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बाखबरः दो चैनल के बीच में

अटली जी को लेकर दिल्ली में हुई सर्वदलीय शोकसभा में फारूख अब्दुल्ला ने अपने वक्तव्य के बाद अचानक ‘भारत माता की जय’ बोल कर श्रोताओं में से बहुतों को ऐसा झटका दिया कि एक-दो सेकेंड तक तो लोग समझ ही नहीं पाए कि क्या करें। ताली बजाएं कि न बजाएं?

केरल में बाढ़ से तबाही की खबरें आती रहीं। अटल जी के निधन के पहले भी वे लाइव थीं और दो दिन बाद भी वे लाइव थीं। लेकिन बाढ़ की व्याख्या में फर्क आ गया। चैनलों को बाढ़ के बीच ‘देवदूत’ दिखाई देने लगे। एक चैनल ने पुकारा : ‘केरल पहुंचे धरती के भगवान!’ संग में लाइन मारी : ‘भारत मां तेरे रक्षक बनेंगे हम’! दूसरे चैनल ने लाइन लिखी : मौत से बड़े हैं देवदूत! यानी सैनिक! तीसरा चैनल तो पूरी तरह कविया गया : ‘वो फंसे हैं वहां, हम तड़पते यहां’! भैये, इतनी ही ‘तड़प’ है, तो स्टूडियो में टाई लगाए क्यों बैठे हो? हमारे हिंदी चैनल दुख की भी नौटंकी बना डालते हैं! सैनिकों की ‘ड्यूटी’ को भी दैवी कृपा की तरह दिखाया जाता है!

इधर चैनलों का सैन्यभक्ति युग शुरू था, उधर केरल गुहार लगा रहा था कि कुल क्षति बीस हजार करोड़ की हुई है! इस बीच खबर आई कि केंद्र ने पांच सौ करोड़ रुपए की मदद का एलान किया है।… फिर कुछ राज्यों ने आगे आकर मदद का एलान किया। किसी ने पांच करोड़ दिए। किसी ने दस करोड़ देने की बात की और बहुत से लोगों ने एक दिन का वेतन देने की बात भी की। इस बीच सबसे बड़ी खबर तब बनी जब यह खबर फ्लैश हुई कि यूएई सात सौ करोड़ रुपयों की मदद देगा! लेकिन अगले ही दिन यह खबर विवाद में फंस गई। चैनल सरकार द्वारा इस ‘आफर’ को ठुकराने की खबर देने लगे। सुनामी के जमाने से भारत की नीति है कि वह ऐसी आपदा में बाहर से मदद नहीं लेता। उसी नीति पर भारत कायम है।

दो-तीन दिन तक यूएई की कथित इमदाद को ‘ठुकराने’ की खबर छाई रही, लेकिन शाम तक इसमें अपनों ने ही फंसट डाल दी। चैनलों ने मंत्री अलफोंसे के हवाले से खबर दी कि वे सात सौ करोड़ की इमदाद ठुकराने की नीति से सहमत नहीं। उनका कहना रहा कि इसके लिए नियमों में बदलाव किया जा सकता है। लेकिन शुक्रवार की सुबह दस बजे तक इस इमदाद की खबर के भी दो-फाड़ हो गए। एनडीटीवी कहे जा रहा था कि केरल के वित्तमंत्री ने कहा है कि सात सौ करोड़ की इमदाद लेने के रास्ते में केंद्र अड़ंगा लगा रहा है, लेकिन रिपब्लिक टीवी पर इसी वक्त देखा, तो मालूम हुआ कि वह यूएई के राजदूत के हवाले से खबर दे रहा है कि सात सौ करोड़ रुपए की इमदाद का ‘आफर’ ही नहीं दिया गया।

