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दूसरी नजरः बेसिक आय का गुब्बारा

यह बजट सीजन है। अच्छे, खराब और भोंडे (विचार), सब हाजिर होंगे। एक परिकल्पना, जो अभी कयासबाजी के दायरे में है, ‘यूनिवर्सल बेसिक इनकम’ (यूबीआई) यानी सार्वभौम बेसिक आय की है।

Author Updated: January 22, 2017 3:36 AM
सिंगापुर सरकार ने सरप्‍लस बजट पेश करते हुए नागरिकों को बोनस देने की घोषणा की है। (Express File Pic)

यह बजट सीजन है। अच्छे, खराब और भोंडे (विचार), सब हाजिर होंगे। एक परिकल्पना, जो अभी कयासबाजी के दायरे में है, ‘यूनिवर्सल बेसिक इनकम’ (यूबीआई) यानी सार्वभौम बेसिक आय की है। मुख्य आर्थिक सलाहकार ने वादा किया है कि इसके बारे में आर्थिक सर्वेक्षण में एक विस्तृत विश्लेषण होगा, जो कि बजट से एक रोज पहले संसद में पेश किया जाएगा। अलबत्ता सरकार ने इस बारे में अभी तक कुछ नहीं कहा है। मुखर रहने वाले मंत्रीगण भी इस मामले में सोची-समझी चुप्पी साधे हुए हैं। यूबीआई कोई नई परिकल्पना नहीं है। जिन देशों में व्यापक सामाजिक सुरक्षा योजना है, वे सामाजिक सुरक्षा के लाभार्थियों (अति गरीबों, बेरोजगारों, दिव्यांगों, वृद्धों) को नगद सहायता के साथ-साथ खाद्य कूपन भी मुहैया कराते हैं। भारत में कोई वैसी सामाजिक सुरक्षा योजना नहीं है। हमारे यहां यूबीआई से साम्य रखने वाली योजना मनरेगा है। मनरेगा मांगने पर काम की गारंटी देती है और कृषि मजदूर को मिलने वाली दैनिक मजदूरी के हिसाब से भुगतान करती है। अगर मनरेगा पूरी तरह से लागू की जाए, तो यह साल में सौ दिन का काम मुहैया कराएगी और मौजूदा अधिसूचित दर पर मजदूरी का भुगतान करेगी, जो कि अभी 195 रु. रोजाना है। इस तरह, मनरेगा के तहत काम करके कोई साल में 19,500 रु. पा सकता है। यह राशि उस व्यक्ति की दूसरी आय की कमी पूरी करेगी।
गरीबी निवारक
यूबीआई के तहत सरकार हर व्यक्ति को एक निश्चित राशि देगी, जिससे उसकी आय में रही कसर दूर होगी और उसकी आय एक न्यूनतम स्तर तक पहुंच जाएगी। बहुतेरे देशों में यूबीआई लागू नहीं है। स्विट्जरलैंड, जिसकी प्रतिव्यक्ति आय 79,578 डॉलर है, हाल में हुए जनमत संग्रह में यूबीआई के प्रस्ताव को ठुकरा चुका है। फिनलैंड, जहां प्रतिव्यक्ति आमदनी 45,133 डॉलर है, उसने यूबीआई को ‘पायलट प्रोजेक्ट’ के तौर पर शुरू करने की घोषणा की है, जिसके तहत बहुत थोड़े-से लोगों को हर महीने 595 डॉलर के बराबर राशि दी जाएगी। स्विट्जरलैंड और फिनलैंड दुनिया के सबसे धनी देशों में हैं।
हम मान ले सकते हैं कि यूबीआई का मकसद गरीबी से निपटना है। इसके पीछे विचार यह है कि सरकार की तरफ से एक नियत राशि दिए जाने से गरीब और गरीबी के कगार पर खड़े लोग उपभोग के एक निश्चित स्तर को प्राप्त कर सकेंगे और इस तरह अपनी आर्थिक दशा सुधारने में सक्षम होंगे। न्याय के सिद्धांत से, यह खयाल बहुत अच्छा है और मैं इसकी हिमायत करता हूं।
अलबत्ता मेरा दृढ़ विश्वास है और उसे मैं यहां दोहराना चाहता हूं कि गरीबी निवारण कासबसे अच्छा उपाय आर्थिक वृद्धि है। वर्ष 1991 से ऊंची वृद्धि दर के कारण देश की आबादी में गरीबों का अनुपात घट कर आधा हो गया और गरीबों की संख्या में लगभग एक तिहाई की कमी आई है। वर्ष 2004 से 2014 के दरम्यान (यूपीए का कार्यकाल) चौदह करोड़ लोग गरीबी से बाहर आ गए। ऊंची आर्थिक वृद्धि के वर्षों में कर-राजस्व में बढ़ोतरी के चलते कल्याणकारी योजनाएं भी अधिक व्यावहारिक साबित हुर्इं।
खाका क्या है
