ताज़ा खबर
 

वक़्त की नब्ज़ : नाहक हाय-तौबा

नरेंद्र मोदी जब तक प्रधानमंत्री नहीं बने थे उनको वीजा नहीं मिला था अमेरिका जाने के लिए। इस तर्क पर कि गुजरात के 2002 के दंगों को उन्होंने रोकने की पूरी कोशिश नहीं की..

Author नई दिल्ली | Updated: September 20, 2015 10:16 AM

नरेंद्र मोदी जब तक प्रधानमंत्री नहीं बने थे उनको वीजा नहीं मिला था अमेरिका जाने के लिए। इस तर्क पर कि गुजरात के 2002 के दंगों को उन्होंने रोकने की पूरी कोशिश नहीं की। दंगे भारत के कई राज्यों में हुए थे। किसी दूसरे मुख्यमंत्री के साथ ऐसा नहीं हुआ और न ही राजीव गांधी को अमेरिकी सरकार ने वाशिंगटन आने से रोका था 1984 के कत्ले-आम के बाद, जिसमें तीन हजार से ज्यादा सिख मारे गए तीन दिनों के अंदर।

मोदी पर खास निशाना साधा गया, क्योंकि उनके दुश्मन हो गए थे कई ‘सेक्युलर’ भारतीय मूल के बुद्धिजीवी, जिनका खास असर है अमेरिका के विश्वविद्यालयों में। उनका बस चलता तो पिछले साल भी मोदी को अमेरिका जाने से रोकते, लेकिन ऐसा कर नहीं पाए, क्योंकि अमेरिकी नियमों के तहत प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों को रोका नहीं जा सकता है। तानाशाहों को भी अमेरिका आने से नहीं रोका जा सकता, जब संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद का वार्षिक सम्मेलन होता है सितंबर में।

इसके बावजूद बुद्धिजीवियों का एक बड़ा समूह मोदी की मुखालफत करता है और अब जब उन्होंने एलान किया है कि 27 सितंबर को वे पहुंचने वाले हैं विश्व के डिजिटल केंद्र सिलिकॉन वैली में, इन बुद्धिजीवियों ने विरोध जताया है एक वक्तव्य जारी करके। इस वक्तव्य में उनका इल्जाम है कि मोदी की डिजिटल योजना के पीछे षड्यंत्र यह है कि डिजिटल तरीकों से मोदी अपने आलोचकों पर निगरानी रख सकेंगे।

सिलिकॉन वैली के बड़े व्यापारियों को खबरदार कर दिया गया है कि वे मोदी का स्वागत न करें और न ही उनकी सरकार की कोई तकनीकी मदद। इन बुद्धिजीवियों ने अपने इस वक्तव्य में आरोप लगाया है कि मोदी सरकार मानवाधिकारों का उल्लंघन कर रही है, मीडिया पर प्रतिबंध लग चुका है, न्यायाधीशों पर दबाव हैं हर किस्म के और भारत में अब लोगों के मजहबी जज्बातों पर भी हमले हो रहे हैं।

आरोपों की यह लंबी फेहरिस्त पढ़ने के बाद ऐसा लगा मुझे कि भारत में अब किसी तानाशाही का राज आ गया है, बिल्कुल वैसा जैसे उत्तर कोरिया में है या उस इस्लामी खिलाफत मुल्क में, जहां आइएसआइएस का कट्टरपंथी राज है। आरोपों की इस फेहरिस्त ने मुझे तकलीफ यह भी दी कि ये सारी बातें अमेरिका के विश्वविद्यालयों में बैठे बुद्धिजीवियों को मालूम हैं और हम जैसे राजनीतिक पंडित जो इस देश में रहते हैं, बिल्कुल बेखबर हैं। फिर गुस्सा आया इस बात को लेकर कि क्या इन बुद्धिजीवियों की नजरों में भारतीय लोकतांत्रिक संस्थान इतने कमजोर दिखते हैं कि एक साल में इनको तबाह कर दिया जा सकता है?

