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दूसरी नजरः कौन बचाएगा संविधान – संविधान का सवाल

मैं सर्वोच्च न्यायालय को सलाम करता हूं। न्यायालय ने संविधान को बचाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी, उस वक्त जब एक सत्ता-लोलुप समूह उसे तहस-नहस करने पर आमादा था।

Author May 20, 2018 3:41 AM
पी. चिदंबरम

दूसरे लोग मुझे याद दिलाएं, इससे पहले मुझे खुद याद करने दें, कि 19 मार्च 2017 को मैंने क्या लिखा था। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में चुनाव हो चुके थे। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भाजपा जीती थी, पंजाब में कांग्रेस। दो अन्य राज्यों का जिक्र करते हुए मैंने लिखा था, ‘गोवा और मणिपुर में हारने वाले ने चुनाव को चुरा लिया।’ मेरी यह टिप्पणी इस मान्यता पर आधारित थी: ‘‘जिस पार्टी को सबसे ज्यादा सीटें मिली हों, पहले उसे सरकार बनाने के लिए बुलाया जाना चाहिए…उस नियम या परिपाटी के मुताबिक कांग्रेस को गोवा (17/40) और मणिपुर (28/60) में सरकार बनाने के लिए बुलाया जाना चाहिए।’’

इस बात को लेकर विवाद खड़ा हो गया था कि किसी को सरकार बनाने का न्योता देते समय राज्यपाल को किन सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। अगर किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत न मिला, तो राज्यपाल को सबसे बड़ी पार्टी को बुलाना चाहिए या चुनाव बाद के गठबंधन को (प्रथम दृष्टया जिसके पास बहुमत हो)?

कानून का अभिकथन

इस मसले पर पहले भी विचार हुआ है और इस संबंध में कई अदालती फैसले भी हैं। गोवा ने एक मूर्त अवसर प्रदान किया था। देश की सर्वोच्च अदालत ने चंद्रकांत केवलेकर बनाम भारत संघ के मामले में 14 मार्च 2017 को दिए अपने आदेश में यह टिप्पणी की थी। ‘‘(गोवा) विधानसभा में 40 निर्वाचित सदस्य हैं। जिस पार्टी के पास कम से कम 21 निर्वाचित सदस्यों का समर्थन होगा, उसका स्पष्ट बहुमत माना जाएगा। संलग्नक-बी यह दिखाता है कि भाजपा विधायक दल के तेरह निर्वाचित सदस्यों के अलावा महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी के तीन विधायकों और गोवा फारवर्ड पार्टी के अन्य तीन विधायकों ने भी अपना समर्थन भाजपा को दिया है। इसके अलावा दो निर्वाचित निर्दलीय सदस्यों का भी जिक्र राज्यपाल के पत्र में है- संलग्नक बी- जिन्होंने भाजपा विधायक दल के प्रति अपनी निष्ठा जताई है। अत: यह साफ है कि भाजपा विधायक दल के पास इक्कीस विधायकों का समर्थन है।’’

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल के निर्णय को सही ठहराया और मनोहर पर्रिकर को (जिन्होंने विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा था) बहुमत साबित करने की इजाजत दे दी थी- लेकिन दो दिन के भीतर, 16 मार्च 2017 तक। लिहाजा, कानून के पहलू से मेरी बात गलत निकली, अरुण जेटली का नजरिया, जो ब्लाग पर लिखी उनकी प्रसिद्ध टिप्पणी में सामने आया था, सही ठहराया गया।

राज्यपाल ने उड़ाया अदालत का मखौल

गोवा की बाबत आया फैसला, संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित कानून है। अनुच्छेद 144 के तहत सभी प्राधिकारी उसका पालन करने को बाध्य हैं।
गोवा का फैसला एक नजीर था जिसका पालन कर्नाटक के राज्यपाल को करना चाहिए था। यह इस तरह के मामले में सर्वोच्च न्यायालय का पिछला और अंतिम फैसला है। लेकिन राज्यपाल वजूभाई वाला अपना रिकार्ड खराब नहीं करना चाहते थे। वे भाजपा/आरएसएस के प्रति वफादार रहे हैं, न कि भारत के संविधान के प्रति।
एक बार जब ऊपर से आदेश दे दिया गया, तो कर्नाटक में घटनाएं तेजी से घटित हुर्इं। येदियुरप्पा को सरकार बनाने और पंद्रह दिन के भीतर बहुमत साबित करने का न्योता देने वाला पत्र 16 मई को देर शाम को जारी हो गया। कांग्रेस और जनता दल (एस) उसी दिन आधी रात से पहले सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। तीन जजों के एक पीठ ने आधी रात के बाद सुनवाई की, लेकिन शपथ ग्रहण पर कोई स्थगन आदेश नहीं दिया, और येदियुरप्पा ने 17 मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। फिर सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई 18 मई, 2018 को हुई।

सुनवाई और अदालती निर्देश भाजपा की कपट-योजना के लिए झटका थे। सुप्रीम कोर्ट के आदेश में कोई खामी ढूंढ़ी जा सकती है, तो केवल एक आधार पर। उस पत्र को मांगने और उसके मिल जाने के बाद, जो येदियुरप्पा ने अपने को दावेदार बताते हुए राज्यपाल को लिखी थी, सुप्रीम कोर्ट को जरूर यह संज्ञान लेना चाहिए था कि येदियुरप्पा ने एक बार भी यह दावा नहीं किया था कि उनके पास विधायकों का बहुमत है! उनको दिए राज्यपाल के न्योते में भी संख्याबल का कोई जिक्र नहीं था! केवल इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट को मुख्यमंत्री के रूप में येदियुरप्पा की नियुक्ति रद््द कर देनी चाहिए थी, और राज्यपाल को फिर से निर्णय लेने का निर्देश देना चाहिए था, लेकिन अदालत दोनों पक्षों के प्रति नरम थी। इस बात को छोड़ दें, तो 18 मई का अदालत का फैसला पूरी तरह संतोषजनक था:

* 19 मई को अपराह्न 4 बजे विश्वास मत हासिल करें;
* गुप्त मतदान नहीं होगा;
* अभी ऐंग्लो इंडियन सदस्य की नियुक्ति नहीं हो सकती;
* जब तक येदियुरप्पा विश्वास मत हासिल न कर लें, कोई बड़ा प्रशासनिक निर्णय न लें।

मैं सर्वोच्च न्यायालय को सलाम करता हूं। न्यायालय ने संविधान को बचाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी, उस वक्त जब एक सत्ता-लोलुप समूह उसे तहस-नहस करने पर आमादा था। अब जबकि मैं इस निबंध को अखबारों को भेजने जा रहा हूं, यह सवाल बना हुआ है कि जो विधायक जिस पार्टी के चुनाव चिह्न पर जीत कर आए हैं उस पार्टी के प्रति, अपने को समर्थन देने वाले मतदाताओं के प्रति, लोकतंत्र के अलिखित नियमों के प्रति, और भारत के संविधान के प्रति वफादार बने रहेंगे? पुनश्च : सर्वोच्च न्यायालय की कृपा से, कर्नाटक विधानसभा की कार्यवाही का सीधा प्रसारण देख रहा हर नागरिक ‘प्रोटेम स्पीकर’ बन गया। हमेशा के लिए शर्मिंदगी मोल लेकर, विश्वास मत से पहले ही, भाजपा के नेताओं ने हार मान ली। पचहत्तर वर्षीय दावेदार ने इस्तीफा दे दिया। कठपुतलियां नचाने वाले छिप गए। कर्नाटक में लोकतंत्र बच गया- फिलहाल।

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