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प्रसंग: दलित उपलब्धियों का जश्न

पटना और नालंदा के बीच स्थित कुसुमपुरा के प्रसिद्ध गणितज्ञ आर्यभट एक दलित थे। यह भट नाम से ही स्पष्ट है। भट शब्द का अर्थ समनामी भट्ट के ठीक विपरीत है।

Author September 30, 2018 1:17 AM
आर्यभट की छवियां भी उन्हें ब्राह्मण के रूप में दर्शाती हैं। जैसे कि विकिपीडिया की छवि (जो पुणे के आईयूसीएए में आर्यभट की मूर्ति की है) जो उन्हें जनेऊ पहने हुए दिखाती है।

चंद्रकांत राजू

भीमा-कोरेगांव की लड़ाई के स्मृति खंभ पर जो बाईस महार नाम अंकित हैं, उसका प्रचार सबसे पहले भीमराव आंबेडकर ने किया था। तबसे यह दलित उपलब्धि का प्रतीक बन गया है। खुद एक महार, आंबेडकर ने बहुत अपमान सहे थे। इसलिए उन्होंने दलित उपलब्धियों के प्रतीक को खोजा। भीमा-कोरेगांव पर बहुत कुछ लिखा गया है, लेकिन एक सवाल आज तक नहीं उठा। क्या सच में दलित उपलब्धियों के प्रतीकों की इतनी कमी है? हरगिज नहीं। दलित ऋषियों में कई नाम मशहूर हैं। इन नामों में रामायण के लेखक वाल्मीकि से लेकर तुकाराम, कबीर और श्रीनारायण गुरु शामिल हैं। दलित योद्धाओं की गिनती नंद वंश के राजाओं से शुरू होती है, जिनकी ताकतवर सेना की केवल रिपोर्ट से सिकंदर की सेना (प्लूटार्क के अनुसार) डर के वापस मुड़ गई। चालुक्य वंश के राजा (विल्हण के अनुसार) दलित थे। आगे चल कर भील, गोंड से लेकर जलियांवाला बाग का बदला लेने वाले उधम सिंह मशहूर हैं।

लेकिन आंबेडकर का उद्देश्य जातिवाद का विनाश था और उसके लिए ऊपरी जाति की ‘श्रेष्ठता’ और ‘योग्यता’ का मौजूदा मिथक ध्वस्त करना जरूरी था। मानव एकता के शांतिवादी संदेश से वह उद्देश्य पूरा नहीं होता, न ही सामाजिक हकीकतों से विछिन्न सैन्य उपलब्धियों से। भीमा-कोरेगांव ने ज्यादा आक्रामक संदेश भेजा कि कैसे महारों ने उसी पेशवा को हराया, जिसने उन्हें तुच्छ कह कर शिवाजी के विपरीत अपनी सेना में शामिल नहीं किया। भीमा-कोरेगांव प्रतीक के बारे में आंबेडकर के विचार दलितों ने तो स्वीकार किए, लेकिन औरों ने उन्हें चुनौती दी। जब भीमा-कोरेगांव युद्ध की दो सौवीं वर्षगांठ के उत्सव की तैयारी चल रही थी, तब भारतीय सेना के पुणे हॉर्स रेजिमेंट ने जीत के लिए श्रेय का दावा किया, क्योंकि उसकी एक छोटी टुकड़ी ने ब्रिटिश की भारत सेना के तहत युद्ध में भाग लिया था। 1965 और 1971 के युद्धों में शहीदों के नाम का ‘सम्मान का रोल’ वहां रखा। हाल ही में पुणे पुलिस ने यह अति-कल्पनाशील दावा किया कि उत्सव दलितों के बारे में नहीं था, लेकिन कुछ कथित माओवादियों की साजिश थी, जो अनुपस्थित थे! अब दलित शब्द के इस्तेमाल पर ही प्रतिबंध की बात हो रही है।

इस संदर्भ में, दलित बौद्धिक और वैज्ञानिक उपलब्धि के एक उपेक्षित प्रतीक पर प्रकाश डालना जरूरी है। पटना और नालंदा के बीच स्थित कुसुमपुरा के प्रसिद्ध गणितज्ञ आर्यभट एक दलित थे। यह भट नाम से ही स्पष्ट है। भट शब्द का अर्थ समनामी भट्ट के ठीक विपरीत है। भट का मूल भट् है, जिसका अर्थ है ‘भाड़े पर लेना’। आप्टे संस्कृत-हिंदी शब्दकोश के अनुसार भट शब्द का अर्थ है ‘भड़ैत सैनिक, भाड़े का टट्टू, पिशाच, जातिबहिष्कृत, वर्णसंकर’ आदि। मोनियर विलियम्स डिक्शनरी के अनुसार भी भट का मतलब यही है ‘नौकर, दास, राक्षस, एक मिश्रित जाति का व्यक्ति’। यानी कि भट का सामान्य अर्थ एक नौकर है, जो जाति बहिष्कृत है, और इससे स्पष्ट है कि आर्यभट दलित थे।

इसके ठीक विपरीत भट्ट शब्द का अर्थ ‘प्रभु, स्वामी’ है। यह एक विद्वान ब्राह्मण की उपाधि भी है, जैसे कुमारिल भट्ट। इसलिए, आर्यभट को आर्यभट्ट लिखना गलत वर्तनी है। ऐसा करने से नौकर स्वामी में बदल जाता है, और दलित ब्राह्मण में! इसमें कोई संदेह नहीं कि सही वर्तनी आर्यभट है, जैसा कि आर्यभटीय की सभी पांडुलिपियों, भाष्यों, और आलोचनाओं में पाया जाता है। उनके आलोचक ब्रह्मगुप्त बार-बार ‘आचार्य भट’ कहना करते हैं। उनके अनुयायी भास्कर प्रथम भी अपने महाभास्करीय (2.5) में ‘भट के शिष्यों’ की बात कह कर केवल उनके जाति नाम का उपयोग करते हैं।

