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बाखबर: घर का जोगी जोगना

बहस में ‘सिद्ध’ वालों ने ‘सिद्ध’ की जम कर तरफदारी की, लेकिन एक ने फिर टांग मारी कि जब तक कायदे से परीक्षण न हों, तब तक दवा का दावा करना गैरकानूनी है! अजीब हाल है। दुनिया कोरोना की दवा या टीके के लिए तरस रही है और लोग राजनीति कर रहे हैं।

India China, India China Faceoffभारत और चीन के सैनिकों की बीच हुई हिंसक झड़प में 20 भारतीय जवान शहीद हो गए थे। (फाइल फोटो)

कोई घुसपैठ नहीं हुई!’ ‘नहीं हुई, तो बातचीत करने क्यों गए?’ ‘वे हटे’ या ‘वे न हटे’! इस मुद्दे पर चैनलों में पूरे सप्ताह घमासान रहा! एक चैनल ने एक शाम घुसपैठ की ‘आफीशियल’ कहानी को पलट दिया और दावा किया कि चीनी सेना कहीं नहीं गई, वह वहीं जमी है, बल्कि अब और अधिक संख्या में जमी है।

दूसरे चैनल ने बीच की लाइन ली कि हमारी सेटेलाइट बताती है कि तीन दिन पहले यहां गलवान घाटी में कई टेंट थे, अब एक ही टेंट रह गया है, यानी वे पीछे हटे हैं।

इतने में तीसरा स्पर्धी एंकर कूद पड़ा कि वे कहीं नहीं गए हैं, ये देखिए उन्होंने फिर से मोर्चा जमा लिया है। ये देखिए, गाड़ियां, बुलडोजर, बख्तरबंद गाड़ियां और कुछ पीछे ये देखिए, दस हजार सैनिकों का जमावड़ा… एक विपक्षी नेता ने सवाल उठाया: तब बातचीत किस बात की हुई? क्या सच? क्या झूठ? कन्फ्यूजन ही कन्फ्यूजन! सबके अपने-अपने सच! इतने सारे सच कि दुश्मन खुश!

फिर शुरू हुआ ‘उनका सरेंडर’ बरक्स ‘इनका सरेंडर’ का वाग्युद्ध! एक शाम एक एंकर उछलता हुआ बोला कि देखो देखो कांग्रेस ने किया सीपीसी से 2008 में ‘पार्टी टू पार्टी कान्ट्रेक्ट’! देश की दुश्मन पार्टी के साथ करार! ये गद्दारी है? उसे कांग्रेस नहीं, ‘चीनी कांग्रेस’ कहो! किसी का नाम बिगाड़ने में हमारे एंकरों का जवाब नहीं!

कई एंकर दनदनाने लगे: कांग्रेस ने सीपीसी से करार क्यों किया? ये गद्दारी क्यों की? बताए कांग्रेस! नहीं तो हम खोलेंगे उसकी पोल। चीन को बचाने की कांग्रेस की लाइन कहीं उसी करार से तो नहीं निकल रही?
फिर एक दिन एक युवा वकील ने करार को सार्वजनिक करने के लिए बड़ी अदालत में एक याचिका डाल कर टीवी पर खबर बनाई। भक्त एंकर मस्त कि अब आएगा मजा! अब हम खोलेंगे पोल ‘चीनी कांग्रेस’ की… कांग्रेस के नए नाम निकालने में कुछ एंकरों का जवाब नहीं!

कांग्रेस को ठोकने वाले एंकरों में प्रतिस्पर्धा भी दिखी। एक ने दावा किया- ‘सबसे पहले हमने दी यह ब्रेकिंग न्यूज’, तो दूसरा बोला- ‘नहीं जी! सबसे पहले हमने तोड़ी थी यह खबर! फिर तीसरा बोलने लगा कि ‘जी नहीं, हमने खोजी थी। ‘करार’ के बदले राजीव गांधी फाउंडेशन को मिले तीन लाख डॉलर! कांग्रेस सरेंडरवादी!
ठोकने चले थे चीन को! ठोक दी ‘चीनी कांग्रेस’! चीन न सही, चीनी कांग्रेस सही! बात तो एक ही हुई! चीन पर बस न चला, तो चीनी कांग्रेस ही सही। गधे पर वश न चला, तो गदहिया की पूंछ उमेठी!

