पुस्तकायन : रेत पर हवा के हस्ताक्षर - Jansatta
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पुस्तकायन : रेत पर हवा के हस्ताक्षर

उर्दू के प्रख्यात अदीब और समीक्षक शम्सुर्रहमान फारुकी ने एक बार कहा था: ‘मेरे खयाल में नई शाइरी हर उस मौजूं कलाम को कहते हैं, जिसमें तात्कालिक प्रभाव से हट कर किसी बात को महसूस करने, सोचने और बयान करने का अंदाज नया हो,

Author नई दिल्ली | January 24, 2016 12:01 AM
और भी है नाम रस्ते का…: शीन काफ़ निज़ाम; वाणी प्रकाशन, 21 ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 395 रुपए।

उर्दू के प्रख्यात अदीब और समीक्षक शम्सुर्रहमान फारुकी ने एक बार कहा था: ‘मेरे खयाल में नई शाइरी हर उस मौजूं कलाम को कहते हैं, जिसमें तात्कालिक प्रभाव से हट कर किसी बात को महसूस करने, सोचने और बयान करने का अंदाज नया हो, यानी कोई कवि परंपरागत बंधनों से अलग रह कर अहसास, जज्बे या खयाल की अभिव्यक्ति में अपने व्यक्तित्व को प्रकट करता है, तो वह जदीद यानी आधुनिक शायर है, वरना पुराना।’

