पुस्तकायन : जाति का घुन - Jansatta
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पुस्तकायन : जाति का घुन

‘शब्द’ कहानी संभ्रांतता प्रदर्शन के लिए वर्चस्वशाली भाषा के प्रयोग पर जहां प्रश्न उठाती है, वहीं भाषा के शुद्धतावादी नजरिए को लेकर सजग भी है।

Author नई दिल्ली | April 23, 2016 11:52 PM
शब्द: बसंत त्रिपाठी; भारतीय ज्ञानपीठ,18, इंस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली; 200 रुपए।

बसंत त्रिपाठी के संग्रह शब्द में कुल नौ कहानियां हैं। पहली कहानी ‘तीन दिन’ के प्रमुख पात्र प्रो. सिन्हा वनस्पति विज्ञान के प्रोफेसर हैं, जो मनुष्य पर परिस्थितिकी के प्रभाव को लेकर गहन चिंतन-मनन और शोध में सक्रिय हैं। महत्त्वपूर्ण है आज की पारिस्थितिकी को जानना, इसे महसूस करना और अपने जाने हुए के प्रति जिम्मेदार बनना। जीव की तात्कालिक आवश्यकताओं के अनुरूप जीवन को बदलना, जीवन को बचाने के लिए संघर्ष करना। लेकिन परिस्थितिकी ही व्यक्ति के निर्माण में सर्वाधिक कारगर साबित नहीं हुई है, मानसिक धरातल पर उसकी निर्मिति भी महत्त्वपूर्ण कारक हो सकती है। क्योंकि प्रो. सिन्हा के व्यक्तित्व निर्माण में उनकी मां की मानसिक संरचना का पूरा प्रभाव है। अकारण नहीं है कि उनका व्यक्तित्व धीरे-धीरे ऐसा बनता गया कि, वे समाज से कटते गए।

‘अतीत के प्रेत’ कहानी निर्वासन के कारण मानसिक धरातल पर पैदा प्रभाव को रेखांकित करती है। निर्वासित व्यक्ति अपनी पूरी जिंदगी ‘वह’ और ‘आत्म’ के द्वंद्व में गुजरता है। कई बार तो इस द्वंद्व में उसका सब कुछ समाप्त हो जाता है, लेकिन लोग उसकी व्यथा को समझने के बजाय उसके व्यक्तित्व की कमजोरी मान लेते हैं। गोवा की रोजी इस निर्वासन की व्यथा और द्वंद्व से गुजरती है। वह अपने प्रेमी धनंजय के साथ विवाह करके शिमला आ गई। लेकिन पहाड़ की ऊंचाई और उसकी जिंदगी के साथ तालमेल नहीं बैठा पाई। नतीजतन, धीरे-धीरे घुल कर इस जीवन से विदा हो गई।

‘पिता’ पुराने पड़ चुके शिल्प में लिखी गई कमजोर कहानी है। अटक-अटक कर और खींच- खींच कर लिखी गई यह कहानी परंपरा और आधुनिकता के द्वंद्व को उभारती है। पिता गांव का रहने वाला है और सोच में पूरी तरह पुराने खयालात का। बेटा कॉरपोरेट क्षेत्र में नौकरी करता है और आधुनिक जीवन शैली में रच-बस गया है। कहानी पिता के नजरिए से पुत्र को नहीं, बल्कि पुत्र के नजरिए से बूढ़े-बीमार हो चुके पिता की व्याख्या करती है।

‘अंतिम चित्र’ कैदी नंबर तीन सौ इकहत्तर की कहानी है। उसको फांसी होनी है। फांसी पर चढ़ने के पहले रात में वह चॉक मांगता है। अपने कमरे की दीवार पर उस लड़की का चित्र बनाता है, जिसे वह अपने जीवन में सबसे ज्यादा चाहता था। छोटे कलेवर में लिखी गई यह कहानी कैदी के व्यक्तित्व की एक और व्याख्या करती है। ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है’ कहानी कहना चाहती है कि, धर्म, क्षेत्र, भाषा और जाति की जकड़बंदी से निकल कर एक अच्छा मनुष्य बनना आज कितना मुश्किल हो गया है।

अगर आप सिर्फ मनुष्य बने रहना चाहते हैं तो पग-पग आपको चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। बख्शी और रेहाना के लिए साथ जीना इसलिए मुश्किल हो गया, क्योंकि दोनों का धर्म अलग-अलग था। कहानी अपने पूरे विवरण के साथ मौजूद होकर एक और फलसफे को व्यक्त करती है, जहां सफलता का मतलब कहीं पहुंच कर वहीं बने रहना नहीं होता, बल्कि कई बार किसी पसंदीदा रास्ते पर जीवन भर चलना भी है। रेहाना के न रहने पर बख्शी ने फिर से संगीत-साधना को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। भले उसको वैसी सफलता नहीं मिली, लेकिन संगीत उसके लिए सफलता नहीं, सार्थकता का प्रश्न था।

