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बाखबर: संभल जाओ चमन वालों

कुछ बड़बोले चैनलों को फिर रक्षात्मक होना पड़ा! फिल्म प्रोड्यूसर गिल्ड ने कोर्ट से प्रार्थना की कि बॉलीवुड को गंजेड़ी, नशेड़ी, चरसी आदि कह कर ‘बदनाम’ करने वाले चार चैनलों पर ऐसी खबर देने पर पाबंदी लगाई जाए! इसके बाद चैनलों में सन्नाटा छा गया!

TRP Scam, Witness, Rating, Corruption, TV Channel, Automatic rechargeतस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फोटोः Freepik)

हाय! वह दोपहर कितनी अच्छी गुजरी, जब मुंबई के आला अफसर जी ने टीआरपी में हेराफेरी करने के लिए एक सत्यवादी चैनल का नाम लिया और जांच के आदेश दिए! यह खबर आनी थी कि स्पर्धी चैनल भइया जी के चैनल पर टूट पड़े!

लेकिन, शाम तक अपने दुर्दमनीय भइया जी ने खेल ही पलट दिया! भइया जी आए और पट्टी बंधे दाएं हाथ से एक कागज लहराए कि ये देखिए, एफआइआर! इसमें नाम तो है उस रकीब चैनल का, लेकिन तोहमत लगा रहे हैं हम पर!

गुस्से में फनफनाते भइया जी ने पूरे पंद्रह मिनट तक पुलिस अफसर की खबर ली कि वे सोचते हैं, मुझे बंद करा देंगे। मैं कह रहा हूं कि मैं उन अफसर पर मुकदमा करने जा रहा हूं। वे हमें बदनाम कर रहे हैं। चाहे भीमा कोरेगांव का मामला हो या पालघर का या हाथरस का, हमी ने उठाया। अगर हिम्मत है, तो मुझे आकर गिरफ्तार करके दिखाओ। जो ‘नेशन फर्स्ट’ कहते हैं, वे तुम्हारे दुश्मन हैं! तुम मेरे चैनल को बंद करोगे? चैनल यहीं रहेगा। तुम कायर हो। मेरी ‘व्यूअरशिप’ पर सवाल उठाते हो? तुम जानते भी हो ‘व्यूअरशिप’ क्या होती है? मेरे जैसे ‘नेशनलिस्ट जर्नलिस्ट’ को धमकाते हो। मैं धमकी में आने वाला नहीं…’

इस एंकरिंग पे कौन न मर जाय ऐ खुदा! चोटिल था हाथ और हाथ में एफआइआर भी रही!’ भइया जी का पलटवार दो दिन चला और रकीब चैनल का विकेट गिरा। अतीत में टीआरपी में की गई हेराफेरी के लिए ‘दंडित’ होने को स्वीकारना पड़ा और माफी मांगनी पड़ी! एक बार फिर पुलिस ने लगता है कि कच्चा काम किया और फिर पिटी!

इतना ही नहीं, ‘बार्क’ ने भी कहा कि उसने तीन महीने के लिए टीआरपी आकलन पर रोक लगा दी है! कितनी राहत कि अब तीन महीने तक कोई भी चैनल अपने को ‘नंबर वन’ कह कर दूसरे को नहीं चिढ़ा पाएगा! कुछ बड़बोले चैनलों को फिर रक्षात्मक होना पड़ा! फिल्म प्रोड्यूसर गिल्ड ने कोर्ट से प्रार्थना की कि बॉलीवुड को गंजेड़ी, नशेड़ी, चरसी आदि कह कर ‘बदनाम’ करने वाले चार चैनलों पर ऐसी खबर देने पर पाबंदी लगाई जाए! इसके बाद चैनलों में सन्नाटा छा गया!…

इसी बीच, हाथरस की कहानी को जयपुर में पुजारी के जला दिए जाने की कहानी ने ऐसा किनारे किया कि न्याय की मांग करने हाथरस पहुंचे न्याय-याचकों की हिचकियां बंधती नजर आईं! चैनल भी किस-किस के लिए लड़ें? कोई वोट दिलाए तो लड़ें भी, वरना किस-किस के लिए न्याय मांगते फिरें?

