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तीरंदाज: एक अप्राप्य पोथी

वास्तव में यह पाठ्य पुस्तक विद्यार्थी को सनातन परिकल्पना की प्रारंभिक, पर जरूरी जानकारी देती है। यह सिर्फ विद्यार्थियों के लिए नहीं, बल्कि आम लोगों के लिए भी बेहद लाभकारी हो सकती है। परंतु यह पुस्तक भारत में आसानी से उपलब्ध नहीं है।

poojaसनातन संस्‍कृति में पूजा-अर्चना। फाइल फोटो।

सेंट्रल हिंदू कॉलेज, बनारस, के संचालक मंडल ने 1916 में प्रख्यात विद्वानों के परामर्श और सहयोग से अंग्रेजी में एक पाठ्य पुस्तक का प्रकाशन किया था, जिसका शीर्षक था ‘सनातन धर्म- ऐन एलीमेंट्री टेक्स्ट बुक आफ हिंदू रिलीजन एंड एथिक्स’। यह पुस्तक आठवीं कक्षा से हाईस्कूल तक के छात्रों के लिए विशेष प्रकार से लिखी गई थी, जिससे ‘नई पीढ़ी राष्ट्रीय धर्म के बारे में सामान्य परंतु सटीक जानकारी पा सके और उसके प्रति अपनी अवधारणा बना सके।’

यह एक अनूठा प्रयास था, क्योंकि इससे पहले किसी भी हिंदू शिक्षण संस्था ने अपने छात्रों के लिए ऐसी विशिष्ट सामग्री का संकलन नहीं किया था। इसका प्रकाशन शायद उस चिंता की तरफ भी इशारा करता है, जो कि बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में हिंदू मानस को आंदोलित किए हुई थी। दूसरे शब्दों में, हिंदू कॉलेज का संचालक मंडल नई पीढ़ी में हिंदू धर्म के प्रति आस्था को लेकर चिंतित था और वह चाहता था कि पाठ्यक्रम में धर्म संबधी मूलभूत मूल्यों का समावेश अगर कर दिया जाए तो नौजवानों का अपने धर्म के प्रति अनुराग बढ़ जाएगा।

पाठ्य पुस्तक की प्रस्तावना में किताब का उद्देश्य बताते हुए कहा गया है कि सेंट्रल हिंदू कॉलेज का लक्ष्य हिंदू धर्म और नीतिशास्त्र को पाश्चात्य शिक्षा प्रलाणी, जो कि समय की मांग है, से जोड़ना है। हिंदू धर्म शिक्षा पुराणखंडी नहीं होगी, बल्कि उदारवादी और गैर-सांप्रदायिक होगी, जो कि अपने पूर्ण विस्तार में दी जाएगी। यह भेदभाव तो नहीं बरतेगी, पर निश्चित और विशिष्ट रूप से हिंदू होगी। यह विभिन्न प्रकार के हिंदू विचारों को एक तरफ तो पूर्णत: एकीकृत करेगी, पर दूसरी ओर गैर-हिंदू विचारों का समावेश नहीं करेगी।

संचालक मंडल आगे लिखता है कि वे विचारधाराएं परंपरागत हिंदू विचारों से विवाद में हैं, उन्हें इस पथ्य पुस्तक में शामिल नहीं किया जाएगा। साथ ही पुस्तक उन मुद्दों को नहीं उठाएगी, जो समकालीन सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों से जुड़े हुए हैं। पुस्तक का उद्देश्य, प्रस्तावना में स्पष्ट किया गया है, छात्रों में हिंदू धर्म और आचार की मजबूत नीव रखना है, जिस पर नई पीढ़ी अपनी विशिष्ट सैद्धांतिक सोच और स्वभाव बना सके।

