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किताबें मिलीं : शब्दों से गपशप, आखिर क्या हुआ?

लोकनाथ यशवंत का यह दूसरा कविता संग्रह उचित समय के बाद लोगों के सम्मुख आ रहा है। उनका पहला काव्य संग्रह ‘अब हो ही जाने दो!’ काफी चुनौतीपूर्ण था और वह चर्चित भी रहा। उसे अनेक पुरस्कार भी प्राप्त हुए। उस पर खूब लिखा भी गया।

Author March 18, 2018 3:56 AM
आखिर क्या हुआ? बुक का कवर पेज।

शब्दों से गपशप
हमारी कविता परंपरा में जहां अज्ञेय, कुंवर नारायण, केदारनाथ सिंह, अशोक वाजपेयी, विनोद कुमार शुक्ल और लीलाधर जगूड़ी जैसे कवि हैं, जिनका ध्यान शब्दों और उनकी बारीकियों को महिमा के साथ रचने और गढ़ने का रहा है, वहीं ऐसे कवियों का भी एक बड़ा समूह है जिसने जीवन के संघर्ष और यथार्थ को कविता के केंद्र में रखा है। नागार्जुन की कविताओं में धूसर, गंवई और भदेस-सी दिखने वाली पद-संरचना के बावजूद उन्हें पढ़ते हुए कभी यही नहीं लगता कि ये उपमान मैले हो गए हैं या इन प्रतीकों के देवता कहीं कूच कर गए हैं। केदारनाथ अग्रवाल ने साम्राज्यवाद के विरुद्ध बिगुल फूंका है, तो त्रिलोचन के सम्मुख भी एक लड़ता हुआ समाज था, जिसे वे नई भाषा देने में लगे रहे। लीलाधर मंडलोई, अरुण कमल और अष्टभुजा शुक्ल जैसे कवियों ने कविता में वाचिक का महत्त्व समझा है और कविता के अंदाजेबयां को मांजा है। अष्टभुजा शुक्ल ने शास्त्र को कभी कविता का आयुध नहीं बनाया। लोक और शास्त्र के संतुलन को वे कुश्लता से साधे रहे। अपने व्यापक सामाजिक यथार्थ में सांस लेने वाली ज्ञानेंद्रपति की कविता भी आधुनिक समाज पर एक क्रिटीक है। शब्दों से गपशप ऐसे ही कुछ कवियों की कविता से संवाद है। कविता और कवियों से गपशप है। आलोचना की सख्त छवि से बचते हुए कविता से आज ऐसे ही गपशप की जरूरत है, जिससे आलोचना का अंदाजेबयां बदले। आलोचक अपनी रूढ़ छवि के चौखटे से बाहर आए और कविता के प्रशस्त गलियारे से एक यायावर की तरह गुजरे; उसकी अर्थच्छवियों में कहीं दूर सैर के लिए निकल जाए और जब वह बोले तो आलोचना की भाषा-भंगिमा भी कुछ बदली-बदली-सी लगे। इस कृति का यही मंतव्य और गंतव्य है।
शब्दों से गपशप- अज्ञेय से अष्टभुजा शुक्ल: ओम निश्चल; साहित्य भंडार, 50, चाहचंद, इलाहाबाद; 100 रुपए।

आखिर क्या हुआ?
लोकनाथ यशवंत का यह दूसरा कविता संग्रह उचित समय के बाद लोगों के सम्मुख आ रहा है। उनका पहला काव्य संग्रह ‘अब हो ही जाने दो!’ काफी चुनौतीपूर्ण था और वह चर्चित भी रहा। उसे अनेक पुरस्कार भी प्राप्त हुए। उस पर खूब लिखा भी गया। ‘आखिर क्या हुआ!’ यह दूसरा काव्य संग्रह भी काफी खलबली मचाने वाला है। डॉ बाबा साहब आंबेडकर ऐसे सर्वव्यापी हो चुके हैं कि दलित जीवन तथा दलित मन का एक क्षण भी ऐसा नहीं है, जहां आंबेडकर नहीं हैं। …देखा जाए तो लोग खुद की मुक्ति के लिए लालायित हो चुके हैं। परिवर्तन की लहर पूरे देश, विदेशों में आगे बढ़ते हुए दिखाई दे रही है। देखने की इच्छा रखने वाले को यह लहर दिखाई देती है। ‘दांत के लिए हाथी को मारने का गणित’ यह लोकनाथ यशवंत की कविता डॉ बाबा साहब आंबेडकर के प्रभाव से तैयार हुई है। बाबा साहब के समय के लोगों ने अपने बंधनों की मुक्ति के लिए अपने प्राणों की बाजी लगाई। अपार त्याग किया। अनेक संकट झेले और बंधन मुक्ति का आंदोलन सफल कर बतलाया। परंतु बाबा साहब और उनकी पीढ़ी खत्म होते ही ‘भाई साहब’ यह एक नया अध्याय दलित आंदोलन में उभर कर आया। कवि को यह गणित को समझ लेने में कठिनाई हो रही है, क्योंकि कवि के सामने दलित आंदोलन की आंबेडकर की पीढ़ी के त्यागमय, संघर्षमय हजारों आदर्श हैं। इन तेजस्वी आदर्शों से कवि का मन अभिभूत है। लोकनाथ यशवंत की कविता ईसा मसीह को कीलें ठोंकने वाली हिंसा सत्ता से दूर है। यों देखा जाए तो प्रत्येक जनकवि, कलाकार हमेशा सरकारी सत्ता, दमन-सत्ता के विरोध में ही रहता है। अच्छे लोककवि की प्रमुख विशेषता यह होती है कि वह हमेशा जनता का पक्षधर होता है और प्रस्थापितों का विरोध करता है। वामपंथी विचार उसके काव्य की प्रमुख विशेषता होती है। ताकत होती है। लोकनाथ यशवंत की कविता सामान्यजन की कविता है। कवि नग्न व्यवस्था का आईना सहजता तथा स्पष्टता से बतला देता है और इसीलिए उनकी कविता सभी शोषितों की कविता बन जाती है…।
आखिर क्या हुआ? : लोकनाथ यशवंत; अनुवाद: ओमप्रकाश वाल्मीकि; वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 175 रुपए।

