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पुस्तकायन : भारतीय कविता का सौंदर्य

कृष्णदत्त पालीवाल इस पुस्तक में भारतीय राष्ट्रवाद और देशभक्ति को हिंदू, जैन, बौद्ध, सूफी, मुसलिम, सिख, ईसाई सबकी साझी सांस्कृतिक विरासत मानते हैं।

Author नई दिल्ली | Published on: March 26, 2016 11:17 PM
आधुनिक भारतीय नई कविता: कृष्णदत्त पालीवाल; किताबघर प्रकाशन, 4855-56/24, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 490 रुपए। (राजकुमार)

कृष्णदत्त पालीवाल की पुस्तक आधुनिक भारतीय नई कविता दो खंडों में विभाजित है। पहले खंड में चार निबंधों का समुच्चय है, जिसमें ‘आधुनिक भारतीय साहित्य: देश और काल’, ‘भारतीय राष्ट्रीय सांस्कृतिक कविता’, ‘भारतीय काव्य में स्वच्छंदतावाद’ और ‘आधुनिक भारतीय नई कविता’ है। इस खंड में आधुनिक भारतीय साहित्य की सैद्धांतिकी, वैचारिकी, पश्चिमी प्रभावान्विति और उसकी टकराहट, प्राचीन भारतीय साहित्य के साथ अटूट रिश्तेदारी, साझेदारी, परंपरा के साथ संगति-विसंगति और उन ऐतिहासिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, राष्ट्रीय प्रश्नों, बेचैनियों, चुनौतियों और दृष्टियों से रूबरू होते हैं, जिसका तार्किक, वैज्ञानिक, बौद्धिक अध्ययन करने की कोशिश हुई है। दूसरे खंड में भारतीय भाषाओं के सात महत्त्वपूर्ण कवियों-लेखकों (माइकेल मधुसूदन दत्त, सुब्रह्मण्य भारती, कुमार आशान, वल्लतोल नारायण मेनन, काजी नजरुल इस्लाम, मैथिलीशरण गुप्त और अज्ञेय) का व्यावहारिक आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है।

कृष्णदत्त पालीवाल इस पुस्तक में भारतीय राष्ट्रवाद और देशभक्ति को हिंदू, जैन, बौद्ध, सूफी, मुसलिम, सिख, ईसाई सबकी साझी सांस्कृतिक विरासत मानते हैं। हमारी भारतीय परंपरा और आधुनिकता न सिर्फ पूरब-पश्चिम के टकराव से पनपी है, बल्कि समूची भारतीय चेतना के बौद्धिक अवगाहन से संभव हुई है। यह कई संस्कृतियों, भाषाओं, क्षेत्रीय सामाजिक भावनाओं, धार्मिक-नैतिक संवेदनाओं और मूल्यों से विनिर्मित है। वे आधुनिक भारतीय साहित्य का मूल्यांकन करते हुए रामविलास शर्मा के पास से गुजरते हैं। रामविलास शर्मा ने जिस नवजागरण, लोकजागरण की अवधारणाओं को हिंदी आलोचना की सैद्धांतिकी बनाया था, पालीवालजी उसी को इस्तेमाल करते हुए मानते हैं कि उन्हीं नवजागरण के स्रोतों की शक्ति से आधुनिक भारतीय साहित्य प्रस्फुटित और विकसित हुई है।