कांग्रेस की ठुकाई के साथ-साथ इस सप्ताह कुछ अंग्रेजी चैनलों में कुछ अंतरराष्ट्रीय स्तर के कूटनीतिज्ञ भी छाए रहे। इनमें से कई तो चीन के पैरोकार की तरह बोले!

एक ‘इंपोर्टेड’ कूटनीतिज्ञ ने अपनी कूटनीतिक लाइन को कूटते हुए कहा कि इस तनाव का हल कूटनीतिक बातचीत ही है। चीन से सीधा पंगा नहीं लेने का! आप कोरोना में फंसे हैं, मंदी में फंसे हैं, बहुत ताल न ठोकें सो ही ठीक! दूसरे ‘इंपोर्टेड’ जी ने यह कूट-ज्ञान दिया कि चीन घिराव में है, ध्यान हटाना चाहता है, लेकिन युद्ध कोई इलाज नहीं। बातचीत ही एकमात्र रास्ता है!

तीसरे ‘इंपोर्टेड’ लेकिन देसी नाम के देवता ने देशभक्ति वाली लाइन दी कि चीन महादुष्ट, महाधोखेबाज देश है। उसने अपनी हरकतों से तेईस देशों को त्रस्त कर रखा है। इसलिए उसके दुश्मनों को दोस्त बनाइए! हिंद महासागर में उसे टंगड़ी मार सकते हैं..!

इन चर्चाओं के बीच चैनलों ने ‘बायकाट’ ‘बायकाट’ का राग अलापना शुरू कर दिया: एक कहे कि अगर हम चीन के सामान का बहिष्कार कर देंगे तो उसकी सारी अकड़ निकल जाएगी! एक समझदार जी ने समझाया कि आप बच्चों की-सी बातें न करें? किस किस का बहिष्कार करेंगे? फिर ‘थर्ड पार्टी बायकाट’ पर पानी फेर दिया कि भइए, चीन ‘ग्लोबल सप्लाई-चेन’ का मामला है। आप तो अपना कुछ बनाते नहीं। दुनिया के अधिकांश देशों के बाजार चीन के माल से पटे पड़े हैं और अपना तो इक्यासी फीसद उपभोक्ता सामान वहीं से आता है… इस तरह ‘बायकाट’ का ही ‘बायकाट’ होने लगा!

इस कूटलीला के बीच में रामदेव के पतंजलि की कोरोना की दवा ‘कोरोनिल’ प्रेस कॉन्फ्रेंसिंग में घोषित होते ही कुटी। रामदेव के ऐलान पर मंत्रालय ने यह कह कर तुषारापात किया कि वे तो प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की दवा बनाने की कह रहे थे। कोरोना की दवा बनाने की बात नहीं कर रहे थे। मान्य तरीके से उसके परीक्षण नहीं हुए। इसलिए हम ‘कोरोनिल’ मार्केटिंग पर बंदिश लगा रहे हैं। हम दस्तावेजों की जांच करेंगे..!

फिर, एक चैनल ने तमिलनाडु में कोरोना के मरीजों को ठीक करती बताई जा रही परंपरागत ‘सिद्ध’ नामक दवा की खबर दी, जिसका समर्थन वहां की सरकार भी करती बताई गई। बहस में ‘सिद्ध’ वालों ने ‘सिद्ध’ की जम कर तरफदारी की, लेकिन एक ने फिर टांग मारी कि जब तक कायदे से परीक्षण न हों, तब तक दवा का दावा करना गैरकानूनी है!

अजीब हाल है। दुनिया कोरोना की दवा या टीके के लिए तरस रही है और लोग राजनीति कर रहे हैं।
एक दिन कुछ बड़े लोग ‘क्लोरोक्विन’ को सही ठहराते हैं, फिर कुछ दिन बाद उसे ‘खतरनाक’ बता देते हैं। फिर कुछ दिन बाद उसे फिर से ‘ओके’ कर देते हैं! क्या कोरोना की दवा के रूप में ‘क्लोरोक्विन’ का कभी परीक्षण हुआ? या कि, अमल में लाई जा रही ‘प्लाज्मा थेरेपी’ का कहीं परीक्षण हुआ? फिर भी ये सब ‘ओके’, लेकिन ‘कोरोनिल’ या ‘सिद्ध’ को ‘नॉट ओके’! जाहिर है, ‘घर का जोगी जोगना, आन गांव का सिद्ध!’

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