ताज़ा खबर
 

किताबें मिलींः ‘डरी हुई लड़की’, ‘जब नील का दाग मिटा’, ‘दुख नाम दिया है मैंने’ और ‘भरतकालीन कलाएं’

प्रस्तुत कृति ‘भरतकालीन कलाएं’ में लेखक ने उपर्युक्त पृष्ठभूमि में नाट्यशास्त्र में प्रतिपादित कला की अवधारणा और विभिन्न कलाओं के नाट्य में विनियोग पर तलस्पर्शी विवेचन किया है।

Author May 20, 2018 04:16 am
किताबें मिलीं

1. ‘डरी हुई लड़की’

इस उपन्यास की कथा दुष्कर्म से पीड़ित एक युवती की ‘साइकी’, अवसाद, खलिश, क्षोभ, भय, एकांत और असुरक्षा की भावना से घिरी हुई है। ज्ञानप्रकाश विवेक ने इस उपन्यास के माध्यम से समाज के सामने एक ऐसे पक्ष को उद्घाटित किया है, जो सामान्यत: समाज में कम ही नजर आता है।
ज्ञानप्रकाश विवेक चुपचाप रह कर रचना करते रहने वाले संजीदा लेखक हैं। इस उपन्यास के मुख्य पात्रों- राजन और नंदिनी के माध्यम से एक ऐसे लोक का निर्माण करते हैं, जहां खामोशी है, सहानुभूति है, प्रेम है। प्रेम की स्वीकार्यता की चाहत है… पर प्रेम को व्यक्त करने का साहस… शायद नहीं है?
उपन्यासकार ने मानवीयता की तमाम तहों को खोलने का प्रयास किया है। जहां व्यक्त न होते हुए भी एक प्रेम विद्यमान है और अपनी पराकाष्ठा को पाने को आतुर भी।
बलात्कार जैसी घटना से जूझ रही नायिका के जीवन जीने की जिजीविषा और नायक की सकारात्मक सोच इस उपन्यास को विशिष्ट बनाता है। पिछले कुछ सालों में जिस तरह ऐसी घटनाएं लगातार बढ़ी हैं और उसमें एक लड़की के लिए जीना दूभर होता गया है, उसमें यह उपन्यास उम्मीद के कुछ सूत्र जोड़ता है।

डरी हुई लड़की : ज्ञानप्रकाश विवेक; भारतीय ज्ञानपीठ, 18 इस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली; 300 रुपए।

डरी हुई लड़की : ज्ञानप्रकाश विवेक; भारतीय ज्ञानपीठ, 18 इस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली; 300 रुपए।

2.’जब नील का दाग मिटा’

हनदास करमचंद गांधी नीलहे अंग्रेजों के अकल्पनीय अत्याचारों से पीड़ित चंपारण के किसानों का दुख-दर्द राजकुमार शुक्ल से सुन कर उनकी मदद करने के इरादे से वहां गए थे। वहां उन्होंने जो कुछ देखा, महसूस किया वह शोषण और पराधीनता की पराकाष्ठा थी, जबकि इसके प्रतिकार में उन्होंने जो कदम उठाया वह अधिकार प्राप्ति के लिए किए जाने वाले पारंपरिक संघर्ष से आगे बढ़ कर ‘सत्याग्रह’ के रूप में सामने आया। अहिंसा उसकी बुनियाद थी। सत्य और अहिंसा पर आधारित सत्याग्रह का प्रयोग गांधी हालांकि दक्षिण अफ्रीका में ही कर चुके थे, लेकिन भारत में इसका पहला प्रयोग उन्होंने चंपारण में किया। यह सफल भी रहा। चंपारण के किसानों को नील की जबरिया खेती से मुक्ति मिल गई, लेकिन यह कोई आसान लड़ाई नहीं थी। नीलहों के अत्याचार से किसानों की मुक्ति के साथ-साथ स्वराज प्राप्ति की दिशा में एक नए प्रस्थान की शुरुआत भी गांधी ने यहीं से की।

यह पुस्तक गांधी के चंपारण आगमन के पहले की उन परिस्थितियों का बारीक ब्योरा भी देती है, जिनके कारण वहां के किसानों को अंतत: नीलहे अंग्रेजों का रैयत बनना पड़ा। इसमें हमें अनेक ऐसे लोगों के चेहरे दिखाई पड़ते हैं, जिनका शायद ही कोई जिक्र करता है, लेकिन जो संपूर्ण अर्थों में स्वतंत्रता सेनानी थे। इस पुस्तक का एक रोचक पक्ष उन किंवदंतियों और दावों का तथ्यपरक विश्लेषण है, जो चंपारण सत्याग्रह के विभिन्न सेनानियों की भूमिका पर गुजरते वक्त के साथ जमी धूल के कारण पैदा हुए हैं। सीधी-सादी भाषा में लिखी गई इस पुस्तक में किस्सागोई की सी सहजता से बातें रखी गई हैं, लेकिन लेखक ने हर जगह तथ्यपरकता का खयाल रखा है।

जब नील का दाग मिटा, चंपारण-1917 : पुष्यमित्र; राजकमल प्रकाशन, 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 150 रुपए।

जब नील का दाग मिटा, चंपारण-1917 : पुष्यमित्र; राजकमल प्रकाशन, 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 150 रुपए।