जब-जब शीन काफ़ निज़ाम की नज्मों, गजलों से गुजरने का मौका मिलता है, लगता है इस अलग हिस्से के शायर ने यकीनन परंपरागत बंधनों को तोड़ा है।
एक लंबी अवधि से शीन काफ़ निज़ाम का मैं प्रशंसक रहा हूं। मिलने से पहले अक्सर उनके अशआर जुबानी याद रहते थे और एक-दो मुलाकातों के बाद उनकी शख्सियत, सोच और संवेदनात्मक विकलता जेहन में कुनमुनाती रहती है।
हिंदी और उर्दू में एक समान लोकप्रियता का मुकाम हासिल करने वाले इस शायर की उपलब्धियों में अज्ञेय की यह बात भी शामिल थी: ‘इनके काव्य के प्रति आकृष्ट होने का एक कारण यह भी है कि इसमें ‘भावना और विचार का विलक्षण सामंजस्य है।’
मुक्तिबोध को लगा था: ‘ये नज्में ज्ञानात्मक संवेदन की प्रक्रिया से उपजती हैं और इस प्रक्रिया की चरम उपलब्धि ‘समुंदर’ शृंखला की नज्मों में नजर आती है, जहां समुंदर अस्तित्व मात्र, उसके लौकिक और लोकोत्तर आयामों और उनके बीच मानवीय उपस्थिति और उनसे रिश्ते का अहसास कराता है।’ कुछ समीक्षकों ने ‘निज़ाम’ की तुलना रिल्के और गैब्रेला मिस्राल से भी की है।
प्रस्तुत काव्य संग्रह और भी है नाम रस्ते का चार खंडों में वर्गीकृत है। ‘सम्त का सहरा’ खंड में ‘समुंदर एक’ से ‘समुंदर छह’ तक की कविताएं पाठक को बांधे रखने में सक्षम हैं।
‘समुंदर/ तुम किसे आवाज देते/ साहिलों की सम्त भागे जा रहे हो?’
दूसरा खंड ‘अक्स कितने पैकरों के’ की कविताएं दार्शनिकता के अनेक पृष्ठों को खंगालते हुए कहीं-कहीं ‘वेदांत’ के प्रभाव की झलक देती हैं।
‘सच बताओ/ जो किताबों में लिखा है…/ क्या तुम्हारा ही कहा है?’
‘पिघलती बर्फ/ खींचे जा रही/ सतरें…/ तुम्हारे आरिजों पर/ अक्स/ कितने पैकरों के।’
तीसरा खंड ‘वक्त जो खुद भी विआ है’ नंदकिशोर आचार्य को ‘मुंडकोपनिषद्’ के भोक्ता पक्षी के ही द्रष्टा हो जाने की तरह की अनुभूति देता है।
इसी क्रम में ‘अक्स अपने ख्वाब का’ खंड की कविताएं पाठक को एक ऐसे परिवेश में ले जाती हैं, जहां दृश्य-बिंबों के माध्यम से ‘निज़ाम’ अनेक काव्य-रहस्यों को उद्घाटित करते दिखते हैं।
कुल मिलाकर इसी संकलन की नज्मों से ‘रूबरू’ होता है, जिसकी शायरी में धार्मिक आस्थाओं के भेद मिट जाते हैं और संस्कृत, हिंदी, उर्दू आदि के अलावा अंतरराष्ट्रीय भाषाओं की ‘कविता परंपरा’ भी एक समन्वित रूप लेने लगती है।
काव्यगत भाषा में नंदकिशोर आचार्य ने इसी को ‘ब्रह्मानंद सहोदर’ का नाम दिया है। यह तथ्य कहीं-कहीं अश्वघोष द्वारा ‘काव्य’ को ‘मोक्षार्थगर्भा’ बताए जाने की ओर भी संकेत करता है।
गालिब, फिराक, ठाकुर और रिल्के को एक साथ महसूस करना हो तो शीन काफ़ निज़ाम की नज्मों और गजलों से गुजरना चाहिए। उनमें गालिब और टैगोर दोनों की ‘वुस्अत’ मिल जाएगी। हालांकि कवि अब भी उसी बयान पर कायम है: ‘मुद्दतों से/ देखता हूं/ वो जिसे/ लिक्खा हवा ने/ रेत पर।’
एक विशेष उल्लेखनीय बात शीन काफ़ निज़ाम की भाषा को लेकर है। भाषा में उर्दू-हिंदी शब्दों का सहज मिश्रण इस शायर को उस पाठक के लिए चहेता बना देता है, जिसने उर्दू शायरी को हिंदी के माध्यम से पढ़ा है।
उनकी दो कविताएं ‘कैवेंडर्स ईस्ट: एक’ और ‘कैवेंडर्स ईस्ट: दो’ इसी विलक्षणता की गवाही देती है। एक छटा देखें: ‘लॉन में दूब है/ दूब के पार/ गुलाब के पौधे/ पौधों की क्यारी के कोने पर/ मुआनके में मह्व/ नीम के तनावर दरख्तों पर/ बड़ा सा घोंसला है/ लैला की झुकी शाखों में/ बुलबुल का फंसा पर फड़फड़ाता है।’
निज़ाम कभी गालिब के झरोखे से झांकते हैं तो कभी रवींद्रनाथ के और कभी अख्तर उल ईमान के। उनके इसी संकलन की एक कविता है ‘गुड़िया’। इस कविता को पढ़ते ही बेसाख्ता अख्तर उल ईमान की नज्म ‘लड़का पूछता है’ याद आ जाती है। दोनों नज्मों का विषय कतई अलग है, मगर तेवर समानधर्मा है और सबसे खूबसूरत बात है निज़ाम का यह तेवर कहीं भी सायास नहीं दिखता।
‘वो लड़की अब खुदा जाने कहां हैं/ वो लड़की!/ जिसने अपनी/ नन्ही गुड़िया/ हाथ में देकर/ कहा था- मुझसे/ लो कुछ देर तुम इसको संभालो/ मैं जरा बाजार जाकर/ दूध, मक्खन और केले ले के आती हूं/ तुम्हारे वास्ते भी कुछ न कुछ/ मैं लेती आऊंगी।’
इसी ‘रौ’ में निज़ाम ‘दमिश्क’ से एक सवाल पूछते-पूछते कहने लगते हैं: ‘जैतून के जंगल से/ जख्मों की महक आए/ कुहसार के दामन से/ सिसकी की सदा आए।’
निज़ाम अपनी ऐसी अनूठी कविताओं के माध्यम से भौगोलिक लकीरें बड़ी सादगी और सहजता के साथ मिटा डालते हैं और तब ‘सारतत्त्व’ तक पहुंचते दिखाई देते हैं और इस ‘सारतत्त्व’ तक पहुंचने का उनका एकमात्र माध्यम ‘कविता’ है।
(चंद्र त्रिखा)
और भी है नाम रस्ते का…: शीन काफ़ निज़ाम; वाणी प्रकाशन, 21 ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 395 रुपए।
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छायावाद के कवि
प्रसाद, निराला और पंत के लिए आधुनिक ‘वृहत्त्रयी’ शब्द को अपने गुरु आचार्य नंददुलारे वाजपेयी से विजय बहादुर सिंह ने समीचीन अर्थों में ग्रहण करते हुए, इन तीन बड़े कवियों का तुलनात्मक विवेचन किया है। वह इनके अलग-अलग नाम न लेकर उन्हें ‘वृहत्त्रयी’ भी कहते हैं। तीनों की साहित्यिक जीवनी, विचारणा, दार्शनिकता और उनकी काव्य-विधाओं और काव्य-रूपों पर स्वतंत्र विचार करते हुए भी वह इन पक्षों में तुलनात्मक दृष्टि का आधार बनाए रखते हैं। अच्छी बात यह है कि वह इस प्रसंग में तुलनात्मक निर्णय और निर्णय की ओर संकेत भर करते हैं।

