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दलित साहित्य का स्वरूप

बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा प्रयुक्त ‘ब्रोकन मैन’ के पर्याय के तौर पर दलित शब्द प्रयुक्त होना शुरू हुआ। उनके परिनिर्वाण के दो वर्ष बाद 1958 में दलित के साथ साहित्य का सचेत प्रयोग किया गया।

बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा प्रयुक्त ‘ब्रोकन मैन’ के पर्याय के तौर पर दलित शब्द प्रयुक्त होना शुरू हुआ। उनके परिनिर्वाण के दो वर्ष बाद 1958 में दलित के साथ साहित्य का सचेत प्रयोग किया गया। इस प्रकार ‘दलित साहित्य’ पदबंध अस्तित्व में आया। आंबेडकर ने सुप्त चेतना को झकझोर कर आत्मगौरव के बोध और स्वत्व के प्रकटीकरण की जो जमीन तैयार की थी उसने शीघ्र ही दलित साहित्य को आंदोलन का रूप दे दिया। जातिवादी समाज ने कभी सपने में भी न सोचा था कि यह समुदाय एक दिन इस तरह उठ खड़ा होगा और उसका अपना साहित्य रचा जाएगा।

दलित साहित्य को ‘साहित्य’ के रूप में लंबे समय तक मान्यता न मिलने की मुख्य वजह यह सवर्ण सोच ही थी।
दलित रचनाकारों ने इस मान्यता की ज्यादा परवाह न करते हुए अपना काम किया। एक प्रांत विशेष में उभरे दलित साहित्य ने अखिल भारतीय स्तर पर अपनी जगह बनाई। आज दलित साहित्य भारतीय साहित्य का मुख्य स्वर है। भारतीय साहित्य की समृद्धि में उसका योगदान ऐतिहासिक है ही, उसने भारतीयता की अवधारणा में भी बहुत कुछ जोड़ा है। सतत विकसनशील आंदोलन होने की वजह से अभी उसके योगदान का कामचलाऊ आकलन ही किया जा सकता है।

वर्ष 1958 में महाराष्ट्र दलित साहित्य संघ ने प्रथम दलित साहित्य सम्मेलन किया था। इस सम्मेलन ने दलित साहित्य और दलित आंदोलन को जोड़ कर देखा और साहित्य सृजन की क्रांतिकारी भूमिका का रेखांकन किया। आंदोलनधर्मी साहित्य रचने के आह्वान के साथ सम्मेलन में कई प्रस्ताव पारित किए गए। प्रस्ताव संख्या पांच में कहा गया कि ‘मराठी में दलितों द्वारा और गैर-दलितों द्वारा दलितों पर लिखे गए साहित्य को दलित साहित्य नाम से स्वतंत्र मान्यता दी जाए और इसके सांस्कृतिक महत्त्व को समझते हुए विश्वविद्यालयों और साहित्यिक संगठनों द्वारा इसे उचित स्थान दिया जाए।’

अब यह आंदोलन अपने छठे दशक में चल रहा है। इतने लंबे समय तक भारत की किसी भी भाषा के आधुनिक काल में कोई साहित्य युग नहीं चला है। यह बात ध्यान देने की है कि अलग-अलग भाषाओं में थोड़ी भिन्नता के साथ लिखे जाने के बावजूद दलित साहित्य का स्वरूप प्रांतीय न होकर अखिल भारतीय रहा है। इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहा जाए कि दलित साहित्य जिस पदवी का अधिकारी है उसे स्वीकार करने में विद्वान, साहित्य-आलोचक और साहित्येतिहासकार सुचिंतित मौन साधे हुए हैं! भारतीय साहित्य के अधिकारी समीक्षक भी दलित साहित्य को परिशिष्ट से अधिक जगह देने को राजी नहीं!

दलित साहित्य की चर्चा अक्सर आरोपों-प्रत्यारोपों में ही उलझा कर रखी जाती है। असल संदर्भों तक ध्यान जाने से रोकने का यह आजमाया हुआ नुस्खा है। जाति-संरचना को बनाए रखने वालों का हित भी इसी में है। दलित साहित्य के तीन अनिवार्य संदर्भ हैं- हिंसा, राजनीति और शक्ति (पॉवर)। हिंसा का एक सिरा धर्मशास्त्रों से जुड़ा है, तो दूसरा समकालीन शास्त्रेतर हिंसा से। स्मृतिग्रंथ दलितों पर हिंसा को धार्मिक वैधता देते हैं। कतिपय पौराणिक और पारंपरिक आख्यान इस हिंसा का व्यावहारिक नमूना पेश करते हैं। ये नमूने वर्ण-जाति आधारित हिंसा को स्वीकार्य बनाते और सामूहिक मानस में इसे ‘सहज गतिविधि’ के तौर पर स्थापित करते हैं।

