाड़ और सेक्स से भरपूर फिल्में निश्चित रूप से मानवीय सरोकारों की उपेक्षा करती हैं।

क्या सिनेमा देखने की कोई एकमात्र दृष्टि हो सकती है? बहुत से लोग सिनेमा को विशुद्ध मनोरंजन का माध्यम मानते हैं और उसको इसी रूप में बनाए रखने के हिमायती हैं। जबकि कुछ लोग इसे एक समर्थ कला माध्यम के रूप में देखते और इससे मनोरंजन से अधिक की अपेक्षा रखते हैं। हमें दर्शक को ध्यान में रखते हुए सोचना पड़ेगा कि इनमें से सही कौन हैं। और फिर दर्शक एक ही समय में केवल दर्शक नहीं होता। वह अलग-अलग रुचियों और अनुभवों का प्रतिनिधित्व करता है। सबके दृष्टिकोण अलग-अलग हो सकते हैं। एक वर्ग ऐसे समीक्षक-दर्शक का है, जिसे विश्व सिनेमा का ज्ञान है, जिसने ईरान की संवेदनशील फिल्में देखी हैं और हॉलीवुड की नई-पुरानी फिल्में भी उसने देख रखी हैं। एक वर्ग है जो सपरिवार फिल्म देखने जाता है और दिल बहला कर घर लौटना चाहता है। एक वर्ग है, जो घर से भाग कर सिनेमाहॉल जाता है और सिनेमा के पात्रों के जरिए अपने सपनों को रूपाकार देता है। एक वर्ग है, जिसके पास सपने ही नहीं हैं। वह दिन भर की थकान भुलाने और अपने जीवन की वास्तविकताओं से दूर जाने के लिए सिनेमाघर में घुसता है। सबके सिनेमा देखने के अनुभव और दृष्टियों में फर्क होगा।

हाल में एक इतिहासकार को कहते सुना कि अच्छी फिल्म वही है जो बार-बार देखी जाए। जो दर्शकों को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, ऐतिहासिक मुद्दों के प्रति जागरूक करती हो, दर्शकों के मन को झकझोरती और एक नई दृष्टि देती हो। एक दूसरे अवसर पर यह सवाल उठाया गया कि हिंदी में ‘मसान’ जैसी फिल्में ज्यादा संख्या में क्यों नहीं बनतीं? एक राय थी कि हाल-फिलहाल हिंदी में सिर्फ एक अच्छी फिल्म आई है- ‘मसान’। ‘मसान’ पिछले साल आई एक बेहद संवेदनशील और बहुप्रशंसित फिल्म है, जिसे कान्स फिल्म महोत्सव में दो पुरस्कार मिले। लेकिन क्या ऐसी राय के बीच व्यावसायिक फिल्मों के पक्ष में बोलने का खतरा उठाया जा सकता है?

दशकों पहले कला फिल्म और व्यावसायिक फिल्म का विभाजन किया गया था। व्यावसायिक फिल्मों का पक्ष लेने वालों ने कला फिल्मों की प्रयोगवादिता का मजाक भी उड़ाया। फिर समांतर सिनेमा की धारा चली, जिसके तहत परिवर्तनकामी और गंभीर किस्म की फिल्में बनाई गर्इं, जिनमें से अधिकतर आलोचकों और गंभीर किस्म के दर्शकों द्वारा प्रशंसित हुर्इं। वे दिलों से जुड़ने और दिलों को जोड़ने वाली साबित हुर्इं और दर्शकों के मन को झकझोरने वाली भी। लेकिन व्यापक रूप से दर्शक उन फिल्मों से नहीं जुड़े। न ही उन्हें ये फिल्में याद हैं। इसके क्या कारण हैं?