अमेरिकी बुद्धिजीवियों के इस आरोप-पत्र में जहां मानव अधिकारों के उल्लंघन का जिक्र है, वहां मिसाल दी गई है एनजीओ क्षेत्र की। इसको पढ़ कर बात कुछ-कुछ समझ में आने लगी। यह सच है कि कुछ मुट्ठी भर गैर-सरकारी संस्थानों की आमदनी की जांच हो रही है। इनमें ज्यादातर वे हैं, जिनको विदेशों से खूब पैसा मिला है गरीबी हटाने के नाम पर, धर्मनिरपेक्षता कायम करने के नाम पर। प्रधानमंत्री को सलाह देने लायक होती तो मैं सुझाव देती कि चाहे जितना भी गलत काम कर रहे हों ये एनजीओ, इन पर रोक न लगाओ, क्योंकि उन्हें खूब हल्ला मचाना है मीडिया के जरिए और अक्सर हम पत्रकारों को इनसे हमदर्दी होती है।

मुझे नहीं है अगर तो इसलिए कि मैंने देखा है कैसे ये एनजीओ लोग विदेशों में जाते हैं फर्स्ट क्लास टिकटों पर और कैसे रहते हैं आलीशान होटलों में, जहां धनवानों के सम्मेलनों में बातें करते हैं भारत की गरीबी की, भारत के पर्यावरण के विनाश की। इनकी बातों में मुझे झूठ और धोखा दिखता है। फिर भी सुझाव मेरा यह होता कि इनको अपने हाल पर छोड़ दो, क्योंकि विदेशों में हल्ला मचाने में ये माहिर हैं।

अमेरिकी बुद्धिजीवियों को मोदी सरकार से यह भी शिकायत है कि शिक्षा और संस्कृति संस्थानों में दखल दिया जा रहा है। यानी अच्छे लोगों को हटा कर गलत लोगों को बिठाया जा रहा है। अमेरिका से भारत इतना दूर है कि शायद इन बुद्धिजीवियों को पहले कभी दिखा नहीं कि इस तरह का हस्तक्षेप एक परंपरा बन गया है। हर नई सरकार ऐसा करती है।

इस बार फर्क सिर्फ यह है कि मोदी सरकार के आने के बाद कोशिश हुई है कि जिन वामपंथियों के शिकंजे में ये तमाम संस्थान रहे हैं उनको हटा कर कुछ ऐसे लोग लगाए जाएं, जो वामपंथी सोच के न हों। ऐसा करने की जरूरत है, लेकिन यहां मोदी सरकार की गलती यह है कि कुछ जगहों पर गलत किस्म के लोगों को लाया गया है। उदाहरण है पुणे के एफटीआइआइ (भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान) से, जहां एक दूसरे दर्जे के अभिनेता को बिठा कर इस संस्था का कद कम हुआ है।

इस गलती के बावजूद मोदी सरकार को दखल देने की जरूरत है खासकर शिक्षा संस्थाओं में, जहां वामपंथियों का कब्जा भी है और जहां शिक्षा में सुधार लाने की जरूरत भी। ऐसा करने के लिए लेकिन जरूरत है एक नई शिक्षा नीति की, नए सोच की, जिसके आसार तक नहीं दिखे हैं अभी तक। हमारे कई शिक्षा संस्थान ऐसे हैं, जिनमें पढ़ाई होती है तो नाम के वास्ते। यहां बहुत जरूरत है परिवर्तन लाने की ताकि भारत के बच्चे अपनी वह जगह ले सकें दुनिया में, जो उनकी होनी चाहिए।

वर्तमान हाल यह है कि जब हमारे बच्चे पीआइएसए जैसी अंतरराष्ट्रीय स्पर्द्धा में हिस्सा लेते हैं, तो इतनी बुरी तरह नाकाम होते हैं कि उनके पीछे पिछली बार रहे सिर्फ किर्गिस्तान के बच्चे। सो हस्तक्षेप करने की आवश्यकता है, सुधार लाने की आवश्यकता है, लेकिन शायद अमेरिका से ये चीजें दिखती नहीं हैं।

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
जस्‍ट नाउ
X