बेहतर होता रामविलास शर्मा की पदावली और सैद्धांतिक दृष्टि का इस्तेमाल करते हुए पालीवालजी उनके नाम का उल्लेख करते। छायावाद और स्वच्छंदतावाद के मूल्यांकन दृष्टि के लिए भी वे काफी हद तक नंददुलारे वाजपेयी, नगेंद्र, नामवर सिंह के ऋणी हैं। लेकिन आश्चर्य कि वे बिना नामोल्लेख के लिखते चले जाते हैं। लेकिन ऐसा करते हुए पालीवालजी रामचंद्र शुक्ल, हजारीप्रसाद द्विवेदी, नंददुलारे वाजपेयी, नगेंद्र, रामविलास शर्मा, नामवर सिंह आदि को बड़े फलक पर फैलाने का काम करते हैं। यही पुस्तक की मूल विशेषता है। दूसरी विशेषता यह है कि हिंदी के इन महत्त्वपूर्ण आलोचकों ने अपना दायरा हिंदी साहित्य तक ही सीमित रखा था, पालीवालजी ने समूचे भारतीय साहित्य के भीतर झांकने और उसकी प्रवृत्तियों, विशेषताओं को अखंडता और एकता के सूत्र में पकड़ने की कोशिश करते हैं।

पहले निबंध में ही पालीवालजी इस निष्कर्ष की तरफ आगे बढ़ते दिखते हैं कि आधुनिक भारतीय कविता की मूल चेतना देशभक्ति और राष्ट्रीयता है, जिसे हासिल करने के लिए भारतीय मेधा और मनीषा ने उपनिवेशवाद और पूंजीवाद, सामाजिक-सांस्कृतिक-धार्मिक रूढ़ियों से संघर्ष कर हासिल किया। अनेक विचारधाराओं, आंदोलनों, क्रांतियों, अन्वेषणों के कथ्य से ‘आधुनिक चेतना संपन्न तार्किक वैज्ञानिक संवेदनशील मनुष्य’ को जन्म दिया। यही मनुष्य आधुनिक भारत की गत्यात्मक तस्वीर गढ़ता है। लेकिन तब सवाल उठता है कि हम जिन राजनीतिक गतिरोधों और राष्ट्रीय प्रश्नों का सामना आज कर रहे हैं, क्या आज अचानक उभर आया है या हमारे मूल्यांकन दृष्टि की सीमाएं हैं?

पालीवालजी आधुनिक भारतीय साहित्य के देश-काल को चार चरणों में बांटते हैं और शुरू में ही स्पष्ट करते हैं कि नवजागरण को समझने की दो दृष्टियां रही हैं- उपनिवेशवादी और राष्ट्रवादी। पहले वर्ग का मानना है कि यह अंगरेजों और पश्चिम की देन है, जबकि दूसरे वर्ग का मानना है कि यह भारतीय परंपरा की उज्ज्वल देन है जो उपनिवेशवाद, पूंजीवाद, सामंतवाद के विरोध में पनपा। इस चेतना को फैलाने में भारतीय समाज सुधारकों, राजनीतिज्ञों, संगठनों, लेखकों, पत्रकारों, पत्र-पत्रिकाओं का विस्तार से उल्लेख करते हैं। विश्व मेधा और उनकी वैज्ञानिक, तार्किक, वैचारिक उपलब्धियों की भी चर्चा करते हैं, जिससे भारतीय एकता, बंधुत्व, मानवता और समानता के विचार को बल मिला। भारत किस प्रकार अपनी अस्मिता, आत्मगौरव, आत्मसम्मान और आजादी के लिए संघर्ष करता है इसका साहित्यिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक लेखा-जोखा मौजूद है। गांधी के सामाजिक-राजनीतिक उपस्थिति का भारतीय भाषाओं के साहित्य पर कितना गहरा असर रहा है, इसका उल्लेख विस्तार से है। वे टैगोर की विराट उपस्थिति और भारतीय गौरव का हवाला देते हैं।

चौथे चरण के दौरान समीक्षक यह बताना नहीं भूलता की नेहरू की भूलें और जेपी, लोहिया, नरेंद्रदेव के विचारों की उपेक्षा के कारण क्षेत्रीयता, जातिवाद, धार्मिक-सांप्रदायिकता, भाई-भतीजावाद, पूंजीवाद पनपा। पालीवालजी का यह मूल्यांकन चीजों को जटिलता में देखने के बजाय सामान्यीकरण करता चलता है।

