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तीरंदाजः लोकतंत्र में रामराज्य

अयोध्या में राममंदिर होने का मतलब रामराज्य की वास्तविकता को स्वीकार करना है। रामराज्य लोकतांत्रिक मूल्यों की पराकाष्ठा था। लोकतंत्र के मूल्यों की स्थापना और उन पर अमल बिना त्याग के नहीं हो सकता है।

पांच अगस्त को अयोध्या में राममंदिर निर्माण कार्य का आरंभ भूमि पूजन के अनुष्ठान से होगा। प्रधानमंत्री इस पूजन में अग्रणी भूमिका निभाएंगे।

पांच अगस्त को अयोध्या में राममंदिर निर्माण कार्य का आरंभ भूमि पूजन के अनुष्ठान से होगा। प्रधानमंत्री इस पूजन में अग्रणी भूमिका निभाएंगे। उनके साथ वे सब विशिष्ट और वरिष्ठ नेतागण होंगे, जिन्होंने 1980 के दशक में रामजन्म भूमि आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक रूप से चलाया था। इस आंदोलन का नतीजा बाबरी मस्जिद ढांचे का विध्वंस था। 6 दिसंबर, 1992 को कारसेवकों ने मुगल शासक बाबर के काल में रामलला जन्मस्थल पर बनवाई गई मस्जिद को जड़ मूल से उखाड़ फेंका था। ढांचा गिराने का काम दिन भर चला था और उसके बाद से रामलला भारी पुलिस बल की तैनाती में तिरपाल के नीचे विराजमान थे।

उसके बाद सालों कोर्ट कचहरी चलती रही। पर अंतत: वह दिन आ ही गया है, जब द्वापर युग के प्रतापी नरेश मर्यादा पुरषोत्तम श्रीराम फिर से अपना भव्य आसान ग्रहण करेंगे। वैसे आसन ग्रहण करने में अभी तीन साल और लगेंगे, क्योंकि प्रस्तावित निर्माण कार्य में न्यूनतम इतना समय लगेगा। पर इससे कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि प्रधानमंत्री राजसी गौरव की प्रतीकात्मक चांदी की शिला पांच अगस्त को ही रख देंगे।
एक तरह से अयोध्या में सिर्फ एक धार्मिक स्थल का निर्माण नहीं हो रहा है, बल्कि एक प्रबल राष्ट्रीय भावचिह्न उकेरा जा रहा है। यह चिह्न हिंदू बहुमत भारत का प्रतीक है, जो अपने हिंदुत्व को लेकर लगभग चालीस सालों से आंदोलित है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि विष्णु अवतार श्रीराम अपने रामलला रूप में, सियापति रामचंद्र्र के रूप में या राजा राम की भव्यता के रूप में सनातन धर्म की धरोहर रहे हैं। उनकी वीरता, मर्यादा और उदारता अनुकरणीय ही नहीं है, बल्कि पूजनीय रही है। प्राचीन भारत हो या आधुनिक भारत, राम हर जगह विद्यमान हैं। जन्म से लेकर अंतिम समय तक राम का नाम ही सत्य है। हम सुबह राम का नाम लेकर उठते हैं और रात में उनका स्मरण करके सोते हैं। राम ईश्वर हैं, राम सनातन हैं। राम हम में हैं, हम राम में निहित हैं। वे अयोध्यावासियों के रोजमर्रा के जीवन का उतना ही हिस्सा हैं, जितना सुदूर दक्षिण, पूरब, पश्चिम या उत्तर के किसी अन्य भूभाग में बसे लोगों का। सदियों-सदियों से रामजी ने सभी का बेड़ा पार लगाया है।

राम मंदिर बनने पर किंतु, परंतु की कोई गुंजाइश नहीं है। यह विधि का विधान है कि मंदिर निर्माण की बेला आ गई है। बाकी सब- चाहे वह कानूनी कार्यवाही हो या राजनीतिक यत्न- सिर्फ बनाक बन गए हैं। इसलिए सारा श्रेय किसी और को नहीं, रामजी को जाता है। उनकी मर्जी का अनुपालन हो रहा है। यह किसी की जीत नहीं है। यह कोई गर्व करने वाली उपलब्धि भी नहीं है। यह वास्तव में विनय और शील का क्षण है। मर्यादा की लक्ष्मणरेखा को हृदय में उतारने का मौका है- संकल्प लेने का अवसर है कि हम रावण जैसा अहंकार पालने के बजाय विनीत होकर राम की शरण में अपने को अर्पित कर दें। और अगर कोई राममंदिर को अपनी उपलब्धि के रूप में देखता है, तो उसे जल्द ही अपने बड़बोलेपन पर शर्मिंदा होना पड़ेगा।