जैसे कि, सुशांत के मामले में अभी दम है, क्योंकि बिहार में चुनाव है। इसी कारण, एक वीरबालक और उसके चैनल ने आंदोलन का ऐलान कर दिया और सही ‘एंगिल’ पर कैमरे लगा कर ‘भीड़’ की गारंटी कर दी। अगली सुबह दिल्ली के जंतर मंतर, पटना के गांधी मैदान, बनारस के गंगाघाट पर कुछ लोग दिखे, जो कैमरों में आकर ‘वी वांट जस्टिस’, ‘नो जस्टिस, नो वोट’ के नारे लगा कर पंद्रह सेकेंड की अमरता प्राप्त कर रहे थे। बीस-तीस की इस भीड़ को ही एक चैनल ‘जनक्रांति’ बता कर बेचता रहा! यह इसी की बनाई ‘भीड़’ थी, इसलिए बाकी चैनलों पर यह ‘जनक्रांति’ गायब ही रही!

इसे देख ऐसा लगता है कि इन दिनों आंदोलन ‘होते’ नहीं, धंधई चैनलों द्वारा ‘बनाए’ जाते हैं। इसी बीच महाराष्ट्र में मंदिरों को खोलने की मांग को लेकर महाराष्ट्र के राज्यपाल महोदय ने ‘सेक्युलरिज्म’ शब्द पर ही तंज कस दिया और व्यर्थ के विवाद में फंसे!
एक बार फिर से कंगना जी पर हुई एफआईआर ने बड़ी खबर बनाई कि पूछताछ के लिए जल्द ही उनको बुलाया जाएगा! हाय! वह दिन कब आएगा, जब हम मैडम जी को पूछताछ के लिए जाते-आते लाइव लाइव देखेंगे।

इस सप्ताह, दो दिन तक ‘हाथरस बरक्स करौली’ की प्रतियोगिता चलती रही! करौली में एक पुजारी को जिंदा जला दिया जाना, जलते-जलते वीडियो में उसका चिल्लाना कि ‘हाय मार दिया’… ‘हाय जला दिया…’ एक हिलाने वाला अनुभव था।

इसके बाद मामूली एंकर तक ताने मारते दिखे कि ‘बहन भाई’ हाथरस तो जाते हैं, करौली नहीं जाते, लेकिन यह ‘बहन भाई’ का सौभाग्य नहीं तो और क्या है कि जहां जगह नहीं होती वहां भी उनके हमदर्द उनको प्रेमपूर्वक ठोकने के लिए ‘जगह’ निकाल लेते हैं!
इस बीच फारुख अब्दुल्ला ने कह डाला कि अनुच्छेद तीन सौ सत्तर को चीन की मदद से बहाल कराएंगे, तो रिहाई के बाद महबूबा मुफ्ती ने उवाचा कि हम तीन सौ सत्तर को बहाल कराने के लिए आंदोलन करेंगे!

इसी के आसपास ‘तनिष्क ज्वेलर्स’ के एक कथित ‘सेक्युलर’ विज्ञापन ने अचानक ‘कम्यूनल’ मोड़ ले लिया और ‘एक मुसलिम परिवार में एक हिंदू-बहू की गोद भराई’ वाले इस विज्ञापन को वापस लेना पड़ा!

इसके बाद एक ‘सुधारवादी कहानी’ असम से आई और देखते-देखते चैनलों में ‘असली सेक्युलरिज्म’ और ‘सूडो सेक्युलरिज्म’ के बीच ‘लट्ठमलट्ठ’ होने लगी। कई नामी चैनलों ने ‘मदरसों और वैदिक संस्कृत स्कूलों की फंडिंग बंद करने’ के असम सरकार के एलान पर बहसें कराई। एक ‘स्वघोषित नेशनलिस्ट’ एंकर बोला, असम का ‘सेक्युलरिज्म’ ही है ‘असली सेक्युलरिज्म’! इसे महाराष्ट्र, बंगाल आदि सबको अपनाना चाहिए, क्योंकि यही नीति सच्ची सेक्युलरवादी नीति है। इसके साथ ही एक एंकर ने प्रबोधा कि ‘संभल जाओ चमन वालो कि आए दिन कामन सिविल कोड के’!

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