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किताबें मिलीं: ‘नान्या’, ‘दस कालजयी उपन्यास’, ‘पढ़ि-पढ़ि के पत्थर भया’ और ‘सृजन-रंग’

‘नान्या’ की यह कथा अपने भीतर के एकांत में घटने वाले आत्मसंवाद का रूप ग्रहण करती हुई इतनी पारदर्शी हो जाती है कि पाठक एक अबोध की त्रासदी के पास निस्सहाय-सा, व्यथा के वलय में खड़ा रह जाता है।

नान्या

प्रस्तुत कथा-कृति औपनिवेशिक समय के विकास-वंचित अंचल के छोटे से गांव में एक अबोध बालक के ‘मानस के मर्मांतक मानचित्र’ को अपना अभीष्ट बनाती हुई, भाषा के नाकाफीपन में भी अभिव्यक्ति का ऐसा नैसर्गिक मुहावरा गढ़ती है कि भाषा के नागर-रूप में, तमाम ‘तद्भव’ शब्द अपने अभिप्रायों को उसी अनूठेपन के साथ रखने के लिए राजी हो जाते हैं, जो लोकभाषा की एक विशिष्ट भंगिमा रही है। अबोधता के इस अकाल समय में ‘नान्या’ की यह दारुण कथा जिस गल्पयुक्ति से चित्रित की गई है, उसमें प्रभु जोशी का कुशल गद्यकार, दृश्य-भाषा से रची गई कथा-अन्विति को, परत-दर-परत इतनी घनीभूत बनाता है कि पूरी रचना में कथा-सौष्ठव और औत्सुक्य की तीव्रता कहीं क्षीण नहीं होती। कहना न होगा कि यह हिंदी गल्प की पहली ऐसी कृति है, जिसमें बाल-कथानायक के सोचने की भाषा के संभव मुहावरे में, इतना बड़ा आभ्यंतर रचा गया है। इसमें उसकी आशा-निराशा, सुख-दुख, संवेदना के परिपूर्ण विचलन के साथ बखान में उत्कीर्ण हैं, जहां लोक-स्मृति का आश्रय, पात्र की बाल-सुलभ अबोधता को, और-और प्रामाणिक भी बनाता है।

‘नान्या’ की यह कथा अपने भीतर के एकांत में घटने वाले आत्मसंवाद का रूप ग्रहण करती हुई इतनी पारदर्शी हो जाती है कि पाठक एक अबोध की त्रासदी के पास निस्सहाय-सा, व्यथा के वलय में खड़ा रह जाता है। कथा, काल-कीलित होते हुए भी, सार्वभौमिक सत्य की तरह हमारे समक्ष बहुत सारे मर्मभेदी प्रश्न छोड़ जाती है। विस्मय तो यह तथ्य भी पैदा करता है कि कथाकृति, काल के इतने बड़े अंतराल को फलांग कर, साहित्य के समकाल से होड़ लेती हुई अपनी अद्वितीयता का साक्ष्य रखती है।

नान्या : प्रभु जोशी; राजकमल प्रकाशन, 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 395 रुपए।

दस कालजयी उपन्यास

यह कृति, जो रचना और रचना को लेकर प्रायोजित चर्चाओं के बावजूद लोगों के दिलों में देर तक जगह नहीं बना लेती, काल-कवलित हो जाती है, मर जाती है जैसे अखबार में छपी खबर। वह कृति, जो काल की हदों को पार कर लोगों को अभिभूत करती रहती है, प्रभावित करती है, कोई उसे पढ़ता है, फिर पढ़ता है और दूसरों को पढ़ने के लिए कहता है, खरीद कर अपने मित्र-स्नेही को उपहारस्वरूप देता है, क्योंकि वह उसे लाखों परेशानियों, तनाव से भरी जिंदगी में डूबते हुए को कहीं तिनके का सहारा देती है, कालजयी हो जाती है। वह कृति ‘ट्रांसेड’ करती है, वैतरणी पार कर जाती है, स्मृतियों में बसी रहती है। इस किताब में ऐसी ही औपन्यासिक कृतियों की पहचान करके तरसेम गुजराल ने उन पर विचार करने का प्रयास किया है।

प्रस्तुत पुस्तक में दस कालजयी उपन्यास हैं- ‘गोदान’ (प्रेमचंद) ‘बूंद और समुद्र’ (अमृत लाल नागर), ‘शेखर: एक जीवनी’ (अज्ञेय), ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ (आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी), ‘झूठा सच’ (यशपाल), ‘मैला आंचल’ (फणीश्वरनाथ रेणु), ‘तमस’ (भीष्म साहनी), ‘आधा गांव’ (राही मासूम रज़ा), ‘राग दरबारी’ (श्रीलाल शुक्ल), ‘धरती धन न अपना’ (जगदीश चंद्र)। ये दस उपन्यास साहित्य का इतिहास रच रहे हैं। पूरा भारत इन उपन्यासों के माध्यम से देखा जा सकता है। आचार्य शुक्ल ने उपन्यास को लेकर जो कुछ कहा, वह अकारथ नहीं था- ‘‘मानव-जीवन के अनेक रूपों का परिचय कराना उपन्यास का काम है। यह उन सूक्ष्म घटनाओं को प्रत्यक्ष करने का कार्य करता है, यत्न करता है, जिनसे मनुष्य का जीवन बनता है, जो इतिहास आदि की पहुंच से बाहर है। बहुत लोग उपन्यास का आधार शुद्ध कल्पना बताते हैं, पर उत्कृष्ट उपन्यासों का आधार अनुमान शक्ति है, न कि कल्पना।’’

