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तीरंदाजः कैलेंडर और कील

कैलेंडर के बदलने से न भाग्य बदलता है और न स्वभाव। दोनों उस कील की तरह हैं, जिस पर कैलेंडर के पेज फड़फड़ा कर फट जाते हैं।

kashmir genericकश्मीर (तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है)।

कैलेंडर का एक पेज नष्ट होने के बाद नया पेज खुलता है, जिस पर नया महीना अंकित होता है। कैलेंडर के महीने मौसम की चाल के साथ कदमताल करते हुए प्रतीत होते हैं। अगर गरमी है तो मई-जून और सर्दी है तो दिसंबर-जनवरी जैसे महीने कैलेंडर पर उभर आते हैं। वैसे मौसम भी वही पुराने हैं, जो अपने क्रमानुसार आते-जाते रहते हैं। कैलेंडर के पेजों की तरह पूर्वनिश्चित हैं और उसी तरह झड़ जाते हैं।

कील पर इन बदलावों का कोई असर नहीं पड़ता है। वह उस दीवार पर गड़ी है, जो एक जीवनकाल पूरा होने पर ही भरभरा कर गिरेगी। हमारा अस्तित्व दीवार की तरह है और भाग्य और स्वभाव उसके माथे पर जन्म से ठुके हैं। दोनों कील की तरह स्थिर हैं, परिवर्तनशील नहीं हैं। समय अपनी गणना करता हुआ आता-जाता रहता है और एक दिन अपने साथ दीवार को ही ले जाता है। भाग्य और स्वभाव स्वयं ध्वस्त नहीं होते, जिस पर जड़े होते हैं उसके साथ ध्वस्त होते हैं। पर कील पर कैलेंडर-दर-कैलेंडर फड़फड़ा कर फट जाते हैं।

वैसे देखा जाए तो हम अटूट भाग्यवादी हैं। हमारा मानना है कि हमारा भाग्य पूर्वनिर्धारित है। हां, कर्म और फल का भी सिद्धांत हमारे दर्शन में है, पर कर्म से केवल नमक-रोटी ही अर्जित की जा सकती है, जबकि छप्पनभोग की थाली सिर्फ भाग्य हमारे सामने परोस सकता है। भाग्य और कर्म का रिश्ता समझने के लिए जटिल दर्शनशास्त्र से उलझना एक मुश्किल काम है, क्योंकि एक जन्म से दूसरे जन्म का यथार्थ स्वत: सिद्ध नहीं है।

आज किए गए कर्म कल हमारे भाग्य में परिवर्तन ला सकते हैं या नहीं, विवाद का विषय है। कुछ लोग मानते हैं कि कर्म इस जन्म में न सही तो अगले या उससे अगले जन्म में अच्छा भाग्य दिला सकते हैं। हो सकता है, ऐसा हो भी, दर्शन के रूप में, पर यह अल्पकाल में प्रदर्शित नहीं होता है। जीवन काल में अपने कर्मठ कर्म का फल चखना भाग्यशाली लोगों के नसीब में लिखा होता है। उनका भाग्य उस दिशा में उनसे कर्म कराता है, जहां सोना गड़ा होता है। अभागे पत्थर कूटते रह जाते हैं।

वैसे अगर एक क्षण के लिए हम कर्म सिद्धांत को स्वीकार लें तो भाग्य सुधारने के लिए सर्वप्रथम अपना स्वभाव सुधारने की ओर हमें कर्म करना पड़ेगा। कर्म हाथ-पैर के परिश्रम से ज्यादा बुद्धि परिश्रम से जुड़ा है। हम जिस मति से कार्य करते हैं उसी प्रकार का फल आता है। पुरानी कहावत है- विनाशकाले विपरीत बुद्धि। यह कहावत वास्तव में चेतावनी है कि भ्रष्ट बुद्धि भ्रष्ट कर्म करवाती है, जिसका फल विनाश होता है। बुद्धि को इसलिए शिक्षित रखना जरूरी है, पर वह स्वभाव से प्रभावित होती है। चंचल स्वभाव, चंचल बुद्धि का द्योतक है और ठहराव गहनता की तरफ इशारा करता है।

