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बाखबर: अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे

यह पंद्रह जनवरी की कुहरीली दोपहर है और पहले से तयशुदा नौवें दौर की बातचीत के लिए किसान विज्ञान भवन आए हैं। उनका एक बड़ा नेता बातचीत पर यह कह कर पानी फेर देता है कि इस बातचीत से कोई उम्मीद नहीं!

Farm Laws, Farmers, IndiaFarm Laws के खिलाफ नई दिल्ली में गाजीपुर बॉर्डर के पास बैठे आंदोलनरत किसान। (PTI Photo)

वे रोते रहे कि ये किसी की नहीं मानते। संसद की नहीं मानते। अदालत की नहीं मानते। अरे भाई, किसी की तो मानो!
और उस बहस में वह किसान चेहरा हंसता रहा, हंसता रहा, हंसता रहा। एंकर और भाजपा प्रवक्ता रोते रहे, लेकिन वह हंसता रहा!
एक रो रहा है। दूसरा उसके रोने पर हंस रहा है। संवाद हो रहा है!
बड़ी अदालत है। अदालत मिलती है। सरकार की आलोचना करती है, फिर कानून को कुछ दिनों के लिए लटका देती है और चार की कमेटी बना देती है। कमेटी को देख किसान हंसने लगते हैं, सरकारी पक्ष फिर रोने लगता है कि आप न संसद की मानते हैं, न अदालत की मानते हैं, तो आप किसकी मानेंगे?

एक रोता रहता है, एक हंसता रहता है। रुदन और हास्य का संवाद जारी है। जो कल तक कानूनों के डर से रो रहे थे, अब सरकार की फजीहत पर हंस रहे हैं और सरकार को समझ नहीं आ रहा कि क्या करे।
चैनल किसान संवाद दिखाते-दिखाते थक चले हैं। हर चैनल पर आए दिन नए-नए किसान चेहरे आ विराजते हैं। जवाब एक से होते हैं, लेकिन तेवर अलग-अलग होते हैं। अब वे ‘देख लेंगे’ के मूड में हैं।

एक हिंदी चैनल पर एक किसान के वचन : मरेंगे, लेकिन हटेंगे नहीं!
दूसरे हिंदी चैनल पर हरी टोपी पहने एक किसान नेता के वचन : सरकार तीन दिन पहले ही प्लान बना चुकी है कि एक हजार किसान मारे जाएंगे, इतने घायल होंगे, सरकार तैयारी कर चुकी है। उनकी अंदर की तैयारी है…
सरकारी प्रवक्ता : मुझे आश्चर्य है कि आपने कहा कि एक हजार मारे जाएंगे, यह सरकार का कहना है… एंकर दबी जबान से जरूर पूछती है कि आपके पास इस खबर का क्या प्रमाण है, लेकिन दोबारा नहीं पूछती।
यही किसान नेता एक अन्य चैनल पर फिर ‘सरकार के गुप्त प्लान’ को बताता है, लेकिन कोई नहीं टोकता कि आपके पास ऐसा कहने का क्या प्रमाण है?

किसान नेता की बात सुन थरथरी महसूस होती है! किसान अंतर्यामी लगते हैं। सत्य सिर्फ उनके पास है!
असली ‘खबर’ छब्बीस जनवरी की परेड में किसानों द्वारा अपनी ट्रैक्टर परेड निकालने का ऐलान है।
एक रिपोर्टर पूछता है कि रास्ते बंद हैं। आप ट्रैक्टर लेकर दिल्ली तक कैसे जाएंगे, तो जवाब में युवा किसान कहता है कि हम पहुंच जाएंगे। हमें पहुंचना आता है।

इस ऐलान से डर कर एक वीर एंकर अपने परमानेंट पैनल के आगे रोने लगता है कि छब्बीस जनवरी गणतंत्र दिवस अपना राष्टÑीय त्योहार है। अगर कुछ उपद्रव हुआ तो देश की इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी। लेकिन किसानों की इस ऐलान की काट किसी के पास नहीं दिखती।

एक बहस में एक रिटायर्ड जनरल बोला : ये छब्बीस जनवरी को अमेरिका वाली ‘कैपिटल हिल’ बनाना चाहते हैं।
दूसरी बहस में एक अर्थशास्त्री बोला : ये ‘लेफ्ट अराजकतावादी’ आंदोलन है।
इस पर एक लेफ्टिस्ट बोलता रहता है कि लोगों को अपने तरीके से गणतंत्र दिवस मनाने का हक है। परेड में पचास ट्रैक्टर भी आने दीजिए न!

गणतंत्र दिवस की ऐसी कच्ची होती कभी न देखी, न सुनी!
इस तरह के ऐलानों में बहुत कुछ ‘अनकहा’ रहता है, लेकिन जो ‘बोले गए’ से भी अधिक ‘बोलता’ है, जैसे कहते हों कि ‘अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे’।

यह पंद्रह जनवरी की कुहरीली दोपहर है और पहले से तयशुदा नौवें दौर की बातचीत के लिए किसान विज्ञान भवन आए हैं। उनका एक बड़ा नेता बातचीत पर यह कह कर पानी फेर देता है कि इस बातचीत से कोई उम्मीद नहीं!
कांग्रेस में जान पड़ गई है। पंद्रह जनवरी की दोपहर राहुल-प्रियंका किसानों के पक्ष में रोड शो जैसा देते हैं। फिर जंतर मंतर पर धरने पर बैठे किसानों की क्लास लेते हैं : देखो भाई! ये मीडिया चार-पांच उद्योगपतियों का है, उन्हीं की बात कहते हैं। ये माया है माया। आज नहीं तो कल ये कानून रद्द जरूर होंगे। ये किसान हैं। ये नहीं हटने वाले! आप किसानों को खालिस्तानी बोल रहे हैं। क्या बार्डर पर खड़े सिपाही खालिस्तानी हैं…?

‘आर या पार’ के इस माहौल में न तो ‘बर्ड फ्लू’ का खतरा बड़ी खबर बन पाता है, न बंगाल की टीएमसी सांसद नुसरत जहां का यह बयान कि ‘भाजपा कोरोना से भी खतरनाक है’!

और संसदीय ‘बैर भाव’ यहां तक पहुंच गया लगता है कि टीके के आने का स्वागत करने की जगह एक विपक्षी नेता कटाक्ष कर देता है कि ‘पीएम पहले लगवाएं’! और अफसोस कि भाजपा का एक प्रवक्ता इसका जवाब कायदे से नहीं दे पाता!

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