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रम्य रचना : बिकवैया के सामने रामरमैया धूल

मित्र मेरे साथ बहुत देर से लगे थे। वे एक ऐसी कंपनी में कुछ करते थे, जो बहुत कुछ करती थी। वह चीजें बेचती थी। चीजों को बेचने के लिए उसने बहुत सारे दिमाग खरीद रखे थे।

मित्र मेरे साथ बहुत देर से लगे थे। वे एक ऐसी कंपनी में कुछ करते थे, जो बहुत कुछ करती थी। वह चीजें बेचती थी। चीजों को बेचने के लिए उसने बहुत सारे दिमाग खरीद रखे थे। एक दिमाग मेरे मित्र भी थे। अब मित्र पर जिम्मेदारी डाली गई थी कि वे कुछ और दिमाग भर्ती करें। इसी पर राजी करने करने की कोशिश में वे लगे थे। जब बातचीत शुरू हुई तो मैं जाने क्यों हंसने लगा। वे किसी चाकू की तरह ठंडे रहे। बोले, स्वामी विवेकानंद ने कहा है। इसके बाद उन्होंने कुछ वाक्य सुनाए। इसके बाद मित्र की मुद्रा संत सरीखी हो गई। वे बोले, अभी तुम हंस रहे हो। मेरी बात न मानी तो रोओगे। हंसने रोने के बीच खड़े होकर मैंने जानना चाहा कि तुमको यह करने का आदेश किसने दिया।

मित्र ने ऊपर की ओर अंगुली उठाई कि ऊपर से आदेश आया है। नई व्यवस्था कितनी अच्छी है कि इसमें ऊपर कौन है, किसी को नहीं पता। ईश्वर से लेकर तस्कर, माफिया कोई हो सकता है। मुझे क्या। कोई हो। मैंने उनको बहलाया कि यार, मैं तुम्हारे कारोबार का हिस्सा क्यों बनूं। मित्र चहके, तुमने वह शेर सुना है न। उन्होंने सुनाया- गुलों में रंग भरे बादे नौबहार चले, चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले। गुल, बुलबुल, हवा, रंग इनका महत्त्व तभी तक है जब तक कारोबार चल रहा है। मेरे ज्ञान चक्षु टिमटिमा उठे। ठीक भी है। जब तुलसी जर्दा और गालिब मीट शॉप हो सकती है, तो यह अर्थ क्यों नहीं।

मैंने फिर भी कोशिश की कि मित्र, अब तक तो कुछ और करता रहा। अब बेचने लगूं। यह मेरे लिए यू टर्न जैसा होगा। वे उछल पड़े। जैसे एक शब्द मिल जाने पर कोई बुद्धिजीवी एक घंटा घंटा बजा सकता है, वैसे ही उछले। बोले, प्रगति का यही रहस्य है। जिसने यूटर्न नहीं लिया वह भी क्या मनुष्य। इसी का नाम प्रतिभा है। सीधे-सीधे चल कर राजघाट के कीर्तन में शामिल होना हो तो बात अलग है। कीर्तिमान बनाना है तो यूटर्न लेना होगा। अब तुम कहोगे इससे कुछ लोग खतरे में पड़ सकते हैं। प्यारे, तुमने भारतीय राजनीति के पवित्र उदाहरणों से शायद कुछ नहीं सीखा। आज वही सुरक्षित है, जिससे लोग खुद को असुरक्षित महसूस करें। जो पूरे समाज को विफल करके सफल होता है वही महान कहलाता है। इसलिए ले लो। दस-बीस टक्कर खाकर लमलेट हो जाएंगे, यही तो होगा। मैं ऊपर कह दूंगा। उल्टा उन्हीं लोगों पर मुकदमा ठुक जाएगा। तुम मेरे साथ आकर जो चाहो बेचने लगो।

मैं चौंका, चाहे जो? वे मुस्कराए, हमारी कंपनी अपनी ओर से किसी चीज को बेचने का दबाव नहीं डालती। कोई भी जो बेचना चाहे उसकी व्यवस्था कर देती है। अगले को तकलीफ न हो। हैरत हुई कि कुछ भी मतलब! क्या कोई देश भी बेच सकता है? मित्र खुश हुए। क्यों नहीं। बस तर्क तलाश करने होंगे। तर्क से साबित हो जाए कि काम ठीक है, बस ठीक। वैसे हकीकत यह है कि तर्क देकर किस्तों में लोग मुल्क बेचते ही आए हैं। संस्कृति बेचने वालों की कई एजेंसियों से तो मेरी राह-रस्म है ही। भाषा, गरीबी, अशिक्षा, धर्मनिरपेक्षता आदि की अंतरराष्ट्रीय दुकानों से तुम्हारा भी परिचय है। हां एक साथ बेचना शायद मुश्किल हो। फिर भी मैं ऊपर तक तुम्हारे विचार पहुंचा देता हूं। कोई न कोई रास्ता निकल ही आएगा। तुम प्रोजेक्ट तैयार कर लो। बात सीधी-सी है। हम बेचने वाले हैं। हमारे लिए सब कुछ प्रोजेक्ट और प्रेजेंटेशन है। मुल्क भी।