आंबेडकर की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा धर्माधारित हिंसा को उद्घाटित और विश्लेषित करने में खर्च हुआ। दलित साहित्य में धर्मशास्त्रीय हिंसा पर प्रभूत सामग्री संचित है। सिर्फ शंबूक प्रसंग पर भारतीय भाषाओं में दलित रचनाकारों द्वारा लिखी कविताओं, कहानियों को इकट््ठा किया जाए, तो एक वृहद् ग्रंथ बन जाएगा! उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के पूर्वार्ध के समाजसुधारकों और फुले-आंबेडकर जैसे सामाजिक क्रांतिकारियों के सतत प्रयासों ने उम्मीद बंधाई थी कि आजाद भारत में हिंसा के दुश्चक्र पर विराम लगेगा। कहने की जरूरत नहीं कि यह उम्मीद धूल-धूसरित हुई।
स्वाधीनता के सात दशक बीत रहे हैं और दलितों पर हिंसक हमलों में बढ़ोत्तरी होती जा रही है। दलित साहित्यकार इस हिंसा से रूबरू हैं। हिंसा के संदर्भों से दलित साहित्य भरा हुआ है। इस परंपरा-पोषित हिंसा को मदांध गज से उपमित करते हुए पहली पीढ़ी के हिंदी दलित कवि मलखान सिंह लिखते हैं- ‘मदांध हाथी लदमद भाग रहा है/ हमारे बदन/ गांव की कंकरीली/ गलियों में घिसटते हुए/ लहूलुहान हो रहे हैं/ हम रो रहे हैं/ गिड़गिड़ा रहे हैं/ जिंदा रहने की भीख मांग रहे हैं/ गांव तमाशा देख रहा है/ और हाथी/ अपने खंभे जैसे पैरों से/ हमारी पसलियां कुचल रहा है/ मवेशियों को रौंद रहा है/ झोपड़ियां जला रहा है/ गर्भवती स्त्रियों की नाभि पर/ बंदूक दाग रहा है/ और हमारे दुधमुंहे बच्चों को/ लाल लपलपाती लपटों में/ उछाल रहा है।’

इस बीच हिंसा के नए रूपों का उभार हुआ है। जो समुदाय बहुजन संकल्पना का हिस्सा माने जाते हैं वे भी दलितों पर नृशंस हमले कर रहे हैं। इन हमलों की धर्मशास्त्रीय व्याख्या मुश्किल है। ये नए हमलावर ब्राह्मण सर्वोच्चता को नहीं स्वीकार करते। वेद-स्मृति में कतई आस्था नहीं रखते। उदाहरण के लिए तमिलनाडु को देखा जा सकता है। जो जाति-समुदाय कभी पेरियार के ब्राह्मण-विरोधी आंदोलन के भागीदार थे और अब भी उस विचार के समर्थक हैं, वे दलितों पर हमले कर रहे हैं। नवंबर 2012 में धर्मपुरी जिले में उन्होंने एक साथ तीन दलित बस्तियों पर हमला करके मकान सहित सारी जमा-पूंजी तहस-नहस की। हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र और ओड़ीशा आदि प्रांतों से दलितों पर इसी तरह की हिंसा की खबरें अक्सर मिलती रहती हैं।
हिंसा का एक अन्य रूप उदारीकरण से प्रकट हुआ है। बहुराष्ट्रीय निगम दलितों के हाथों का हुनर छीन कर जीविका पर हमला कर रहे हैं। सार्वजनिक/ सरकारी उपक्रम निजीकरण के हवाले किए जा रहे हैं। इनमें दलितों का प्रवेश वर्जित है। होटल, मॉल और प्राइवेट फैक्टरियों के लिए दलित-आदिवासी बस्तियों को उजाड़ा जा रहा है।

राजनीति से दलित साहित्यकारों के रिश्ते अटपटे रहे हैं। दलित राजनीति से खासकर। उनका जुड़ाव सामाजिक आंदोलनों से रहा है। ये आंदोलन सशक्तीकरण के माध्यम बने। इन्होंने तमाम दलित जातियों को एकजुट होने का धरातल मुहैया कराया। तंत्र में तब्दीली की राह निकाली। ये सारे काम राजनीति को करने थे। यह तथ्य अक्सर ओझल रह जाता है कि दलित पैंथर का निर्माण दलित राजनीति से नवयुवकों के विद्रोह के फलस्वरूप हुआ। बाबासाहेब द्वारा परिकल्पित लेकिन उनकी मृत्यु के बाद बनी रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया (आरपीआइ) ने दलित समुदाय में आशा का संचार किया था। दुखद यह कि बहुत जल्दी ही पार्टी विभिन्न धड़ों में बंट गई। वैयक्तिक सत्ता और निजी लाभ के लोभ में कई नेताओं ने समझौते किए। बेबी कांबले के शब्दों में दलित समुदाय की उम्मीदों के साथ गद्दारी की। इन्हें धिक्कारते हुए नई पीढ़ी के जुझारू और रचनाशील दलित युवाओं ने पैंथर बनाया। उत्तर भारत में बीएसपी का ऐसा ही हश्र हुआ। जिस वर्चस्ववादी ताकत से उन्हें टकराना था, पार्टी उन्हीं की हमजोली बन गई।

मोहभंग के ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर सत्ता की राजनीति- ‘गुरुकिल्ली’ पर दलित चिंतक पुनर्विचार कर रहे हैं। शक्ति के केंद्रीकरण के दुष्परिणामों से वाकिफ दलित साहित्यकार सत्ता का विलय चाहते हैं। तमिल दलित लेखक राज गौतमन का मंतव्य है- ‘सत्ता से दमित रहे लोग आज सत्ता का स्वाद पाने की इच्छा रखते हैं। स्थिति भी अनुकूल दिखाई पड़ रही है। लेकिन, दलित मुक्ति मूलत: सत्ता को नष्ट करने में है। केवल वही राजनीति दलित राजनीति हो सकती है, जो सत्ता को नष्ट कर दे।’

बजरंग बिहारी तिवारी

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