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किताब समीक्षा: ‘बीज-भोजी’ किसान आत्महत्या और अभाव से हो रही मौतों की दुखभरी गाथा

पांचवीं हिजरत: हुमैरा राहत की शायरी में मीरा, हब्बा खातून से लेकर परवीन शाकिर तक की काव्य परंपरा, जज्बाती गहराई और उनका अपना खास शेरी अंदाज परस्पर घुल कर यकदिल हो गए हैं।
Author नई दिल्ली | January 29, 2017 04:39 am
बीज-भोजी: गौरीनाथ; अंतिका प्रकाशन, सी-56/ यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन-2, गाजियाबाद; 140 रुपए।

आज के दौर में ग्रामीण जीवन पर लिखने वाले कथाकार सामान्य ज्ञान के प्रश्नोत्तर बन कर रह गए हैं। चमकते-दमकते विकास के युग में कीचड़-सने किसानों को कौन पूछता है! दूसरी तरफ गांवों में किसानों और खेती से जुड़े अन्य लोगों का जीवन कठिन से कठिनतर होता चला गया है। कौन रोए उनका दुख, कौन गाए उनका गान! ऐसे कठिन दौर में गौरीनाथ की कहानियां किसी टूरिस्ट का सफरनामा नहीं, बल्कि दैनिक जद्दोजहद में लगे किसान-मजदूरों के सुख-दुख से वाबस्ता मार्मिक आख्यान हैं। वे केवल गांव की गाथा नहीं लिखते, बल्कि अपनी गंवई आंखों से शहर के भी रंग-ढंग देखते और सिहरते हैं।

‘बीज-भोजी’ किसान आत्महत्या और अभाव से हो रही मौतों की दुखभरी गाथा है। यह मौत हमारी सभ्यता के मृत होने की घोषणा है। ‘पैमाइश’ कहानी एक तरफ गांव की पतनशीलता का आख्यान है तो दूसरी तरफ दुस्साहसी, स्वच्छंद तथा कर्मठ स्त्री ‘संन्यासिन’ के डायन में तब्दील होने का लोमहर्षक दस्तावेज भी। कोई प्रखर और परिश्रमी स्त्री क्यों गांव भर में डायन बताई जाने लगती है, इसके पीछे कौन-सा क्षुद्र स्वार्थ छिपा होता है इसे ‘पैमाइश’ पढ़ कर अच्छी तरह जाना जा सकता है।

बीज-भोजी: गौरीनाथ; अंतिका प्रकाशन, सी-56/ यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन-2, गाजियाबाद; 140 रुपए।

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लेडीज आयलैंड

प्रितपाल कौर ने अपने सशक्त कथा-लेखन से स्त्री-विमर्श को नए भावात्मक आयाम और नई अस्तित्व-चेतना दी है। उनकी कहानियां लिजलिजी भावुकता से पूरी तरह पाक हैं और उनकी भाषा एक ऐसे तेज चाकू की तरह रगों-रेशों को काटता-छीलता चला जाता है और इससे बहने वाला खून और होने वाली तकलीफ, आत्मबोध के नूर की तरह हमारे भाव-जगत को जगमगा देती है।
प्रितपाल कौर ने यों तो आदमी, उसके घर, घर के रिश्तों और उनके दरमियान संवाद की बहुत-सी संश्लिष्ट स्थितियों को गहराई से पकड़ा है, मगर उनकी स्त्री-विमर्श केंद्रित कहानियां औरत को, उसके औरत होने की कगारों पर पहुंचा कर जिस तरह तोड़ती हैं और इस शल्य-क्रिया से होने वाली रचनात्मक हिंसा से खून के जो धारे फूटते हैं वे अंतत: आत्मबोध के नूर की शक्ल ले लेते हैं।
प्रितपाल की कहानियां गहरी व्यंजनाओं, तकलीफ और उद्वेलन की कहानियां हैं। कहानियों के तेवर तीखे हैं और अपने समय और समाज को लगातार कठघरे में खड़ा करते हैं। प्रितपाल दुखसुखांतक तर्ज पर धीरे-धीरे अपनी चाल चलती हैं और विट को एक टूल की तरह इस्तेमाल करती हैं।

लेडीज आयलैंड: प्रितपाल कौर; भारत पुस्तक भंडार, दिल्ली; 250 रुपए।

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पांचवीं हिजरत

हुमैरा राहत की शायरी में मीरा, हब्बा खातून से लेकर परवीन शाकिर तक की काव्य परंपरा, जज्बाती गहराई और उनका अपना खास शेरी अंदाज परस्पर घुल कर यकदिल हो गए हैं। हुमैरा अकीदतपसंद (आस्थावान) शायरा हैं। मगर हुमैरा की अकीदत का रंग गैबी (परलोकवादी) नहीं है, बल्कि वो अकीदत के रास्ते जज्बाती, समाजी और बेहिस (जड़ीभूत) साइंसी दौड़ की चुनौतियों का सामना करना चाहती हैं। इस उधेड़-बुन में वे अकीदत को इश्क के तहय्युर (प्रेम-विस्मय) में घुला देती हैं।

किसी भी पायेदार शायर की तरह हुमैरा की शायरी उनके एहसासात का दस्तावेज है और इसके हर शेर में- हर मिसरे में जिंदगी बोलती है। वह शायर की जाती जिंदगी भी हो सकती है और हर खासो-आम की भी। ‘और यह वो जिंदगी भी हो सकती है, जिसे हम जी नहीं पाते, जो बिना आहट के हमारे करीब से गुजर जाती है और हम सोचते रह जाते हैं कि- जब आईना था, तब चेहरा नहीं था। है चेहरा तो आईना नहीं है।’ हुमैरा राहत के इस संग्रह में ‘तहय्युरे-इश्क’ की चुनी हुई गजलों और नज्मों के साथ-साथ एक दर्जन से ऊपर ऐसी नज्में भी शामिल हैं, जो एकदम ताजा हैं और अभी उनके किसी मज्मुए में शाया (प्रकाशित) नहीं हुई हैं।

पांचवीं हिजरत: हुमैरा राहत; राजपाल एंड सन्ज, 1590, मदरसा रोड, कश्मीरी गेट, दिल्ली; 165 रुपए।

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