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दूसरी नजरः व्यापार युद्ध से नुकसान का हिसाब लगाएं

यह ‘तीसरा विश्वयुद्ध’ नहीं है, लेकिन इसके नतीजे गंभीर होंगे और दुनिया के सारे देशों को आहत करेंगे। व्यापार के मोर्चे पर, दुनिया के सबसे बड़े खिलाड़ी अमेरिका ने स्वेच्छाचारी रुख अख्तियार कर लिया है।

Author July 1, 2018 03:35 am
ऐसा नहीं है कि अमेरिका के हालिया फैसलों से पहले व्यापारिक व्यवस्था में संरक्षणवाद नहीं था।

यह ‘तीसरा विश्वयुद्ध’ नहीं है, लेकिन इसके नतीजे गंभीर होंगे और दुनिया के सारे देशों को आहत करेंगे। व्यापार के मोर्चे पर, दुनिया के सबसे बड़े खिलाड़ी अमेरिका ने स्वेच्छाचारी रुख अख्तियार कर लिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नीतिगत विचलन ने विश्व व्यापार को झकझोर कर रख दिया है, जो कि दशकों से संरक्षणवाद से निरंतर दूर रह कर बड़े मजे से चल रहा था। विश्व व्यापार के परिप्रेक्ष्य में अमेरिका सबसे महत्त्वपूर्ण अर्थव्यवस्था है। दुनिया में जिन्सों के कुल निर्यात और आयात में इसका हिस्सा क्रमश: 9.12 फीसद और 13.88 फीसद है। कारोबारी सेवाओं के निर्यात और आयात में इसका हिस्सा क्रमश: 15.24 फीसद और 10.27 फीसद है। मोटे तौर पर, माल और सेवाओं के विश्व व्यापार में एक चौथाई हिस्सेदारी सिर्फ एक देश की है! अमेरिका के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार केतौर पर चुनाव प्रचार के दौरान ट्रंप ने अपने इरादे साफ बता दिए थे। लिहाजा, संरक्षणवाद की तरफ अमेरिका का मुड़ना न तो अचानक है और न ही अप्रत्याशित।

आम सहमति धराशायी

ऐसा नहीं है कि अमेरिका के हालिया फैसलों से पहले व्यापारिक व्यवस्था में संरक्षणवाद नहीं था। तमाम देश चुनिंदा वस्तुओं पर चुनिंदा ढंग से संरक्षणवादी कदम उठाते थे, खासकर जहां मजबूत स्थानीय हितों की हिफाजत की जरूरत पड़ती थी (स्वदेशी लॉबियां!)। हालांकि यह आम सहमति थी कि संरक्षणवाद अच्छी चीज नहीं है और यह खुले तथा मुक्त व्यापार की ओर जाने वाली आम राह से एक विचलन ही है। अमेरिका के मनमाना रुख अख्तियार करने से जाहिर है कि यह वहां स्वीकार्य है। व्यापार युद्ध के रंग-ढंग को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि संरक्षणवाद जल्दी ही कायदा बन जाएगा और एक नियम-आधारित व्यापारिक व्यवस्था खड़ी करने के लिए दशकों तक की गई मेहनत पर पानी फिर जा सकता है। शुल्क संबंधी हाल के फैसले बताते हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति जो ट्वीट करते हैं उसमें सचमुच विश्वास करते हैं : ‘व्यापार युद्ध अच्छे हैं और आसानी से जीते जा सकते हैं।’ वे चीन द्वारा अपनी मुद्रा की विनिमय दर में किए गए कथित हेर-फेर और कुछ देशों द्वारा ऊंचे आयात शुल्क लगाने (जैसे, भारत द्वारा आयातित लग्जरी मोटरसाइकिलों पर, कनाडा द्वारा डेयरी उत्पादों पर) से क्षुब्ध हैं।

ट्रंप के विश्वास के विपरीत, इतिहास और अनुभव हमें बताते हैं कि व्यापार युद्ध में न तो कोई अच्छाई है और न ही वे आसानी से जीते जाते हैं। वे लगभग सभी देशों को जख्म ही देते हैं, और कुल मिलाकर दुनिया का हाल और भी बुरा होता है। मौजूदा व्यापार युद्ध अमेरिका और चीन के आपसी व्यापार के असंतुलन (जिसमें चीन फायदे में है: 2017 में 375 अरब डॉलर) की देन है, और अब भी यह युद्ध पूरी तरह छिड़ा नहीं है। अलबत्ता यह दूसरे देशों को भी अपनी चपेट में ले रहा है। अमेरिका और चीन, तथा अमेरिका और यूरोप ने एक दूसरे के आयात के खिलाफ शुल्क बढ़ाए हैं। भारत का इस्पात और अल्युमिनियम का निर्यात भी इसके चपेटे में आ गया, बस इस वजह से कि भारत के बरक्स अमेरिका का व्यापार घाटा तेईस अरब डॉलर का है!

