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किताबें मिलीं: लाल पोस्ते के फूल, बात अभी खत्म नहीं हुई

उपन्यास में लंबे समय से चले आ रहे इस भ्रम को तोड़ा गया है कि तिब्बत धर्मनिष्ठ उपासकों का एक शांतिपूर्ण समाज था। उपन्यास का केंद्र बिंदु देश का पूर्वी भाग है। यहां के निरंकुश शासक विलासितापूर्ण जीवन तो जीते ही थे, सत्ता को बनाए रखने के लिए खूनी संघर्ष और छल-प्रपंच से भी परहेज नहीं करते थे। इनकी ताकत का स्रोत मिंग और छिड. सम्राट थे।

Author April 1, 2018 05:30 am
लाल पोस्ते के फूल बुक का कवर पेज।

लाल पोस्ते के फूल
‘लाल पोस्ते के फूल’ आ लाए का मूलत: अंग्रेजी में लिखा उपन्यास है। इसमें लाए ने तिब्बत के उस इलाके पर कलम चलाई है जहां दशकों पहले निरंकुश मुखियों का शासन था। तिब्बत यह इलाका चीन के नियंत्रण में तो बाद में आया। उपन्यास में लंबे समय से चले आ रहे इस भ्रम को तोड़ा गया है कि तिब्बत धर्मनिष्ठ उपासकों का एक शांतिपूर्ण समाज था। उपन्यास का केंद्र बिंदु देश का पूर्वी भाग है। यहां के निरंकुश शासक विलासितापूर्ण जीवन तो जीते ही थे, सत्ता को बनाए रखने के लिए खूनी संघर्ष और छल-प्रपंच से भी परहेज नहीं करते थे। इनकी ताकत का स्रोत मिंग और छिड. सम्राट थे। उपन्यास में यही कहानियां तिब्बत के इस भू-भाग की कथा को बयान करती हैं। यह उपन्यास मायची परिवार, उसके शक्तिशाली मुखिया, उसकी चीनी पत्नी, उसका पहला बेटा जो गद्दी का संभावित उत्तराधिकारी था, और दूसरा बेटा जो महामूर्ख माना जाता था, का आख्यान है। मायची परिवार का सबसे मूर्ख बेटा ही इस उपन्यास का मुख्य नायक है और वही इसे बयान भी करता है। उपन्यास का काल 1930 का दशक है। उपन्यास में वशांनुगत शासन, किसानों और भू-दासों की दर्दनाक जिंदगी, व्यापारी और स्थानीय लामा बहुत ही नाटकीय दृश्य प्रस्तुत करते हैं। अपनी-अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए मुखियाओं का जो संघर्ष होता है, उसका सजीव चित्रण इस उपन्यास में देखने को मिलता है। इस कृति में बताया गया है कि किस तरह चीन की राष्ट्रवादी प्रतिक्रियावादी सरकार का प्रतिनिधि मायची इलाके में आता है और अफीम की खेती के लिए दबाव बनाता है। मायची के मुखिया से वह अफीम खरीदता है और बदले में उसे हथियार देता है। एक वक्त ऐसा भी आता है जब तिब्बत का यह पूरा इलाका अफीम की खेती करने लगता है और चारों ओर पोस्त के फूल ही नजर आते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि वहां अनाज की खेती बंद हो जाती है और अकाल पड़ने लगता है। इस यथार्थ की जानकारी तह होती है जब कम्युनिस्टों की जनमुक्ति सेना तिब्बत में प्रवेश करती है और मुखिया प्रथा को समाप्त कर वहां की सामाजिक व्यवस्था को बदल डालती है।
लाल पोस्ते के फूल : आ लाए; अनुवाद : आनंद स्वरूप वर्मा, प्रकाशन संस्थान, 4268 / बी-3, अंसारी रोड, नई दिल्ली-110002 ; मूल्य 800 रुपए।

बात अभी खत्म नहीं हुई
क्षमा शर्मा पिछले चालीस सालों से कहानियां लिख रही हैं। उनकी कहानियों को एक तरह से भारत में स्त्रियों की पल-पल बदलती स्थितियों के दस्तावेज के रूप में देखा जाता है। वे बदलती स्त्री, उसके बदले तेवर को बार-बार रेखांकित करती हैं। किसी भी विमर्श या वाद की बेड़ी से मुक्त वे स्त्रियों ही नहीं, पुरुषों की समस्याओं को भी मानवीय नजर से देखती हैं। उनका मानना है कि किसी भी एक नजरिए की झाड़ू से पूरे समाज को हांका नहीं जा सकता।
पेशे से पत्रकार क्षमा जिंदगी की हर क्षण बदलती तस्वीर को किसी चित्रकार की तरह पेश करती हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित इस पुस्तक में संकलित उनकी ये कहानियां अनूठी शैली और ताजगी से भरपूर हैं।