यूबीआई की परिकल्पना को लेकर एक दूसरे से जुड़े हुए कई सवाल उठते हैं:
* क्या यूबीआई दूसरी योजनाओं को विदा कर देगी, जिनमें सबसिडी को धीरे-धीरे नगद-सबसिडी में बदला जा रहा है?
* क्या सुझाई जा रही योजना सार्वभौमिक होगी, जैसा कि उसके नाम से जाहिर है, या एक लक्षित आबादी के लिए होगी?
* क्या योजना के तहत जो लाभ दिया जाएगा वह बिना शर्त होगा, या शर्तें लगाई जाएंगी?
* आय के किस स्तर को ‘बेसिक आय’ माना जाएगा?
* योजना के लिए संसाधन किस तरह जुटाए जाएंगे?
सबसे चुनौती-भरे सवाल हैं कि आय के किस स्तर को बेसिक आय माना जाएगा, ताकि आदमी अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा कर सके? और, यूबीआई की लागत क्या बैठेगी? मान लें कि हम गरीबी रेखा का पैमाना लेते हैं, जो कि औसतन चालीस रुपए रोजाना है (ग्रामीण क्षेत्रों में बत्तीस रुपए और शहरी क्षेत्रों में सैंतालीस रुपए)। हर व्यक्ति को लगभग चौदह हजार रुपए सालाना या बारह सौ रुपए प्रतिमाह की गारंटी होनी चाहिए। यह हल्की और तर्कसंगत राशि है। सोचें कि पच्चीस फीसद आबादी (33 करोड़) को सालाना चौदह हजार रु. और अन्य पच्चीस फीसद आबादी को सालाना सात हजार रुपए देने की जरूरत पड़ेगी, और बाकी आबादी को कुछ भी देने की जरूरत नहीं होगी। ऐसे में योजना की लागत आएगी प्रतिवर्ष 693,000 करोड़ रु., जो कि 2016-17 में सरकार के व्यय-बजट के पैंतीस फीसद के बराबर राशि होगी। जाहिर है, यह सरकार की मौजूदा क्षमता से परे है। अगर हम यूबीआई पर आने वाली लागत आधी कर दें, या लाभार्थियों की संख्या को आधा घटा दें, तब भी 346,500 करोड़ प्रतिवर्ष की लागत आएगी।
संसाधन का सवाल
मान लें कि संसाधन जुटाने के लिए हम गैर-गरीबों को दी जाने वाली मौजूदा सबसिडी समाप्त कर दें। आर्थिक सर्वे, 2015-16 के मुताबिक लगभग 100,000 करोड़ की सबसिडी गैर-गरीबों को दी जा रही थी। अगर हम इस सबसिडी को समाप्त कर दें, तो वह यूबीआई का खर्च निकालने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। क्या और भी वित्तीय गुंजाइश निकाली जा सकती है? इस संदर्भ में कर-रियायतों की बात होती है। अगर आप सतह के नीचे देखें, तो इन्हें खत्म करना बहुत मुश्किल है। बहुत-सी कर-रियायतें नीतिगत लक्ष्यों को हासिल करने के लिए दी जा रही हैं और उन्हें वापस लेने का मतलब होगा उन नीतिगत लक्ष्यों को छोड़ देना, जैसे विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज), त्वरित मूल्यह्रास, विशेष इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश, आदि। हम यह नहीं कह सकते कि यूबीआई का खर्च उठाने के लिए उन सब को तज देना अर्थव्यवस्था के लिए या लोगों के लिए बेहतर होगा।
ऐसा लगता है कि बिना पर्याप्त विचार या चर्चा किए यूबीआई का शोशा छोड़ दिया गया है। कहा जा रहा है कि नोटबंदी से पैदा हुई तकलीफों से राहत दिलाने के लिए यूबीआई बहुत जरूरी है।
अगर यूबीआई का खाका खूब सोच-समझ कर नहीं बनाया गया और अगर उसके लिए व्यावहारिक वित्तीय आधार तैयार नहीं किया गया, तो वह एक और फील-गुड जुमला ही साबित होगा, जो कि गरीबी दूर करने में भले कोई खास मददगार न साबित हो, पर राजकोषीय स्थिति डांवांडोल हो जा सकती है। विडंबना है कि यह परिकल्पना, अगर स्वीकार कर ली जाती है, तो ऐसी पार्टी-सरकार के द्वारा लागू की जाएगी, जो विकास तथा रोजगार के वादे पर सत्ता में आई है। लगता है इसने उस एजेंडे को ताक पर रख दिया है।

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