केंद्र की सरकारों ने इस गलत वर्तनी को स्कूली पाठ्य पुस्तकों के सहारे फैलाया। निजी तौर पर और सार्वजनिक रूप से मेरे विरोध करने के बाद, एनसीईआरटी पुस्तकों में वर्तनी को सही किया गया। लेकिन राजस्थान की पाठ्यपुस्तकों में यह गलत वर्तनी फिर लौट आई है। आर्यभट की छवियां भी उन्हें ब्राह्मण के रूप में दर्शाती हैं। जैसे कि विकिपीडिया की छवि (जो पुणे के आईयूसीएए में आर्यभट की मूर्ति की है) जो उन्हें जनेऊ पहने हुए दिखाती है। जनेऊ के साथ शिखा होनी चाहिए, लेकिन उसके बजाय मूर्ति लंबे बाल दर्शाती है। यानी कलाकार हिंदू धर्म के रीति-रिवाजों से अनजान था, और विकिपीडिया दलित का ब्राह्मणीकरण कर देती है! याद रहे कि आंबेडकर ने अपनी किताब ‘शूद्र कौन हैं?’ (बीसवें अध्याय) में बताया कि ब्राह्मणों ने शूद्र के अपमान के लिए क्या तकनीक अपनाई। ‘शूद्रों का उपनयन करने से इनकार किया’। इसलिए विकिपिडिया में आर्यभट की छवि भ्रामक है और इसे (और उसके मूल स्रोत को) हटाना चाहिए।

आर्यभट अपने उस बयान के लिए प्रसिद्ध हैं कि धरती कदंब के फूल की तरह गोल है, और बिना किसी सहारे के खड़ी है। यह कुछ पारंपरिक विचारों के विपरीत है, और आंबेडकर के नवयान ने पारंपरिक अंधविश्वासों को अस्वीकार करने पर जोर दिया। वैसा ही आर्यभट के अनुयायियों ने भी किया। मसलन, लल्लाचार्य ने समझाया कि पृथ्वी गोल इसलिए है, क्योंकि दूर के पेड़ नहीं दिखते, चाहे वे कितने ऊंचे क्यों न हों। और अगर पृथ्वी किसी सांप (शेष नाग) या कछुए (या एटलस) पर टिकी है, तो वे किस पर टिके हैं? और अगर वे बिना सहारे के खड़े रह सकते हैं तो क्यों न वही शक्ति पृथ्वी को दी जाए? अगर ग्रहण राक्षसों (राहु और केतु) के कारण होते हैं, तो लल्लाचार्य ने पूछा, वे नियमानुसार केवल पूर्णिमा या अमावस्या पर क्यों होते हैं? इसलिए, आर्यभट आंबेडकर की अंधविश्वास को खत्म करने की इच्छा का आदर्श प्रतीक हैं।

आर्यभट ने यह भी कहा कि सितारे घूमते हुए इसलिए दिखते हैं कि असल में पृथ्वी विलोम दिशा में घूमती है। उस जमाने में यह इतनी नई सोच थी कि वराहमिहिर ने इसकी कड़ी आलोचना की। उसने कहा कि अगर पृथ्वी घूमती है, तो रस्सी पर लटके कपड़े हवा में फड़फड़ाएंगे। और अगर धरती अपने पास की हवा को साथ खींच ले जाती है तो भी आकाश में ऊंचा उड़ने वाला बाज अपने घर वापस नहीं लौट पाएगा। आर्यभट के कई अनुयायियों ने भी इस बिंदु पर उनका समर्थन नहीं किया। हालांकि आज हम जानते हैं कि आर्यभट सही थे। आर्यभट की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यह थी कि उन्होंने 24 खंड-ज्या के मान एक संख्यात्मक विधि से निकाले। इसे आज ‘ओइलर’ विधि कहा जाता है, और यह कैलकुलस की असली शुरुआत है। इसी विधि से आज की तारीख में अनौनिवेशिक कैलकुलस पढ़ाया जा रहा है।

भारतीय कैलकुलस का श्रेय अक्सर ‘केरल स्कूल’ को दिया जाता है, लेकिन ‘केरल स्कूल’ के माधव और नीलकंठ जैसे गणितज्ञ खुद को आर्यभट के अनुयायी मानते थे और केरल प्रांत तब था नहीं। माधव के 24 ज्या के मान आर्यभट के मानों के सटीक संस्करण हैं। नीलकंठ सोमसूत्वन ने आर्यभटीय पर भाष्य लिखा। दिलचस्प बात यह है कि सोमसूत्वन का अर्थ सोम यज्ञ करने वाला है। नीलकंठ उच्चतम जाति के नम्बूदिरी ब्राह्मण थे। यानी कि पटना के दलित आर्यभट के अनुयायी, हजार साल बाद, केरल के उच्चतम जाति के ब्राह्मण थे। यह हमारी संस्कृति की एकात्मीयता का सुंदर उदाहरण है। इसलिए आंबेडकर के जातिवाद के विनाश के दृष्टिकोण से आर्यभट एक आदर्श दलित प्रतीक हैं, जिसका जश्न मनाना चाहिए।

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