संचालकों का मानना था कि सनातन धर्म की पाठ्य पुस्तक छात्रों के चरित्र निर्माण के लिए जरूरी है। इससे वे धार्मिक, कर्तव्यनिष्ठ, ढृढ़, आत्मनिर्भर, सच्चे, नेक, सौम्य, सुसंतुलित व्यक्ति और नागरिक बन पाएंगे। मंडल लिखता है कि जो विचार हिंदुओं को श्रद्धा और विश्वास के एक सूत्र में बांधते हैं, उनको छात्रों को स्पष्ट और सरल तरीके से पढ़ाया जाना चाहिए। पर ऐसा करते समय यह ध्यान में रखना चाहिए कि दूसरे प्रकार के विचार, चाहे वे हिंदू हों या गैर-हिंदू, के प्रति सहनशीलता उनके मानस में पूरी तरह से स्थापित हो सके।

उनके अनुसार सनातनी पाठ्यक्रम इस प्रकार का होना चाहिए, जो सभी प्रकार के हिंदुओं को स्वीकार हो। उसमें ऐसी सामग्री हो, जो हिंदू अचार, विचार और धर्म विवेचना के जरिए सनातन धर्म की विशिष्टता चिह्नित कर सके, पर किसी एक विशेष हिंदू विचार अथवा संप्रदाय को अत्यधिक महत्ता नहीं मिलनी चाहिए।

संयोजक मंडल लिखता है- ‘इस (पाठ्य पुस्तक) शृंखला का नाम सनातन धर्म संपूर्ण विमर्श के बाद चुना गया है, क्योंकि यह उन आधारभूत और मौलिक विचारों का प्रतिनिधित्व करता है, जो अडिग सत्य है। भारत के कुछ हिस्सों में यह नाम सांप्रदायिकता से जरूर जुड़ गया है, पर यहां पर उसका उपयोग अनंतधर्म के रूप में किया गया है।’ किताब का उद्देश्य धार्मिक और निष्ठावान व्यक्ति बनने के लिए प्रेरित करना है, जिससे कि वे आगे चल कर अपनी मातृभूमि और ब्रिटिश साम्राज्य के सार्थक नागरिक बन पाएं।

प्रस्तावना से ही साफ है कि धर्म रक्षा इस पूरी मुहिम का एकमात्र उदेश्य था। अपने में यह पाठ्य पुस्तिका जानकारी से पूर्ण है और सरल तरीके से सनातन धर्म की व्याख्या करती है। वेद, पुराण, उपनिषद, मनुस्मृति, महाभारत और रामायण से इसमें प्रचुर मात्रा में श्लोक और नीति संबंधी प्रकरण लिए गए हैं। पुस्तक तीन भागों में विभाजित है। पहला भाग बेसिक हिंदू रिलीजियस आइडियाज है, जिसमें एक ब्रह्म की संकल्पना से लेकर पुनर्जन्म, कर्म, यज्ञ आदि को सलीके से समझाया गया है।

दूसरे भाग में जनरल हिंदू रिलीजियस कस्टम्स एंड राइट्स है, जिसमें संस्कार, श्राद्ध, शौचम, यज्ञ, उपासना, चार आश्रम और चार वर्णों के बारे में बताया गया है। तीसरे भाग में एथिकल टीचिंग है, यानी नीति उपदेश। इसमें नीतिविज्ञान को परिभाषित करते हुए उसके विभिन्न प्रकार बताए गए हैं। बहुत ही सरल तरीके से यह बताया गया है कि सत्य और असत्य, उचित और अनुचित में फर्क क्या है और हमारा पारंपरिक ज्ञान इनमें भेद कैसे करता आया है। गुण और अवगुण पर भी चर्चा की गई है और साथ में यह भी बताया गया है कि अपने से ऊपर, अपने साथ और नीचे वाले से व्यवहार कैसे करना चाहिए।

वास्तव में यह पाठ्य पुस्तक विद्यार्थी को सनातन परिकल्पना की प्रारंभिक, पर जरूरी जानकारी देती है। यह सिर्फ विद्यार्थियों के लिए नहीं, बल्कि आम लोगों के लिए भी बेहद लाभकारी हो सकती है। परंतु यह पुस्तक भारत में आसानी से उपलब्ध नहीं है। विदेशों में कुछ पुस्तकालयों में है और डिजिटल कॉपी को पढ़ा जा सकता है। मुझे यह यूनिवर्सिटी आफ कैलिफोर्निया, लॉसएंजेलिस के डिजिटल आर्काइव में मिली थी।

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