भारतीय राष्ट्रीय सांस्कृतिक कविता, भारतीय काव्य में स्वछंदतावाद और आधुनिक भारतीय नई कविता की मूल प्रवृतियों, लेखकों, पत्र-पत्रिकाओं का सम्यक मूल्यांकन करते हैं। दूसरे खंड में वे माइकल मधुसूदन दत्त का मूल्यांकन करते हुए इस बात का उल्लेख करते हैं कि वे पहले आधुनिक लेखक हैं, जिन्होंने परंपरा के अस्वीकार, असहमति से अपनी सृजनात्मकता को जन्म दिया और साहित्य की दिशा मोड़ दी। ‘मेघनाद वध’ को सृजनात्मक विस्फोट, दृष्टि विभेद की संज्ञा देते हुए मुक्त छंद की मौलिकता की चर्चा करते हैं।

सुब्रह्मण्य भारती को भारतीय सांस्कृतिक नवजागरण और स्वाधीनता आंदोलन की लय का प्रकाशपुंज और शक्ति मानते हैं। उनकी कविता देशभक्ति का पर्याय है। गुलामी की दास्तां और दर्द के अनुगूंजें उनके यहां मौजूद हैं। उनकी कविताओं में ध्वन्यर्थ व्यंजनापरक और बहुलार्थक हैं। कुमार आशान की कविताओं में मानव प्रेम, प्रकृति प्रेम और प्रेम के अनंत रूपों की सौंदर्यमयी छटा है। वल्लतोल की देसी सर्जनात्मकता को औपनिवेशिक प्रदूषण से अक्षुण्ण होने और सामाजिक विषमता में धंसे-फंसे होने का भी विवेचन-विश्लेषण है। इसी क्रम में वे नजरुल, मैथिलीशरण गुप्त और अज्ञेय का सम्यक विवेचन करते हैं। आधुनिक भारतीय साहित्य का इतना विशद, सौंदर्यपरक मूल्यांकन हिंदी साहित्य को भी समृद्ध करने वाला है।

आधुनिक भारतीय नई कविता: कृष्णदत्त पालीवाल; किताबघर प्रकाशन, 4855-56/24, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 490 रुपए। (राजकुमार)

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मैं जरा जल्दी में हूं

कविता, दर्शन और विवेचन निर्मल गुप्त के स्वभाव में शामिल हैं। वे इस अर्थ में बेहद मौलिक हैं कि किसी प्रायोजित पुस्तक या विचार से प्रभावित नहीं होते। कबीर की तरह जो देखते हैं, उसमें अपनी तरह से हस्तक्षेप करते हैं। यह बताना जरूरी नहीं कि ‘देखना’ ही किसी रचनाकार को विशेष बनाता है। निर्मल के लिए देखना ही पढ़ना है। उनका यह कविता संग्रह ‘मैं जरा जल्दी में हूं’ एक लंबे समय में लिखी गई रचनाओं का एकत्र वैभव है। शीर्षक के विपरीत निर्मल पर्याप्त धैर्य, प्रतीक्षा और अनुशासन के साथ कविताओं को व्यक्त कर सके हैं।

वे उन निरीह भावों और नागरिकों के कवि हैं, जिनके पास ‘… न तो कर्ण जैसे कवच कुंडल थे/ न इच्छा मृत्यु का वरदान/ न सुदर्शन चक्र, न कुटिलता का कौशल।’ निर्मल की विशेषता है कि वे किसी घटना, प्रवृत्ति, अनुभूति पर लिखते हुए उसमें समाए समय का अतिक्रमण करते हैं। उनकी संवेदना मानवीय नियति को लक्ष्य बनाती है। ‘सुबह ऐसे आती है’ कविता इन शब्दों में चरम पर पहुंचती है- ‘सुबह उनके लिए बेगाना आती है/ जिनके पास करने के लिए/ कोई प्रार्थना भी नहीं है।’ निर्मल ने यात्राओं को एक बड़े रूपक में तब्दील किया है। रेल, यात्रा, भीड़, प्लेटफार्म उनके यहां अन्यार्थ हैं। ऐसी कविताएं लिखने वाले वे एक खास कवि हैं।
मैं जरा जल्दी में हूं: निर्मल गुप्त; अयन प्रकाशन, 1/20, महरौली, नई दिल्ली; 300 रुपए।