हिंदुत्व सामयिक है, धर्म सनातन है। हिंदुत्व की परिभाषा हो सकती है, सनातन परिभाषित नहीं हो सकता है। धर्म अविरल धारा है, जिस पर किसी का नाम लिखा नहीं जा सकता है और न ही उसके अंश किए जा सकते हैं। उसका उद्गम और अंत दो अलग बिंदु नहीं हैं। जहां से निकलती है वहीं समाप्त हो जाती है और जहां समाप्त होती है वहीं उसका गोमुख भी है।

सनातन सत्य यह है कि कोई ‘अन्य’ नहीं है। ‘हम’ और ‘वह’ जैसी परिकल्पना सनातन धर्म में नहीं है। विष्णु के दस अवतार हुए- मत्स्य अवतार से लेकर राम और कृष्ण तक। हर रूप अलग था, पर सत्य केवल एक ही था। राम कृष्ण से ‘अन्य’ नहीं है, नरसिंह से भी ‘अन्य’ नहीं है, जबकि तीनों की कथा अलग-अलग है। रावण, कंस अथवा हिरण्यकश्यप भी अलग नहीं थे, बल्कि दिव्य लीला का हिस्सा थे। रावण जब मृत्युशैया पर था, तो श्रीराम ने लक्ष्मण को उसके पास ज्ञान प्राप्ति के लिए स्वयं भेजा था। दूसरे शब्दों में, जीवों को ‘हम’ और ‘वह’ में बांटने वाला कुतर्की सनातनी नहीं हो सकता है, क्योंकि धर्म के अनुसार सारा विश्व हमारा कुंटुंब है। किसी से द्वेष भाव रखना अधर्म है। सब ‘हम’ है , ‘वह’ कोई नहीं है।

राम ने बांटा नहीं, बल्कि बंटे हुए को जोड़ा था। बंदर, भालू, रीछ, आदिवासी, शोषित आदि को साथ लेकर एक व्यापक साम्राज्य की व्यवस्था की थी। उनके लिए शबरी के साथ बेर खाना उतना ही सहज था, जितना कि अहिल्या को श्राप से मुक्ति देना। उन्होंने अयोध्या से लेकर लंका तक कई संघर्ष किए, पर हर संघर्ष की परणिति प्रेम और सद्भाव थी। हर जगह उन्होंने कलेश को हरा और सौहार्द की स्थापना की थी। वास्तव में शक्तिप्रदर्शन आसान होता है, बहुतों के वश की बात है, राम ने भी किया था और रावण ने भी पर राम राम हो गए और रावण रावण रह गए। दोनों में फर्क सिर्फ इतना था कि राम सबको साथ लेकर चले और रावण सिर्फ अपने अहंकार के साथ चला था। राम वास्तव में धनुर्धारी ही नहीं थे, बल्कि उससे कहीं ज्यादा शक्तिमान मर्यादाधारी क्षत्रिय थे। इसीलिए चारों युगों में बाहुबली तो बहुत हुए, पर सिर्फ राम ही पुरुषोत्तम थे।

अयोध्या में राममंदिर होने का मतलब रामराज्य की वास्तविकता को स्वीकार करना है। रामराज्य लोकतांत्रिक मूल्यों की पराकाष्ठा था। लोकतंत्र के मूल्यों की स्थापना और उन पर अमल बिना त्याग के नहीं हो सकता है। राम ने इस अग्निपरीक्षा को स्वीकार किया था और एक धोबी के कहने पर सीता का त्याग कर दिया था। प्रतापी सम्राट होने के नाते वे धोबी के आक्षेप को नजरअंदाज कर सकते थे या फिर उसका दमन कर सकते थे, पर उन्होंने ऐसा नहीं किया था। उन्होंने व्यक्तिगत पीड़ा सहते हुए लोकतांत्रिक मर्यादा की रक्षा की थी।

पांच अगस्त को अयोध्या खूब सजेगी, पर सारी सजावट झूठ-सी क्षणभंगुर होगी, अगर सनातन धर्म रामराज्य के लोकतांत्रिक भाव को अनदेखा कर देंगे। राममंदिर की वास्तविक प्राणप्रतिष्ठा रामराज्य के सक्रिय संकल्प के बिना नहीं हो सकती है। रामभक्तों को यह संकल्प सिर्फ मन में नहीं करना है, बल्कि उसको सार्वजनिक जीवन में तुरंत क्रियाशील भी करना है।

 

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