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बाखबर: जुमलों के बीच आंदोलन

ये किसान कुछ अलग हैं। वे अपने आंदोलन की हर खबर और अपने धरने के असर के प्रति भी बाखबर हैं। ये न प्रेमचंद के किसान हैं और न राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के किसान हैं। ये नए ‘उत्तर हरित क्रांति’ के खाते-पीते और राजनीतिक रूप से जागरूक किसान हैं, जिनके पास सरकारी प्रवक्ताओं की हर बात का एक ही जवाब है : पहले कानून रद्द करो, फिर बात करेंगे!

Farmers Protest, Farm Laws, SC, NDA, BJPकेंद्र में पीएम मोदी के नेतृत्व वाली NDA सरकार के लाए तीन कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली में डेरा डालकर आंदोलन पर बैठे किसान। (फोटोः पीटीआई)

एक चैनल पर ‘ब्रेकिंग न्यूज’ : पैंसठ बरस के संत बाबा राम सिंह ने गोली मार कर आत्महत्या की! कुछ देर बाद संत ‘किसान’ कहलाने लगते हैं। यह खबर डराती है। लेकिन ऐसी ‘ब्रेकिंग न्यूज’ सिर्फ एक चैनल पर रहती है। बाकी चैनल उसे आम खबर की तरह ही चलाते हैं।

एक चैनल लाइन लगाता है : धरना बंद करो, बातचीत जारी करो। दूसरा लाइन लगाता है : विरोध अपनी ताकत खो रहा है। ऐसी लाइनें किसानों को और उत्तेजित करती हैं!

कुछ युवा हाथों में डंडे लिए आते हैं। फिर एक खाली जगह पर चौकड़ी मार कर बैठ जाते हैं। अगले दृश्य में उनके नीचे हरी जाजिम आ जाती है। वे डंडे फटकारते रहते हैं। कुछ नारे लगाते दिखते हैं।

एक चैनल इस दृश्य में ‘हिंसा’ देखता-दिखाता है। भइए! चंद डंडे देख लिए, तो हिंसा समझ लिए! ऐसे तो कर ली रिपोर्टिंग!
सबसे ठहरे हुए सुर में बात करते हैं किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत। रिपोर्टर उनसे कुरेद-कुरेद कर पूछते रहते हैं आगे क्या? सरकार कानून हटाएगी नहीं, आप हटेंगे नहीं, तो आगे क्या?

हम तो दिल्ली जा रहे थे, सरकार ने बीच में रोक दिया। हम रुक गए। हम क्या करें, बताओ। उनके स्वर में एक बार भी गुस्सा नहीं आता।

कुछ गरम सुर रहता है तो किसान नेता सतनाम सिंह पन्नू का! धरने को लेकर बड़ी अदालत सुनवाई करे, इससे पहले ही वे साफ कर देते हैं कि अदालत तो ‘थंब’ (अंगूठा) है। कमेटी शमेटी क्या करेगी? पहले कानून वापस लो, फिर बात होगी…
धरने में कहीं पिज्जा बन रहा है। कहीं मैगी बन रही है। पूछने पर रिपोर्टर को जवाब मिलता है : पिज्जा भी गेहूं से बनता है, मैगी भी। रिपोर्टर निरुत्तर हो जाता है।
एक किसान नेता : कृषिमंत्री एमपी के किसानों को संबोधित करते हैं। पीएम कच्छ जाकर चार-पांच किसानों से मिल सकते हैं, हमारे बीच क्यों नहीं आते?

ये किसान कुछ अलग हैं। वे अपने आंदोलन की हर खबर और अपने धरने के असर के प्रति भी बाखबर हैं। ये न प्रेमचंद के किसान हैं और न राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के किसान हैं। ये नए ‘उत्तर हरित क्रांति’ के खाते-पीते और राजनीतिक रूप से जागरूक किसान हैं, जिनके पास सरकारी प्रवक्ताओं की हर बात का एक ही जवाब है : पहले कानून रद्द करो, फिर बात करेंगे! जब कानून ही रद्द हो गया तो फिर बात कैसी?

पहली बार एक ताकतवर सरकार एकदम लाचार नजर आती है। प्रवक्ता व्यर्थ ही दिलासा देते रहते हैं कि पंजाब हरियाणा छोड़ बाकी के किसान सरकार के साथ हैं! धरना उठे तो जानें।

भाजपा प्रवक्ता हर चैनल पर कहते हैं- कल तक विपक्षी नेता भी ऐसे ही सुधार चाहते थे। हमने कर दिए तो पलट गए! अब ऐसी ही ‘पलट राजनीति’ बची है! किसानों के ‘प्रेय’ की जगह राजनीतिक ‘श्रेय’ की लड़ाई है!

दिल्ली के सीएम केजरीवाल विधानसभा में तीनों कानूनों की प्रतियों को फाड़ कर फेंक देते हैं। उनकी देखादेखी आप के सभी सदस्य भी कानूनों की चिंदियां उड़ा देते हैं।

हर चैनल बड़ी अदालत की कार्रवाई को अपने तरीके से दिखा रहा है : किसी के लिए अदालत ने किसानों के धरने पर सवाल किया है, तो किसी के लिए धरने को उनका ‘हक’ बताया है!

लेकिन जिस तरह के देसी मुहावरे वाली एक मजेदार बहस मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत जी और रणदीप सुरजेवाला के बीच होती है, वैसी इस पूरे आंदोलन में न देखी न सुनी। शेखावत जी कहते हैं कि विपक्ष किसानों को डरा रहा है कि ‘गॉडजिल्ला’ आया ‘गॉडजिल्ला’ आया, जबकि सरकार किसानों की आय दोगुना करना चाहती है। इसके जवाब में सुरजेवाला कहते हैं कि ये तो वही बात हुई कि बुआ के मूंछें होती, तो मामा कहलाती! शेखावत इस हरियाणवी चोट पर बस मुस्करा कर रह जाते हैं!

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