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मेरे गीत तुम्हारे

साहिर एक ऐसे गीतकार, शायर थे, जिन्होंने अपनी रचनाओं के सहारे एक नई किस्म की सामाजिक सक्रियता को जन्म दिया। अपनी रचनाओं में वे एक ऐसे दार्शनिक, भविष्यद्रष्टा के रूप में नजर आते हैं, जिसने हर इंसान के प्रति अपने प्रेम को महसूस किया और समाज के दबे-कुचले वर्ग को आवाज दी। उन्होंने अपने गीतों की मार्फत न सिर्फ सामाजिक बुराइयों पर कुठाराघात किया, बल्कि मौजूदा सामाजिक परिस्थितियों, मुल्क के हालात और उसके भविष्य की रूपरेखा, धार्मिक सौहार्द, स्त्रियों की स्थिति, वक्त की ताकत, प्रेम की अवधारणा जैसे कई जटिल विषयों पर अपने विचार रखे। साहिर के अलावा शायद ही किसी गीतकार का कैनवास इतना विशाल रहा हो। अपनी बात कहने के लिए साहिर ने कई बार पूरे का पूरा गीत इस्तेमाल किया तो कई बार बीच के या आखिरी हिस्से से काम चलाया। अधिकतर मामलों में साहिर हमें बाद के इन्हीं हिस्सों में मौजूद दिखते हैं। साहिर को समझने के लिए इन हिस्सों को भी जानना जरूरी है। यह पुस्तक साहिर द्वारा फिल्मी माध्यम के इस्तेमाल और इन विषयों पर उनके विचारों को समझने की दिशा में एक बेहतर प्रयास है।
साहिर लुधियानवी- मेरे गीत तुम्हारे: सुनील भट्ट; स्टार पब्लिकेशन्स प्रा.लि., 4/5 बी, आसफ अली रोड, नई दिल्ली; 195 रुपए।

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पाठ के विविध आयाम

यह पुस्तक कथा साहित्य पर केंद्रित है। इसमें कुल चार खंड हैं। पहला खंड दलित लेखन से संबंधित है। दलित लेखन में आत्मकथाओं का विशेष महत्त्व है। दलित जीवन की त्रासदी को जिस गहराई से दलित आत्मकथाओं ने प्रस्तुत किया, वह पहले कभी संभव नहीं हो पाया था। दूसरे खंड में प्रेमचंद पूर्व से लेकर समकालीन उपन्यासों में स्त्री की स्थिति का चित्रण है। प्रेमचंद पूर्व से लेकर समकालीन समय तक पुरुष रचनाकार ने स्त्री के मुद्दों पर गंभीरतापूर्वक लिखा है। इसमें क्रांतिकारी परिवर्तन तब हुआ जब स्त्रियों ने अपनी दुनिया का सच खुद लिखना शुरू किया। तीसरे खंड में शामिल कथा साहित्य पर टिप्पणियां आज की कथा आलोचना को बड़ी शिद्दत से प्रस्तुत करती हैं। चौथे खंड में शिवानी पर केंद्रित शोध आलेख है। शिवानी के योगदान को आज भी गंभीरतापूर्वक समझने की जरूरत है।
हिंदी कथा साहित्य- पाठ के विविध आयाम: राजेश राव; स्वराज प्रकाशन, 4648/1, 21, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 350 रुपए।

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