3.’दुख नाम दिया है मैंने’

इधर की कविताएं जहां संस्कृति, सभ्यता जैसे जटिल विषयों को समेटने में लगी हैं, कविताएं जहां त्रासदी, संत्रास, शहरी वातावरण, प्रेम के अनर्गल छिछले और फुटकर एहसासों को अभिव्यक्त करने में व्यस्त हैं, वहीं वासंती रामचंद्रन की कविताएं निश्छल संबंधों को अपने आंचल में समाहित करती खरी और सच्ची शब्द संरचनाएं प्रतीत होती हैं।

वरिष्ठ रचनाकार गंगा प्रसाद विमल लिखते हैं, ‘वासंती रामचंद्रन ने ‘दुख नाम दिया है मैंने’ में अबोधता में एक विलक्षण उपस्थिति को जगह देते हुए त्रास और दुखबोध का प्रदर्शन नहीं किया है, बल्कि भीतर एक झिंझोड़ने वाली संतप्त भावलहरी को शब्द दिए हैं। उनकी उत्कट प्रेम कविताओं में भी यही विशेषता है। अपने प्रिय के नाम संबोधित कविताओं में हम देख सकते हैं कि वे बहुत व्यक्तिगत स्तर पर एक सार्वजनिक भाव को अभिव्यक्ति देते हुए उसे सार्वजनिक बना रही हैं। ठीक यही वृत्ति उनकी घर से संबंधित कविताओं में भी मिलती है।’ ‘कविता’ की ओर आमंत्रित करती वासंती रामचंद्रन की ये कविताएं पाठकों को अवकाश प्रदान करती, उनके मौन को केंद्र में लाने का प्रयास करती, अनमनी गति को धीमा करने की सोची-समझी संवेदनाओं की अनुनयी गुहार है।

दुख नाम दिया है मैंने : वासंती रामचंद्रन; क प्रकाशन, 43, गणेश नगर-2, गली नं. 2, शकरपुर, दिल्ली; 150 रुपए।

4.’भरतकालीन कलाएं’

नाट्यशास्त्र भारतीय कला परंपरा का एक आकर ग्रंथ ही नहीं, यह एक विश्वकोशात्मक और सर्वांगीण ग्रंथ भी है। विश्व साहित्य में इस कोटि का प्राचीन ग्रंथ दूसरा नहीं है। विभिन्न कलाओं का रंगमंच में विनियोग बताते हुए आचार्य भरत इन कलाओं के स्वरूप और उनके वैशिष्ट्य पर तो विचार करते ही हैं, नाट्य में संपुंजित होकर समस्त कलाएं जिस स्वरूप को प्राप्त करती हैं, उस पर भी वे विचार करते हैं। नाट्य में संसार की सारी कलाएं, ज्ञान, शिल्प और विज्ञान समाहित हो सकते हैं, पर उसके अपने मंच पर, उस मंच की निजता को भंग किए बिना यह समागम होता है।

इसके साथ भरत मुनि का नाट्यशास्त्र कलाओं के संदर्भ में नृतत्त्वशास्त्रीय दृष्टि से जिस सामासिक विन्यास का साक्ष्य देता है, वह आज के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है। नाट्य में गीत और नृत्य के समावेश को लेकर भरत मुनि बताते हैं कि किस प्रकार गंधर्वों, असुरों और अन्य जनजातियों की कलाओं को उन्होंने नाट्य की निजता और शक्तिमत्ता को समृद्ध करने के लिए अपनाया। वस्तुत: कलाओं के विकास की दृष्टि से नाट्यशास्त्र भारतीय परंपरा का एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज भी है।

नाट्यशास्त्र कलाओं की पारस्परिकता और उनके अंत:संबंध पर गहन विचार भी प्रस्तुत करता है। नाट्य में चित्र, प्रतिमालक्षण, आतोद्य, गीत, नृत्य, वास्तु, मूर्ति आदि कलाएं संगुंफित ही नहीं होतीं, इनकी अंतर्निर्भरता भी उसमें प्रतिष्ठित रहती है। अपने अस्तित्व के लिए ये कलाएं एक-दूसरे पर निर्भर हैं। इनमें से एक को जानने और एक में निपुणता के लिए अन्स सभी को जानना आवश्यक होता है।

प्रस्तुत कृति ‘भरतकालीन कलाएं’ में लेखक ने उपर्युक्त पृष्ठभूमि में नाट्यशास्त्र में प्रतिपादित कला की अवधारणा और विभिन्न कलाओं के नाट्य में विनियोग पर तलस्पर्शी विवेचन किया है। यह विवेचन आज के रंगमंच और कला परिदृश्य में अत्यंत प्रासंगिक है। इस ग्रंथ का प्रकाशन नाट्यशास्त्र और भारतीय कला के अध्ययन के क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण अवदान तो है ही, भारतीय कला की इस पहचान के उपक्रम का एक महत्त्वपूर्ण चरण भी है।

भरतकालीन कलाएं : भारतेंदु मिश्र, संगीत नाटक अकादेमी, रवींद्र भवन, 35 फीरोजशाह रोड, नई दिल्ली; 850 रुपए।

भरतकालीन कलाएं : भारतेंदु मिश्र, संगीत नाटक अकादेमी, रवींद्र भवन, 35 फीरोजशाह रोड, नई दिल्ली; 850 रुपए।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App