दस कालजयी उपन्यास, जमीन की तलाश: तरसेम गुजराल; वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 395 रुपए।

पढ़ि-पढ़ि के पत्थर भया

ति-भेद आज भी हमारे समाज की एक गहरी खाई है, जिसमें बतौर समाज और राष्ट्र हमारे देश की जाने कितनी संभावनाएं गर्क होती रही हैं। आजादी के बाद भी बावजूद इसके कि संविधान की निगाह में हर नागरिक बराबर है, भेदभाव के जाने कितने रूप हमें शासित करते हैं। कई बार लगता है कि बिना ऊंच-नीच के, बिना किसी को छोटा या बड़ा देखे हुए हम अपने आप को चीन्ह ही नहीं पाते। और भी दुखद यह है कि शिक्षा भी अपने तमाम नैतिक आग्रहों के बावजूद हमारे भीतर से इन ग्रंथियों को नहीं निकाल पाती। इस पुस्तक को पढ़ते हुए हम अनेक ऐसे प्रसंगों से गुजरते हैं, जहां उच्च शिक्षा-संस्थानों में जाति-भेद की जड़ों की गहराई देख कर हैरान रह जाना पड़ता है। इस आत्मकथा के लेखक को अपनी प्रतिभा और क्षमता के रहते हुए भी स्कूल स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक बार-बार अपनी जाति के कारण या तो अपने प्राप्य से वंचित होना पड़ा या वंचित करने का प्रयास किया गया।

लेखक का मानना है कि व्यक्ति की प्रतिभा और उसका ज्ञान उसके मन और मस्तिष्क के व्यापक क्षितिज खोलने के साधन हैं, लेकिन आज वे अधिकतर अनैतिक ही नहीं, संकीर्ण और निर्मम बनाने के जघन्य साधन बन गए हैं। वे कहते हैं कि भारतीय समाज की यही विसंगति उसकी संपूर्ण अर्जित ज्ञान-परंपरा को मानवीय व्यवहार में चरितार्थ न होने के कारण मानवता का उपहास बना देती है और आदर्श से उद्भासित उसकी सारी उक्तियां उसका मुंह चिढ़ाने लगती हैं। यह आत्मकथा हमें एक बार फिर इन विसंगतियों को विस्तार से देखने और समझने का अवसर देती है।

पढ़ि-पढ़ि के पत्थर भया : नंदकिशोर नंदन; राधाकृष्ण प्रकाशन, 7/31, अंसारी मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 495 रुपए।

सृजन-रंग

ज साक्षात्कार किसी भी व्यक्ति को जानने के साथ-साथ उसको समझने का और उसके विचारों के परीक्षण का सबसे बेहतर माध्यम है। भारत में हालांकि अब भी इस माध्यम को उतना महत्त्व हासिल नहीं, जितना कि होना चाहिए। पर पश्चिम में यह विधा सबसे प्रामाणिक पाठ की तरह लोकप्रिय है। साहित्य, पत्रकारिता, राजनीति सहित सभी अनुशासनों में इस विधा को सबसे सम्मान के साथ देखा जाता है। क्योंकि साक्षात्कार दे रहा व्यक्ति अपने से, विचारों से और अपनी चेतना से भाग नहीं पाता, वह प्रस्तुत होता है और हम उसे उसके विचारों सहित उसकी समस्त प्रवृत्तियों में समझ पाते हैं।

यह पुस्तक हमारे समय के आसन्न सांस्कृतिक विमर्शों की पुस्तक है, जो हमें कल की चिंता, वर्तमान की मनोदशा और भविष्य की कठिनाइयों का खाका प्रस्तुत करती है। पूरी पुस्तक में संजय सिंह एक ऐसे प्रतिबद्ध संस्कृतिकर्मी के रूप में सामने होते हैं, जिनकी सब तरफ नजर है और हर प्रश्न पर जिनकी बेबाक राय है। वे साहित्य और संस्कृति के प्रतिनिधियों पर यह दायित्व सौंपते हैं और एक स्पष्ट राय बनने देते हैं। निर्णय पाठकों पर छोड़ते हैं कि वे तय करें कि कहां क्या गलत है और उसे कैसे ठीक होना चाहिए।

सृजन-रंग : संजय सिंह; लोकमित्र, 1/6588, पूर्वी रोहतास नगर, शाहदरा, दिल्ली; 295 रुपए।