‘पंद्रह ग्राम वजन’ लेखक और प्रकाशक के बीच बनते-बिगड़ते संबंधों पर व्यंग्य करती है। प्रकाशक का व्यक्तित्व आज के समय में पूरी तरह से परिवर्तित हो चुका है। वह लेखक के परिश्रम या रचना की गुणवत्ता की तरफ न जाकर, अपना सारा ध्यान पैसा कमाने पर लगाए हुए है। वह येन-केन-प्रकारेण जल्दी अमीर बनना चाहता है। दूसरी तरफ लेखक का धैर्य भी अब चूक गया है। वह जल्दबाजी में है, जहां रचना के पूर्ण होने के पहले ही उसके छपास की ज्यादा चिंता सताती रहती है।

‘शब्द’ कहानी संभ्रांतता प्रदर्शन के लिए वर्चस्वशाली भाषा के प्रयोग पर जहां प्रश्न उठाती है, वहीं भाषा के शुद्धतावादी नजरिए को लेकर सजग भी है। ‘मैं’ और ‘वह’ के बीच भागती यह कहानी संवाद शैली में लिखी गई है। वह इस बात को उठाती है कि नए शब्दों को स्वीकार करना स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन जब अपनी ही परंपरा में इतने शब्द हैं तो क्यों न उनका भी प्रयोग करें? वह संस्कृत, मराठी, गुजराती किसी भी भाषा का शब्द हो सकता है।

‘फंदा’ आज के समय की मौजूं कहानी है। आज देश का बड़ा हिस्सा सूखे की चपेट में है। किसान लगातार अपने क्षेत्र से पलायन कर रहे हैं या आत्महत्या करने के लिए मजबूर हैं। विदर्भ के किसानों की स्थिति इस मायने में अलग नहीं है। इन आत्महत्याओं के पीछे अनेक कारण हैं। बीज, खाद, फसल की खरीद, बेहतर जीवन का स्वप्न, बीमा योजनाएं और कर्ज के जाल में मध्यवर्गीय किसान फंस जाते हैं।

सरकारी-गैर-सरकारी फरमानों को सच मान कर बैंकों-महाजनों के नए चक्रव्यूह में फंसे किसानों को जब तक सच्चाई का पता चलता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। इसमें बड़े किसान तो किसी तरह बच जाते हैं, लेकिन छोटे किसान बेमौत मारे जाते हैं। ‘घुन’ इस संग्रह की एक और उम्दा कहानी है। गांव से मुंबई तक का सफर साहिब सिंह के लिए आसान नहीं था। लेकिन अपनी मेहनत और लगन के चलते विज्ञापन फिल्म बनाने में वह शोहरत और पैसा सब हासिल करता है। अपनी काबिलियत से कम समय में ऐसे मुकाम पर पहुंचता है, जिसके कारण गांव से लेकर मुंबई जैसे शहर में चर्चा का विषय बन जाता है। साहिब को भी लगता था कि कॉरपोरेट का क्षेत्र सिर्फ सफलता को सलाम करता है। लेकिन जब जाति का सवाल यहां भी उसका पीछा नहीं छोड़ता, तब उसे गांव की उस सड़ांध की याद ताजा हो गई, जो वर्षों से उसे घुन की तरह खाए जा रहा था। साहिब को लगता है कि यह जाति का घुन कभी उसका पीछा नहीं छोड़ेगा। चाहे वह किसी भी दुनिया में पहुंच जाए और कितना भी सफल हो जाए।

शब्द: बसंत त्रिपाठी; भारतीय ज्ञानपीठ,18, इंस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली; 200 रुपए। (राजेश कुमार राव)
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कविता में सब कुछ संभव
शैलेंद्र शैल मनुष्यता का सपना देखते कवि हैं। वे एक लंबे अंतराल के बाद फिर से उपस्थित हुए हैं, लेकिन उनमें उद्दाम जीजिविषा है और मानवीय विकलता। घर-परिवार के अत्यंत आत्मीय परिजन को लेकर उनके गहरे सरोकार हैं। मां-पिता, गांव-जवार के बरक्स कवि अपनी दुनिया में रहता हुआ भी उसके बारे में सोचता है और वह प्रेम और करुणा के धरातल से उन्हें पुकारता है। पिता साथ नहीं हैं और उनके न होने के बारे में स्वयं बताते हैं। शैल निहायत व्यक्तिगत अनुभूतियों को सार्वभौमिक संवेदनाओं से जोड़ने का प्रयास करते हैं।