मैंने कोशिश की। यार मैं पुराने खयाल का आदमी हूं। मुझे बहुत कुछ याद आता रहता है। रिश्ते, नाते, आभार, उपकार। मैं तुम्हारे साथ नहीं आ पाऊंगा। मित्र उत्साहित हो गए। यह अच्छी बात है कि तुमने अपनी बीमारी पहचान ली। अब चाहो तो इसका इलाज भी हो जाएगा। मेरी सलाह तो यह है कि अपने पुरखों की बात मानो। वे कह गए हैं कि न अतीत में रहो न भविष्य में। वर्तमान में जिंदा रहो। होंगे तुम्हारे रिश्ते-नाते। किया होगा किसी ने उपकार। तुम आज में रहो। तुम्हारे ऊपर किसी का आभार नहीं। स्वारथ लागि करैं सब प्रीती। स्वार्थ में पड़े लोगों से हमें क्या लेना-देना। कंपनी कुछ वक्त तुम्हें दवाई खिलाएगी। तुम बकवास बातें भूल जाओगे। समय कठिन है। तलवार की धार पर चलना है। इस पर अपने पैरों से चलोगे, तो लहूलुहान हो जाओगे। हमारी कंपनी तुम्हें दूसरों के पैर मुहैया कराएगी। बड़ी दयालु कंपनी है। असंख्य लोगों के पैर, हाथ, दिमाग खरीद कर कोल्ड स्टोर में डाल रखे हैं। तुम बस हमारे साथ आ जाओ।

मैं पसोपेश में था। मित्र खुश हुए। बोले, मैं तुम्हारे मन का पाप समझ रहा हूं। तुम सोचते हो कि मैं लिखने-पढ़ने वाला आदमी, इस काम में काहे लगूं। तो सुनो। तुम्हारे एक साथी को रेत खनन और पत्थर सप्लाई में पिछले महीने लगाया था। वह काम भी कर रहा है। अखबार में छप भी रहा है। हाल ही में दैनिक बेहाल में उसकी कविता छपी। मैं बेचता पत्थर, देखो मुझे आकर इलाहाबाद के पथ पर। बताओ। यह है टैलेंट। यही तो कंपनी कहती है। अंधेरे में रहो रौशनी बेचो। मैं तो कहता हूं, आ ही जाओ।

मैंने सवाल किया कि मित्र, मुझे कुछ तो पूंजी लगानी होगी। मेरे पास है ही क्या। मित्र सद्भाव में डूब गए। ओ भोले, तुमको कुछ नहीं लगाना। दिमाग भी नहीं। ओ दधीचि, तुम बस आसन लगा कर बैठ जाना। कंपनी तुमको चटवा कर तुम्हारी हड्डियां हासिल कर लेगी। उनसे वज्र बना कर तुम्हारे हाथ में थमा देगी। बस तुम बाजार में उतर कर मिशन नरसंहार में लग जाना। तुम वीर हो, बस अपने को पहचान नहीं रहे। अपने भीतर छिपे नए आदमी को खोज निकालो। संत पहले ही कह गए हैं, बिकवैया के सामने रामरमैया धूल। कंपनी में आ जाओ। सब भूल जाओगे। तुमको कुछ दिन बाद कंपनी की नागरिकता मिल जाएगी।

मैं चकित हुआ। मैं तो पहले से एक देश का नागरिक हूं। मित्र अट्टहास कर उठे। तुम जैसे लोगों ने ही सामाजिक विकास को रोक रखा है। समझ कुछ पाते नहीं। बातें बड़ी-बड़ी। कंपनी ने बताया है कि देश तो है ही कागज पर। सच्चाई यह है कि हम सब कुछ कंपनियों के नागरिक हैं। योजनाएं वही बनाती हैं। इतनी दयालु हैं कि मुल्क चलाने का श्रेय भी नहीं लेना चाहतीं। इतना कह कर मित्र रोने लगे। मैं भी रोने लगा। वे रोते-रोते कन्फर्म कर रहे थे कि बेचोगे न! मैं रोते-रोते कह रहा था हां मेरे प्रिय दोस्त। इन आंसुओं में मेरे मन की मूर्खता बही जा रही है। मैं ताजगी महसूस कर रहा था। लाओ कहां हस्ताक्षर करूं। यह कहते ही जैसे मैंने अपना हाथ देखा, तो डर गया। मेरी सारी अंगुलियां गायब थीं। मित्र ने अपनी जेब में हाथ डाला और मेरी अंगुलियां निकाल कर मेज पर रख दीं। बोले, तुम्हारे खाते में इनका पेमेंट पहुंच गया है। अब ये कंपनी की। तुम जो दो-तीन मिनट अभी रोए हो, उसका भी भुगतान किया जाएगा। मालिक रहमदिल हैं। चलो हमारे साथ।

मैं बोला, ठीक है। चल रहा हंू। अपने परिवार से तो मिल लूं। मित्र नाराज हुए, अब सब भूल जाओ। तुम बिकवैया परिवार के सदस्य हो। चल पड़ो। मैं कुछ रुका तो उन्होंने हाथ हिलाया। जाने कहां से दो आदमी प्रकट हुए। मुझे उठा कर एक बैग में डाल दिया। बैग में पहले से ही बहुत से लोग मौजूद थे।

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