हमने फिर एनडीटीवी की ओर रुख किया, तो पाया कि वहां केंद्र को कोसा जाना जारी था, फिर चैनल पलट कर देखा तो रिपब्लिक अपनी खबर दुहराए जा रहा था कि ऐसा ‘आफर’ कभी नहीं दिया गया! किस चैनल का यकीन करें प्रभु जी! आप ही बताएं कि जो ‘आफर’ दो-तीन दिन तक ‘सत्य’ बना रहा और ‘उसका ठुकराया जाना’ बना रहा, वह शुक्रवार की सुबह तक आते-आते दो-फाड़ कैसे हो गया? आप ही बताएं सर जी, कि वह ‘आफर’ था भी कि नहीं? अगर नहीं था तो ठुकराया क्या गया था! हमें तो लगता है कि एक ही खबर का एक सत्य रिपब्लिक के पास होता है और एक सत्य एनडीटीवी के पास होता है, बाकी चैनलों पर भी अपने-अपने सत्य होते हैं। सत्य इन दिनों टुकड़े-टुकड़े होकर आता है।

एक और खबर के सत्य के टुकड़े-टुकड़े होते देखिए : शुक्रवार की सुबह रिपब्लिक की खबर थी कि ‘ममता को बड़ा झटका’! बड़ी अदालत ने पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनावों को लेकर फैसला दे दिया है कि विरोधी दल अपनी दलीलें पेश करें! लेकिन तभी एनडीटीवी देखा, तो वह कहता था: ‘फैसले से ममता को राहत’! एक चैनल जिसे ‘झटका’ कहता है, दूसरा उसे ‘राहत’ कहता है! बेचारा ‘सत्य’ चैनलों की चक्की में पिसा जाता है। दो चैनल के बीच में साबुत बचा न सत्य! अटल जी की अस्थियां एलान के अनुसार सौ नदियों में विसर्जित की जाती रहीं, लेकिन दो हिंदी चैनलों पर छत्तीसगढ़ के दो मंत्री अटल जी की शोकसभा के नाम पर जोर-जोर से ठहाके लगाते दिखे!

रांची का वह मास्टर, जिसने अटल जी को मूर्खतावश ‘फासिस्ट’ कहा, तो वह पिटा, लेकिन दो मंत्री अटल जी पर हंसते रहे तो कुछ न हुआ! नवजोत सिंह सिद्ध्ू इमरान की ताजपोशी में पाकिस्तान जाकर सेना के चीफ से गले क्या मिले, पहले तो कई एंकरों ने उनको जम के ठोंका। कुछ कसर रह गई तो भाजपा प्रवक्ताओं ने ठोका! इसे कहते हैं आ बैल मुझे मार! यही क्यों! जर्मनी में जाकर राहुल जी ने ‘लिंचिंग’ का नया समाजशास्त्र ही दे डाला। कह दिए कि नोटंबदी और बेरोजगारी का परिणाम है लिंचिंग!
तब ‘घृणा की राजनीति’ वाली लाइन का क्या हुआ सर जी? और उधर भाजपा प्रवक्ता ज्ञानी बन कर राहुल के इस ‘अज्ञान’ पर हंसते रहे।

लेकिन लगा कि जाते-जाते अटल जी अपना काम कर गए। वे फारूख अब्दुल्ला का हृदय परिवर्तन कर गए। अटली जी को लेकर दिल्ली में हुई सर्वदलीय शोकसभा में फारूख अब्दुल्ला ने अपने वक्तव्य के बाद अचानक ‘भारत माता की जय’ बोल कर श्रोताओं में से बहुतों को ऐसा झटका दिया कि एक-दो सेकेंड तक तो लोग समझ ही नहीं पाए कि क्या करें। ताली बजाएं कि न बजाएं? फारूख के इस ‘अपराध’ पर अलगाववादियों ने श्रीनगर में उनसे धक्का-मुक्की तक कर डाली। लेकिन इस ‘फारूखी गांठ’ के प्रति कई देशभक्त एंकर ‘कन्फयूज्ड’ दिखे। कल तक जिनको ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ कह कर आनंद लिया करते थे, उन्हीं के ‘भारत माता की जय’ बोलते ही ‘कन्फ्यूज्ड’ हो गए।