बात अभी खत्म नहीं हुई: क्षमा शर्मा; वाणी प्रकाशन, 4695, 21- ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 275 रुपए।

मैं हवा को पढ़ना चाहती हूं
मैं हवा को पढ़ना चाहती हूं’ रमणिका गुप्ता की कविताओं का अनूठा संग्रह है। इस संग्रह की कविताओं का मुख्य स्वर समकालीन कविता के स्वरूप और संवेदना से हट कर है। ये कविताएं एक ओर रागात्मक संबंधों को लेकर रची गई हैं तो दूसरी ओर उनका सामाजिक और राष्ट्रीय परिदृश्य भी है। एक ओर उनके निजी जीवन के मनोभाव हैं, तो सामाजिक सरोकारों की भरी-पूरी दुनिया भी है। इन कविताओं में अदम्य जिजीविषा, आस्था और संघर्ष के साथ-साथ परिवर्तन की अकुलाहट भी दिखाई पड़ती है। लोकचिंता के साथ अस्तित्व चिंता भी है। कविता संग्रह के शुरू में तीन कविताएं हवा को लेकर हैं। प्रकृति की गोद में ही उनके कवि को सकून मिलता है। प्रकृति का साहचर्य उनमें एक नई ऊर्जा और जोश भरता है। इसीलिए वे हवा को पढ़ना चाहती हैं। हवा और समय से संवाद करती हुर्इं वे जीवन की दाशज्ञनिक पृष्ठभूमि को तलाशती हैं और समय की सच्चाई को आत्मसात करती हैं। रमणिका गुप्ता की कविताएं उनके अंतर्मन की आवाज हैं। रमणिका गुप्ता में अपने अस्तित्व-बोध का एहसास निरंतर जगा रहता है। इसीलिए वे अपने समय को अपनी रचनात्मक गतिशीलता से जीवंत किए रहती हैं। इस संग्रह की कविताओं में सहजता है, माधुर्य है, सौंदर्य चेतना है, कला सौष्ठव है, तकलता और आवेग है। रमणिका गुप्ता को प्रकृति से गहरा लगाव है। उनकी कविताओं में झारखंड की धरती, वहां के पहाड़, जंगल, मदमस्त हवा बार-बार अभिव्यक्त होते हैं। झारखंड की कोयला खानों और उनमें काम करने वाले मजदूरों और आदिवासियों से उनका गहरा तादात्मय रहा है।
‘मैं हवा को पढ़ना चाहती हूं’ : रमणिका गुप्ता; अक्षरशिल्पी, 10295, गली नं. 1, वेस्ट गोरख पार्क, दिल्ली-110032 ; मूल्य 250 रुपए।

स्मृतियों का बाइस्कोप
स्मृतियों का बाइस्कोप’ में कवि-लेखक शैलेंद्र शैल ने अपने पुराने दिनों को याद किया है। यह कृति उनके संस्मरणों का पहला संग्रह है। इसमें लेखक ने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, निर्मल वर्मा, डा. इंद्रनाथ मदान, ज्ञानरंजन, रवींद्र कालिया, कुमार विकल और सतीश जमाली जैसे मित्रों, लेखकों और गुरुओं के साथ अपने उन लम्हों का लेखा-जोखा पेश किया है, जिन्हें उन्होंने शिद्दत से जीया। सातवें दशक के इलाहाबाद की झलक भी संस्मरणों के इस संग्रह में मिलती है। इसमें जगजीत सिंह को याद किया है और पंडित शिव कुमार शर्मा को भी। लेखक जगजीत सिंह के सहपाठी रहे हैं। सारे संस्मरणों की खूबी यह है कि इनमें भाव प्रवणता के साथ-साथ अल्पकथन की शैली अपनाई गई है।
लेखक ने संग्रह में निजी स्मृतियां को भी पूरा स्थान दिया है। तीसरे और अंतिम खंड में मां पर आत्मीय संस्मरण दिया गया है। पत्नी के साथ प्रेम और दांपत्य का जिक्र नहीं होता, तो यह संग्रह अधूरा ही रहता। इन सभी संस्मरणों की विशेषता यह है कि पहली पंक्ति से ही पाठक इनमें रम जाता है।
स्मृतियों का बाइस्कोप : शैलेंद्र शैल; भारतीय ज्ञानपीठ, 18, इंस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड नई दिल्ली-110003 ; मूल्य 300 रुपए।

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