कह सकते हैं कि फिल्म को दर्शकों की चेतना का परिष्कार करना और परिवर्तन को दिशा देना चाहिए। यह एक जायज अपेक्षा है। लेकिन क्या फिल्में केवल यही करती हैं? क्या वे केवल दर्शकों को जागरूक बनाती और उनके मन को झकझोरती हैं? हमें देखना होगा कि दर्शक सिनेमा किसलिए देखने जाते हैं। अरस्तू ने नाटक के संदर्भ में इस मुद्दे पर विचार किया था। उसने कहा था, लोग नाटक इसलिए देखते हैं क्योंकि इससे उनके मन के कलुष भाव बाहर निकल जाते हैं और मन शुद्ध होे जाता है। मन को संतुलन मिलता है और एक कलात्मक आनंद की अनुभूति होती है। भारतीय रस सिद्धांत में सहृदयता की बात कही गई है। नाटक देखते हुए दर्शक के चित्त या हृदय का विस्तार होता है। वह दूसरे के सुख-दुख से जुड़ जाता है और उसे आनंद की अनुभूति होती है। हिंदी फिल्म जगत की बात करें तो शाहरुख खान अपने को सिर्फ एक ‘एंटरटेनर’ कहते हैं। हालांकि उन्होंने ‘स्वदेश’ जैसी सार्थक फिल्म भी की है। ‘द डर्टी पिक्चर’ में नायिका फिल्म का केवल एक मकसद बताती है- एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट। यानी मनोरंजन ही फिल्म का एकमात्रा उद्देश्य है और दर्शक केवल मनोरंजन के लिए फिल्म देखने आता है। क्या मनोरंजन का कोई मूल्य नहीं होता?

निश्चय ही मूल्यहीन या सरोकारविहीन मनोरंजन एक स्वार्थी, एकांगी और विशुद्ध बाजारू दृष्टिकोण है। लेकिन एक एकांगी दृष्टिकोण का जवाब दूसरा एकांगी दृष्टिकोण नहीं हो सकता। लोगों ने शोले, दिलवाले दुलहनिया ले जाएंगे जैसी व्यावसायिक फिल्में बार-बार देखी हैं। टिकटें ब्लैक में लेकर देखी हैं। क्या फिल्मों के प्रति यह दीवानगी जीवन के यथार्थ को देखने की मंशा से पैदा हुई है? एक समय था, लोग बैलगाड़ी, तांगों और टैक्सी या मोटरगाड़ी बुक करके सपरिवार, बल्कि दो-तीन परिवार एक साथ फिल्म देखने जाते थे। एक फिल्म से उनकी क्या अपेक्षाएं थीं, हमें यह भी सोचना चाहिए। लोग अंधे कुएं का खेल देखने जाते थे, आज भी छोटे शहरों-गांवों में जाते हैं। लोग कई पीढ़ियों से सर्कस भी देखने जाते रहे हैं। जादूगर के करतब भी देखने जाते रहे हैं। क्या वे जीवन का यथार्थ देखने जाते हैं। या यथार्थ जीवन से अलग, अनोखा, रोमांचभरा और जीवन से बड़ा कुछ देखने जाते हैं। फिल्म की भाषा में जिसे ‘लार्जर दैन लाइफ’ कहा जाता है।

सिनेमाहॉल में फिल्म शुरू होने से पहले जब अंधेरा किया जाता है तो दर्शकों को उसकी अपनी यथार्थ दुनिया से अलग एक काल्पनिक दुनिया में प्रवेश दिलाना उसका मकसद होता है। इसके बाद दर्शकों को दो-तीन घंटे तक बांधे रखना फिल्मकार के लिए चुनौती होता है। निश्चित रूप से फिल्म में चूंकि मानवीय जीवन की कहानी कही जाती है, इसलिए मानवीय सरोकारों की उससे अपेक्षा करना लाजिमी है।