यह सर्वविदित है कि स्वभाव में आमूलचूल परिवर्तन नहीं लाया जा सकता। जो जैसा जन्मा है अधिकतर वैसा ही रहता है। पर स्वभाव की कील अपने दायरे में कुछ अंश जरूर हिल सकती है। अगर वह टेढ़ी गड़ी है तो हल्की-सी सीधी की जा सकती है अपने सोच में परिवर्तन लाकर। सकारात्मक क्रियाशील सोच को अपनाने से निराशावादी स्वभाव किसी चिह्नित कार्य के लिए अपने में उत्साह अंकुरित कर सकता है। बुद्धि के शिक्षण और परीक्षण से व्यवहार में बदलाव लाया जा सकता है और स्वभाव में त्रुटियों को दुरुस्त किया जा सकता है। पर इस सबको करने के लिए सबसे पहले हमें वस्तुनिष्ठ होकर अपने स्वभाव को समझना ही नहीं होगा, बल्कि उसको स्वीकारना भी होगा। यह एक मुश्किल काम है, क्योंकि लोग अपने भीतर झांकने से कतराते हैं।

नेतृत्व की स्थिति पाने के लिए विशिष्ट प्रकार के स्वभाव की आवश्यकता होती है। यह प्रकार नेतृत्व के प्रकार के हिसाब से अलग-अलग होते हैं। परिवार में नेतृत्व के लिए प्रेम और समझदारी वाले स्वभाव की जरूरत होती है, जबकि समुदाय के स्तर पर वाक्पटुता और विश्वनीयता चाहिए होती है। चोर-डकैतों के सरदार का स्वभाव जोखिम उठाने वाला होता है, जबकि साधु समाज का नेतृत्व अमूमन त्यागी और गंभीर स्वभाव वाले व्यक्ति करते हैं। ऐसे ही राजनीति में नेतृत्व उन लोगों को मिलता है, जिनका झुकाव लोककल्याण के कार्यों के प्रति होता है। अपने स्वभाव की वजह से वे लोकमानस से स्वत: जुड़ जाते हैं और अपने कार्यों से एक बड़े समुदाय का विश्वास जीत लेते हैं।

पर जहां राजनीति में लोककल्याण के प्रति समर्पित स्वभाव वाले जुड़ते हैं, तो दूसरी तरफ अवसरवादी और महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति भी इस क्षेत्र में उतर आते हैं। वे लोकहित की बानी बोल कर स्वार्थ सिद्धि करते हैं। वे लोकसभा को निजी सभा में परिवर्तित करने की अपनी मुराद को समाजकल्याण का जामा पहना कर अपने व्यक्तित्व को महिमामंडित करते हैं। वे अपनी असली मंशा को छिपा कर सार्वजनिक हित की आड़ लेकर पैंतरेबाजी करते हैं और समाजसेवी होने के बजाय समाजशोषक हो जाते हैं।

ऐसे व्यक्ति विभिन्न क्षेत्रों में नेतृत्व के शीर्ष पर होते हैं, पर अगर वे राजनीति में हैं, तो आमजीवन पर सीधा प्रभाव डालते हैं। बहुत से पैंतरेबाज नेता जल्द बेनकाब हो जाते हैं, पर कुछ लंबे समय तक सत्ता पर इसलिए काबिज रहते हैं, क्योंकि उनके मूल स्वभाव को भाग्य का साथ मिल गया होता है। उनकी नीति की बदनीयती कील पर लटके कैलेंडर पर दर्ज होती जाती है, जिस पर कैलेंडर फड़फड़ा तो सकता है, पर उसको न तो बदल सकता है और न ही मिटा सकता है। पर अक्सर तारीख की छटपटाहट की वजह से कील दीवार के गारे को कुछ इस तरह खुरच देती है कि दीवार भुसभुसा कर गिर जाती है। स्वभाव भाग्य को ले बैठता है। दीवार की कील पर टिका कैलेंडर दोनों को लील जाता है।

बहुत से पैंतरेबाज नेता जल्द बेनकाब हो जाते हैं, पर कुछ लंबे समय तक सत्ता पर इसलिए काबिज रहते हैं, क्योंकि उनके मूल स्वभाव को भाग्य का साथ मिल गया होता है। उनकी नीति की बदनीयती कील पर लटके कैलेंडर पर दर्ज होती जाती है, जिस पर कैलेंडर फड़फड़ा तो सकता है, पर उसको न तो बदल सकता है और न ही मिटा सकता है।

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