कवि मां की मृत देह को असबाब की तरह देखने को विवश है, जो इधर के आधुनिक समाज का अनिवार्य हासिल बनता जा रहा है। कवि बदलते समय और समाज को लेकर गहरे द्वंद्व में है। मनुष्यता यहां आदिम स्वभाव के अनकरीब है और राग संबंधों में भरोसा जताती है।

कविता में अपने समय के व्यावसायिक संबंधों पर कवि की नजर है। डॉक्टर अपने रोगियों से जो रिश्ता बनाता है उसमें लाभ का समीकरण है। कवि कहता है, ‘दरअसल, मौत से खौफजदा लोग/ उसे अच्छे लगते हैं।’ यह हमारे समय की बदलती मानसिकता पर भयानक पंक्ति है।
कविता में सब कुछ संभव: शैलेंद्र शैल; अंतिका प्रकाशन, सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एक्सेंशन-2, गाजियाबाद; 235 रुपए।
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अलगोजा
‘अलगोजा’ पंजाब, राजस्थान और सिंध में बजाया जाने वाला एक लोक वाद्ययंत्र है। इसमें दो बांसुरियां एक साथ बजाई जाती हैं। वादक एक बांसुरी से लगातार एक ही सुर निकालता रहता है और दूसरी पर अपनी अंगुलियों से धुन में बदलता रहता है। शर्त बस इतनी कि वादक की न सांस टूटे, न सुर।

कवि ने भी सुर साधने की कोशिश की है अपने अंतस और बाहरी दुनिया की बांसुरियों से। उसके लिए द्वंद्व और दौड़ की धुन है अलगोजा। रोजमर्रा की ढर्रे और फर्रे से निकलने वाली धुन, जो कभी सुर में होती है और कभी बेसुरी।

कवि के लिए जिंदगी और जद्दोजहद की धुन है अलगोजा। हमेशा सांस लेती हुई और हमेशा पूछती हुई कि आखिर सांस क्यों ले रही है। आहत नाद और अनाहत नाद की धुन है अलगोजा। जो सामने दिखा उसे कह दिया और जो सामने नहीं दिखा उसे भी कह दिया। अपने कहने की लगातार कोशिश में कभी कामयाब हुआ और कभी नहीं। कहे और अनकहे की धुन है अलगोजा, वह जो कह पाया अच्छा, जो नहीं कह पाया, वह भी अच्छा।
अलगोजा: रूपेश कश्यप; हिंद युग्म, 1, जिया सराय, हौजखास, नई दिल्ली; 165 रुपए।
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स्वच्छता का समाजशास्त्र
इस पुस्तक में पर्यावरणीय स्वच्छता की चर्चा के साथ-साथ पेयजल के प्रयोग और नियंत्रण पर भी विचार किया गया है। इस संदर्भ में केंद्र और राज्य सरकारों ने क्या कदम उठाए हैं, तत्संबंधी विविध परियोजनाओं, गतिविधियों और उनके परिचालन को लेकर भी विचार-विमर्श किया गया है।

स्वच्छता अभियान केवल भारत ने नहीं, दुनिया के अनेक देशों ने अपनी ओर से अनेक नीतियों, गतिविधियों और परियोजनाओं को परिचालित किया है। भारत में कई राज्यों में इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य हुए हैं। यूनो जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थान ने भी विभिन्न नीतियों और विधियों से इस काम के लिए विभिन्न देशों को वित्तीय सहायता प्रदान की है। आज तक विभिन्न गतिविधियों द्वारा पर्यावरणीय स्वच्छता स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है।

वर्तमान समय जब स्वच्छता संबंधी बदलते परिप्रेक्ष्य और बदलती विचारधारा की पहचान प्रस्तुत करता है, तब ‘स्वच्छता का समाजशास्त्र’ विषयक सर्वग्राही, मननशील, तर्कशील और गहन चर्चा करने वाला यह ग्रंथ पर्यावरण, जल-वायु के शुद्धीकरण के प्रति भी मंथन करने पर प्रेरित करता है।
स्वच्छता का समाजशास्त्र: अनिल वाघेला; कल्पाज पब्लिकेशन्स, सी-30, सत्यवती नगर, दिल्ली; 940 रुपए।

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