इस युद्ध में अब भारत भी

भारत का जवाब क्या होना चाहिए? भारत ने पहला वार किया दिसंबर 2017 में, कई उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ा कर, जो कि प्रकट रूप से राजस्व को बढ़ाने वाला कदम था। राजस्व बढ़ाने के लिए बेचैन सरकार ने 2017-18 के बजट में पहले से ज्यादा उत्पादों पर कर बढ़ाए थे। ट्रंप की पहले की घोषणाओं को देखते हुए, यह मानना कठिन है कि दिसंबर 2017 और फरवरी 2018 में सरकार ने जो कदम उठाए उनका अमेरिकी सरकार द्वारा बाद में लिये गए फैसलों से कोई लेना-देना नहीं था, या उन कदमों के पीछे इन फैसलों का कोई अनुमान नहीं रहा होगा।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि परिदृश्य बदल गया है। ऐसा लगता है कि हम कई तरफ से हो रहे व्यापारिक युद्ध के बीच में हैं, और भारत भी इसमें शामिल हो गया है, अमेरिका की अट्ठाईस वस्तुओं पर ऊंचे आयात शुल्क थोप कर; अगर आयात की मात्रा यही रहती है तो शुल्क की नई दरों के चलते 24 करोड़ डॉलर की अतिरिक्त आय होगी। पर भारत के लिए यह बड़ा जोखिम-भरा कदम है। विश्वयुद्ध के बाद के बरसों में, व्यापार में बढ़ोतरी, वैश्विक उत्पादन में भारी विस्तार की एक मुख्य चालक शक्ति रही है। भारत जैसे विकासशील देश मैन्युफैक्चरिंग के केंद्र और प्रमुख सेवा प्रदाता हो सकते हैं। इसके विपरीत, व्यापार व उत्पादन की वृद्धि दर का उलटाव विकासशील देशों को ही सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाएगा। भारत का निर्यात विश्व-व्यापारके परिमाण का मुखापेक्षी है। पिछले चार सालों में विश्व-व्यापार की वृद्धि दर संतोषजनक नहीं रही है; और जिन्सों के निर्यात की भारत की वृद्धि दर तो ऋणात्मक रही। (देखें तालिका)

गंवाएगा कौन?

व्यापार युद्ध और संरक्षणवाद आर्थिक स्थिति को और मुश्किल बनाएंगे। निर्यात में 15 फीसद या उससे अधिक की बढ़ोतरी के बगैर, कोई भी देश तेज (दो अंक की) वृद्धि दर हासिल नहीं कर सका है। इसे ‘मेक इन इंडिया’ के द्वारा भारत के लिए हासिल कर पाना अभी सपना ही है। हमें ‘मेक इन इंडिया’ को सारी दुनिया के लिए बनाना है। यह तभी हो सकता है जब निर्यात में जबर्दस्त बढ़ोतरी हो। लेकिन हमारी अर्थव्यवस्था के इस क्षेत्र का प्रदर्शन पिछले चार साल में बहुत फीका रहा है। भारत का हित इसी में है कि वह परिपक्वता से पेश आए और एक खुली व्यापार व्यवस्था के पक्ष में खड़ा हो। यह सही है कि भारत अमेरिका या चीन नहीं है, पर इसकी अर्थव्यवस्था इतनी बड़ी जरूर है कि उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

जिन्सों के विश्व-भर के निर्यात और आयात में हमारा हिस्सा क्रमश: 1.65 फीसद और 2.21 फीसद है। व्यावसायिक सेवाओं के निर्यात और आयात में हमारा हिस्सा क्रमश: 3.35 फीसद और 2.83 फीसद है। जब कुछ देश विश्व-व्यापार अस्त-व्यस्त कर रहे हों, तो जरूरत इस बात की है कि दुनिया के समझदार देशों का एक गठजोड़ बने जो विश्व व्यापार को स्थिरता प्रदान करे। मेरी एक बिन-मांगी सलाह है: भारत के सामने यह अवसर है कि वह प्रतिशोधात्मक शुल्क थोपने का रास्ता न अपनाए और कम व्यापार तथा ऊंची शुल्क दरों के बजाय अमेरिका को अधिक व्यापार व कम शुल्क दरों की पेशकश करके समझौता वार्ता करे।

 

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