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बाखबर: आमार सोनार बांग्ला

फिर एक दिन ‘आधे दिन’ का भारत बंद! चैनलों के लिए ‘आधा अधूरा’! कहीं बंद, कहीं खुला! बंद के दिन ही सरकार किसानों के विचार के लिए दस बिंदुओं वाला प्रस्ताव भेजती है। कई एंकर संशोधनों पर चर्चा कराते हंै, लेकिन किसान प्रस्ताव को सीधे खारिज कर देते हैं। एंकर चिंतित कि ऐसे कब तक चलेगा?

farmers, congress, tmcकई विपक्षी पार्टियों ने किसानों के समर्थन का ऐलान कर दिया है। फोटो सोर्स – ANI

दृश्य एक : एक चैनल की रिपोर्टर पूछती है : ‘किसान आंदोलन को कुछ बाहरी तत्वों ने ‘हाइजैक’ कर लिया है। शरजील इमाम और खालिद की रिहाई की मांग का किसानों के आंदोलन से क्या सबंध?’
– ‘हमें कौन ‘हाइजैक’ कर लेगा? कोई घुस गया होगा, तो निकाल देंगे।’ किसान यूनियन के नेताजी बड़ी कार में बैठे-बैठे लाइन देते हैं और कार फुर्र!
दृश्य दो : एक घेरे में बैठे कुछ किसान। किसानों के बीच एक बड़े हुक्के की ‘नै’ घूम रही है। बीच में एक रिपोर्टर जिज्ञासा करती है : आप लोग जो इस हुक्के को एक साथ पी रहे हैं, आपको कोरोना का डर नहीं?

एक किसान : हम पंद्रह दिन से यहां बैठ्ठे हैं, हमें तो अभी तक नहीं मिला कोरोना नामक जंतु! आप किसी कोरोना वाले को ले आओ। अपने गले लगा कर हम उसे भी ठीक कर देंगे। हा हा हा हा… किसान हंसते हैं… रिपोर्टर कट लेती है।
दृश्य तीन : विज्ञान भवन का हॉल। किसान नेतओं के हाथ में ‘यस और नो’ वाले पोस्टर! साढ़े तीन घंटे में मीटिंग खत्म। एक किसान नेता से एक रिपोर्टर : क्या बात हुई? नेता : सरकार ही बोलती रही, हम लोकां तो सारे वक्त चुप बैठे रहे!

एक किसान नेता : तीनों कानूनों को वापस ले लो, हम चले जाएंगे। लेकिन सरकार कहती है कि वापस नहीं ले सकते। हां, किसानों की उचित मांगों को मान सकते हैं!
सारे चैनल हताश : ‘बातचीत बेनतीजा’। ‘किसान अड़े’। ‘नो ब्रेक थ्रू’। ‘बातचीत में डेडलॉक’।
चौथा दृय : एक बेहद वृद्ध, तीखे नाक-नक्श वाले किसान के चेहरे पर झुर्रियां, लेकिन घनी धवल मूछें सीधी तनी हुई! क्या आथेंटिक किसान चेहरा!
आश्चर्य कि अब तक किसी चैनल ने आंदोलित किसान का एक ‘पोस्टर चेहरा’ नहीं खोजा! चैनलों को फुर्सत कहां कि आंदोलन को एक चेहरा प्रदान करें!

पांचवां दृश्य : पिश्ते बादाम वाली ठंडाई घुट रही है। एक किसान : मेवों की बोरियां भरी रखी हैं। आप भी पीके जाना, जोश आ जाएगा… रिपोर्टर कट लेता है।
छठा दृश्य सिंघू बार्डर से : कैमरे में एक ट्रैक्टर ट्राली, दो मंजिला बनाई हुई। एक किसान अपना मोबाइल चार्ज करता हुआ, दूसरा लेटा हुआ, नीचे कंबल बिछे हुए… रिपोर्टर उनके कष्ट बता रही थी, लेकिन किसान अपने आप में एकदम मस्त दिखते थे।

सातवां दृय : सड़क पर पंगत लगा कर सैकड़ों किसान बैठे हैं। थर्मोकोल की पत्तलों में रोटी दाल सब्जी खा रहे हैं। परोसने वाले परोस रहे हैं। कैमरे वाले कवर कर रहे हैं। यह आंदोलन की एक नितांत निर्द्वंद्व और स्वायत्त दुनिया है।
फिर एक दिन ‘आधे दिन’ का भारत बंद! चैनलों के लिए ‘आधा अधूरा’! कहीं बंद, कहीं खुला!
बंद के दिन ही सरकार किसानों के विचार के लिए दस बिंदुओं वाला प्रस्ताव भेजती है। कई एंकर संशोधनों पर चर्चा कराते हैं, लेकिन किसान प्रस्ताव को सीधे खारिज कर देते हैं। एंकर चिंतित कि ऐसे कब तक चलेगा?

कई चैनलों पर कृषि विशेषज्ञोंं की बहसें कहने लगती हैं कि ‘एमएसपी’ तय करना तो कानूनों की भावना के ही खिलाफ होगा।
एक दिन कई चैनलों में शरजील इमाम और उमर खालिद तथा अन्यों को रिहा करने की मांग करने वाले पोस्टर ही पोस्टर दिखने लगते हैं। वे कुछ इस तरह उठाए गए हैं कि उठाने वालों के चेहरे छिपे रहते हैं। कुछ पीली चुन्नियां अवश्य दिखती हैं। शाहीनबाग वाले दृश्य याद आने लगते हैं।

कुछ एंकर इसमें ‘टुकड़े टुकड़े गैंग’ देख लेते हैं, कुछ एंकर इसमें ‘अल्ट्रा लेफ्ट और नक्सलों’ का हाथ देख लेते हैं और हाय हाय होने लगती है!
फिर एक दिन कृषिमंत्री ‘शरजील इमाम खालिद आदि को रिहा करो’ की मांग वाली एक खबर दिखा कर कहने लगते हैं कि किसान इससे बचके रहें। एक किसान नेता जवाब देता है कि यह हमें बदनाम करने की सरकार की साजिश है!

इस बीच पीएम ‘नए भारत के लिए नए संसद भवन’ का शिलान्यास कर देते हैं। उस पर भी हाय हाय होने लगती है।
इसके आगे पश्चिम बंगाल में जाकर यही राजनीतिक कहानी हिंसक हो उठती है। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा और कैलाश विजयवर्गीय की कार पर पथराव होता है। विजयवर्गीय के हाथ में चोट लगी नजर आती है! इसके बाद जो दिव्य भाषा बरसती है, वह राजनीति का नया सौदर्यशास्त्र गढ़ने लगती है, जैसे ममता जी की यह तुकबंदी : ‘चड्डा फड्डा नड्डा भड्डा भड्डा’ फिर ‘मारबो लड़बो जीतबो रे’ फिर भाजपा के नेता का बयान कि : ‘उतना ही मारो जितना बाद में हजम कर सको! बदल देंगे और बदला लेंगे’। इतना ही नहीं, अपने महामहिम जी भी कह उठते हैं कि यह आग से खेलना है!
यह है : ‘आमार सोनार बांग्ला’!

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