मार-धाड़ और सेक्स से भरपूर फिल्में निश्चित रूप से मानवीय सरोकारों की उपेक्षा करती हैं। अपराधियों को महिमामंडित करने वाली फिल्में या सांप्रदायिक और लैंगिक पूर्वाग्रहों को मजबूत करने वाली फिल्में फिल्मकारों की अधकचरी मानसिकता और विशुद्ध व्यावसायिक दृष्टिकोण को उजागर करती हैं। लेकिन इन्हीं फिल्मों के बीच हमें दर्शकों का स्वस्थ मनोरंजन करने वाली उन सार्थक, लेकिन सुपरहिट फिल्मों की भी पहचान करनी होगी, जिनका व्यापक दर्शक वर्ग है। उनमें केवल वास्तविक जीवन नहीं है, लार्जर दैन लाइफ भी है। केवल यथार्थ नहीं है, अवास्तविकता और फैंटेसी भी है। केवल प्रयोग नहीं, कुछ फॉर्मूला भी है। विचार की तुलना में भावुकता की मात्रा ज्यादा है।

बहुत-से लोगों को सिनेमा में अपना जीवन, अपने जैसा या अपने आसपास का जीवन देखना अच्छा लगता है। लेकिन बहुत से लोग जिस बदहाली में उनका जीवन है, उसका चित्रण देखने सिनेमाहॉल में नहीं जाते। वे जो अपने जीवन में नहीं कर पाते, वह देखने जाते हैं। वे सिनेमाहॉल के भीतर उस यथार्थ से छुटकारा पाना चाहते हैं। सिनेमा उतनी देर उनके लिए राहत की तरह होता है। इसे यथार्थ से पलायन कहा जा सकता है, जो कि है भी। लेकिन यथार्थ का सामना करने की इससे हिम्मत भी मिल सकती है, हमें यह भी सोचना चाहिए।

निश्चित रूप से फिल्म की संवेदना और सरोकारों का असर सभी दर्शकों पर स्थायी नहीं रहता। वे मनोरंजन के तराजू से फिल्मों को ज्यादा याद रखते हैं। वरना पुरानी प्रेम कहानी वाली फिल्मों को हिट कराने वाले सभी दर्शक आज अपनी संतानों को खुलेआम प्रेम करने की छूट दे रहे होते। जबकि ऐसा नहीं है। वे सिर्फ मनोरंजन की दृष्टि से फिल्म देखते हैं। और फिल्मकार उनके मनोरंजन का प्रयत्न करता है। कलाकार तमाम अवास्तविक चीजें करते हैं। फिल्म ‘वतन के रखवाले’ में मिथुन एक ऊंची इमारत की दीवार पर दौड़ते दिखाए गए हैं। ‘ड्रीमगर्ल’ में धर्मेंद्र ऊंची सीढ़ियों पर मोटरसाइकिल दौड़ाते हैं। ‘मैं हूं ना’ में शाहरुख खान जादुई ढंग से रिक्शा चलाते हुए कार और जीप से पीछा कर रहे अपराधियों और उनकी बंदूकों से चल रही गोलियों को चकमा दे जाते हैं। ‘बाजीराव मस्तानी’ में रणवीर सिंह बिजली की-सी फुर्ती से लपलपाते तलवारनुमा अस्त्र से शत्रु सेना का चंद मिनटों में सफाया कर देते हैं। हम लाख इन दृश्यों का मजाक उड़ाएं, आलोचना करें। लेकिन क्या फिल्मकार को पता नहीं है कि ये दृश्य कितने अवास्तविक हैं? कुछ यादगार, कुछ अनदेखा, कुछ अनोखा, कुछ मनोरंजक रचना ही उनका उद्देश्य है। वे बौद्धिकों की आलोचना की नहीं, अपने दर्शकों के मनोरंजन की परवाह करते हैं।

निश्चित रूप से महान या श्रेष्ठ फिल्मों की श्रेणी अलग और विशिष्ट है। उनका दर्शक वर्ग भी है और उदास और संघर्षपूर्ण यथार्थ के साथ-साथ अगर उनका मनोरंजन पक्ष भी मजबूत रहता है तो दर्शकों का दायरा बढ़ जाता है। मगर अच्छी फिल्म की श्रेणी पर किसी एक पक्ष की दावेदारी कम से कम सिनेमा जैसे खचीर्ले माध्यम के लिए सही साबित नहीं हो पाती।

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