भारतीय लोककथाओं पर आधारित उर्दू मसनवियां
गजल के बाद हमारे शायरों ने जिस विधा पर सबसे ज्यादा अभ्यास किया, वह मसनवी ही है। उर्दू की दूसरी विधाओं की तरह हमारी मसनवियां भी उस ग्रहण व स्वीकार, मेलजोल और साझेदारी का पता देती हैं जो हिंदुओं और मुसलमानों के आपसी मेलजोल के बाद यहां सांस्कृतिक और सामाजिक स्तर पर भी सक्रिय रहीं।
संयोग की बात है कि उस जमाने में जब उर्दू शायरी अभी अपने विकास की मंजिलें, मजहब व तसव्वुफ के सहारे तय कर रही थी, उर्दू की सर्वप्रथम मसनवी में एक भारतीय किस्से को विषय वस्तु बनाया गया। यह मसनवी बह्मनी दौर के एक शायर निज़ामी से संबद्ध की जाती है और उसमें कदमराव पदमराव का स्थानीय किस्से का वर्णन है। यह मसनवी संभवत: अहमद शाह सालिस बह्मनी (865-867 हि.) के जमाने में लिखी गई। प्राचीन मसनवियों में साधारणत: किस्से कहानियां बयान की जाती थीं, जिनका गहरा संबंध राष्ट्रीय परंपराओं, धर्म और सामाजिक जीवन से होता था। हमारी मसनवियां चूंकि साझा संस्कृति और मिले-जुले सामाजिक जीवन के प्रभाव में लिखी गर्इं, इसलिए उनमें इस्लामी किस्से कहानियों के अलावा भारतीय लोक कथाओं और लोक परंपराओं से प्रभावित होने का रुझान भी पाया जाता है। इसी रुझान का वस्तुपरक और शोधपरक दृष्टि से जांच परख करना प्रस्तुत पुस्तक का विषय है।
भारतीय लोक कथाओं पर आधारित उर्दू मसनवियां (आलोचना) : गोपी चन्द नारंग; अनुवाद: ख़ुर्शीद आलम; भारतीय ज्ञानपीठ, 18 इंस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली; 400 रुपए।

भारतवर्ष का मौलिक रूपांतरण कार्यक्रम
इस पुस्तक में एक संक्षिप्त प्रारंभिक प्रस्तुतिकरण के पश्चात भारतवर्ष की वर्तमान स्थिति की समीक्षात्मक तथा तथ्यपूर्ण विश्लेषण किया गया है, जिससे यह सरलतापूर्वक समझा जा सकता है कि भारत में सभी प्राकृतिक संपदा एवं प्रतिभावान व्यक्तियों के होते हुए भी क्यों अधिकांश भारतवासी कठिनाइयों से भरा जीवन व्यतीत करने को विवश हैं। इसके उपरांत भारत तथा भारतवासियों के लिए एक भव्य दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया है- जो कि पांच से आठ वर्ष में भारत का स्थान संयुक्त राष्ट्रसंघ की मानवीय विकास सूची में वर्तमान 135 वें से अग्रसर कर प्रथम 10 राष्ट्रों में प्रस्थापित करने का दृष्टिकोण है। इस दृष्टिकोणिक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एक मौलिक रूपांतरण कार्यक्रम, जिसमें समाधान के रूप में लगभग 100 अत्यंत विशाल योजनाओं तथा उनकी कार्यान्वयन कूटनीति का वर्णन है, की चर्चा की गई है।
भारतवर्ष का मौलिक रूपान्तरण कार्यक्रम : जसवीर सिंह; कल्पाज पब्लिकेशन, सी-30, सत्यवती नगर, दिल्ली; 640 रुपए।

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