वह कवियों के व्यक्तित्व को मूल आधार मान कर काव्य-विकास को उसकी समग्रता में देखते हुए प्रवृत्तियों की ओर संकेत करते हैं। तीनों की प्रत्येक अवस्था की रचनाओं में भाव, शिल्पगत विकास और उत्कर्ष की खोज के साथ ही यहां अभिव्यंजना के सौंदर्य की चर्चा भी है। कवियों की विचार-प्रक्रिया, सांस्कृतिक दृष्टिकोण, काव्य-रूपों की विविधता, मूल संवेदना और प्रभाव सूत्रों को समझने की रचनात्मक कोशिश यहां अद्भुत है। यह ग्रंथ वृहत्त्रयी-काव्य के वैशिष्ट्य की भी तुलना पारस्परिकता में करता है और अतीत की आलोचना-धरोहर से आधार भी ग्रहण करता है। इसका सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसका अंतिम स्वरूप आचार्य नंददुलारे वाजपेयी ने निर्धारित किया। यही कारण है कि यह ग्रंथ हिंदी आलोचना के इतिहास में एक बहुमूल्य धरोहर है।

छायावाद के कवि-प्रसाद, निराला और पंत: विजय बहादुर सिंह; सामयिक बुक्स; 3320-21, जटवाड़ा, दरियागंज, नेताजी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली; 595 रुपए।
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आओ कोई ख्वाब बुनें
अरविंद कुमार की कविताएं बुद्धि विलास की कविताएं नहीं हैं और न ही वे महज नारेबाजी या विचारों की यांत्रिक सपाटबयानी हैं। उनमें अपनी बात को बिना लाग-लपेट के सामने रख देने की ईमानदार निर्भीकता है। वे अर्द्धसत्य लिख कर शेष सच को नजरअंदाज नहीं करते। वे असलियत को उसके वास्तविक स्वरूप में रखने के हक में खड़े दिखते हैं। वे प्रतिगामी ताकतों के खिलाफ खुद को अभिव्यक्त करते हुए शब्दों को चबाते नहीं, बल्कि उन पर पूरी शिद्दत के साथ प्रहार करते हैं और पढ़ने वालों की चेतना को झकझोर देते हैं।
अरविंद जीवन और समाज के खांटी सच और उसके अंतर्विरोधों को जस का तस व्यक्त करने का साहस रखते हैं। इसलिए वे अपनी बात को स्पष्टतया कहने के लिए कोई जटिल बिंब विधान नहीं गढ़ते, बल्कि सरल शब्दों, बिंबों और स्थितियों का सहारा लेते हैं। अरविंद की कविताओं में कोई जल्दबाजी नहीं है। उनमें उन्हें परम सत्य मानने की जल्दबाजी भी नहीं है। लेकिन उनकी कविताएं किसी भी बहस से बच निकलने या अवांतर प्रसंगों में भटका देने की सुविधा भी नहीं देतीं। अरविंद के स्वभाव के अनुरूप उनकी कविताओं में भी एक संवेदनशील खुलापन है। उन्हीं की तरह उनकी कविताओं में भी व्यवहारगत सौम्यता और सज्जनता मौजूद है।

आओ कोई ख्वाब बुनें: अरविंद कुमार; शब्दारंभ प्रकाशन, एफ-89, पांचवां तल, गली नं.-3, पश्चिमी विनोद नगर, दिल्ली; 100 रुपए।
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टेलीकॉलर महिलाएं
इस पुस्तक के विभिन्न अध्यायों में कॉल सेंटरों से संबंधित समाजशास्त्रीय, मनोवैज्ञानिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संदर्भों को ध्यान में रखते हुए अनुभवात्मक एवं व्यावहारिक यथार्थ से संबद्ध निष्कर्षों को प्रस्तुत किया गया है।
यह ग्रंथ कॉल सेंटरों पर किए गए उच्चस्तरीय अनुसंधान के तथ्यों से समायोजित है। यह दिल्ली के लगभग तीस कॉल सेंटरों में कार्यरत महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक समायोजन मूलक पक्षों और तथ्यजनित कॉल सेंटरों की मनोभावनाओं, प्रेरणाओं, अभीप्साओं का एक संश्लिष्ट समाजशास्त्रीय विश्लेषण है।
इसमें समकालीन समाजशास्त्रीय साहित्य में विश्व स्तर पर सुलभ कॉल सेंटरों की ऐतिहासिकता, प्रकार, प्रकृति और वर्तमान वस्तुस्थिति का सविस्तार विवेचन किया गया है, जो कॉल सेंटरों से संबद्ध महिलाओं, उच्च शैक्षिक अनुसंधान से संबद्ध समाज वैज्ञानिकों और समाजशास्त्र में रुचि रखने वाले अनुसंधानकर्ताओं के लिए प्रेरणा सिद्ध हो सकती है।

टेलीकॉलर महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक दशाएं: विकास शारदे; ज्ञान पब्लिशिंग हाउस, ज्ञानकुंज, 23, मेन अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 480 रुपए।

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