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जनसत्ता बाखबर: नौ बजे नौ मिनट

चैनलों में कई दिनों तक तबलीगी जमात और मरकज की हरकत से संबंधित नए सवाल छाए रहे। रिपोर्टर आंकड़े दे-देकर बताते रहे कि इन दिनों इनमें से कितने किस-किस शहर में छिपे हैं और ये किसी को पता नहीं कि इस बीच वे कितनों के संपर्क में आए हैं और कितनों को कोरोना का वायरस दिया है?

पीएम मोदी का राष्ट्र के नाम संबोधन।

अठाईस मार्च की शाम ‘रिपब्लिक’ चैनल का एंकर पहले सरकार के आराम-कुर्सी छाप आलोचकों को नाम ले-लेकर देर तक कोसता और आश्वस्त करता रहा कि यह अच्छी बात है कि कोरोना के मामलों में उछाल नहीं आया!

तीस मार्च तक की खबरें आश्वस्तिमूलक रहीं। लगभग हर चैनल बताने लगा कि यह कोरोना की उठते ‘कर्व’ को सपाट करने का दौर है!
इस बीच एक अंग्रेजी चैनल पर एक ‘ग्लोबल टाउन हाल’ की मार्फत एक महादानी को महाज्ञानी बना कर ‘लॉक-डाउन’ में हमें हमारी चिंता को ‘मैनेज’ करने के गुर सिखाने के लिए बुला भेजा! अपनी जनता यानी गरीब की जोरू सबकी भाभी!

इन दिनों चैनलों में कोरोना सलाहकारों की अति है। हर चैनल हर रोज नए-नए चेहरे लेकर आ बैठता है और हर बंदा अपनी मौलिकता दिखाने के चक्कर में कुछ का कुछ कहने लगता है, जैसे कि आप बाहर भी निकल सकते हैं, बस कुछ बातों का खयाल रखें!
एक चैनल में एक ने ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ की जगह कोई देसी शब्द न खोज पाने के लिए अपने से अधिक दूसरों को कोसा कि ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ आम आदमी की समझ में नहीं आता, इसीलिए ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ नहीं हो पा रही!

स्वभाव से संभ्रांत अपने चैनल इतने दिन बाद भी ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ के एक हिंदी पर्याय नहीं खोज पाए! क्या हम ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ को ‘एक-दूसरे से दूरी बना कर रहना’ या ‘दूर दूर रहना’ या ‘अलग अलग रहना’ नहीं कह सकते?
कुछ चैनल घरों में बंद लोगों के मानसिक स्वास्थ्य की भी चिंता करने लगे कि वे क्या करें, क्या न करें। ऐसे अवसरों पर हमेशा ही उपलब्ध बाबा लोग आ जुटे। एक बाबा ने ज्ञान दिया कि बोर होने से न घबराएं, क्योंकि बोर होना प्रतिभाशाली का अधिकार है। क्या कभी भैंस को बोर होते देखा है?

इस बीच एक देशभक्त एंकर ने अंग्रेजी की एक ‘फ्रीलांस’ पत्रकार को ठोंक लिया, जो कुछ अमेरिकियों से कहलवाती रही कि कोरोना से अपने यहां लाखों मर सकते हैं। फिर उसने अमेरिकी मूल के एक पत्रकार को इस ‘फेकरी’ यानी ‘झूठियतबाजी’ के लिए ठोंका, जिसने इलाहाबाद जाने वाले पांच मजदूरों से बात कर लाइन लगा दी कि निर्मला सीताराण के पैकेज पर उनको भरोसा नहीं है!

इसी बीच निजामुद्दीन स्थित ‘तबलीगी जमात’ के ‘मरकज’ में शिरकत करने आए हजारों ‘इस्लामी स्कालर्स’ के बड़े जमावड़े ने चले आते ‘लॉक डाउन’ और ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ की धज्जियां उड़ा दीं! एंकर, विशेषज्ञ और चैनलों के दर्शक सभी यह देख हैरान-परेशान कि एक ओर पूरा भारत बंदी में घरों में बंद है और दूसरी ओर ये हजारों तबलीगी बंदी और ‘सोेशल डिस्टेंसिंग’ की खुलेआम ऐसी की तैसी कर रहे हैं!

इनको किसने जमा होने दिया? जवाब ढूंढ़ने के लिए सारे चैनल निजामुद्दीन स्थित ‘मरकज’ की इमारत के आगे लग गए। एक के बाद एक बसों में तबलीगियों को ले जाया गया और उसके बाद देखते-देखते कोरोना की महामारी भी ‘हिंदू-मुसलमान’ हो गई।

चैनलों में तबलीग के मुखिया मौलाना साद के वीडियो पर वीडियो बजने लगे, जिनमें वे तबलीगियों को समझाते दिखते थे कि यह कोरोना इस्लाम के खिलाफ साजिश है, इनका इरादा मुसलमानों को अलग-थलग करने का है। ‘लॉक-डाउन’ को हराओ। कोरोना फैलाओ।
चैनलों में कई दिनों तक तबलीगी जमात और मरकज की हरकत से संबंधित नए सवाल छाए रहे। रिपोर्टर आंकड़े दे-देकर बताते रहे कि इन दिनों इनमें से कितने किस-किस शहर में छिपे हैं और ये किसी को पता नहीं कि इस बीच वे कितनों के संपर्क में आए हैं और कितनों को कोरोना का वायरस दिया है?

कई एंकरों ने ऐसे लोगों को ‘कोरोना के रक्तबीज’ यानी ‘सुपर स्पे्रडर’ की संज्ञा दी!जहां जहां ये गए, वहां वहां से संक्रमण के बढ़ने की खबरें आने लगीं और सिर्फ दो दिन में संक्रमितों की संख्या एक हजार से दो हजार के ऊपर चली गई! ये जहां जहां गए वहीं वहीं कोरोना फैला आए! जांच और इलाज के लिए इनको जिस जिस अस्पताल में ले जाया गया, वहां वहां से इनके द्वारा डाक्टरों और नर्सों पर थूकने, उनके साथ बदसलूकी और गाली-गलौज करने, कहीं भी पेशाब कर देने और अश्लील हरकतें करने की खबरें आने लगीं। क्या इसी को ‘इस्लामी स्कॉलरशिप’ कहते हैं?

इनकी ऐसी ही हरकतों को देख एक चर्चक ने इनको ‘कोरोना फिदायीन’ कहा, तो एक पत्रकार ने इनके शहर शहर गायब हो जाने को ‘क्लस्टर बांबिग’ की संज्ञा दी!

लेकिन वाह रे अपने चैनलों का जनतंत्र कि इनके हिमायतियों को भी बहसों में बिठा लिया गया, जो आते ही आरोप लगाने लगे कि कोरोना के बहाने मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा है!

कोरोना को फैलाने के लिए इरादतन थूको तुम और फिर कहो कि मुसलमानों को ‘टारगेट’ किया जा रहा है! क्या बात है!
बहरहाल, शुक्रवार की सुबह पीएम का दस-बारह मिनट का एक ‘मोटीवेशनल’ वीडियो चैनलों में आया, जिसमें उन्होंने ‘लॉक डाउन’ को सफल बनाने वाले एक सौ तीस करोड़ देशवासियों की एकजुटता की प्रशंसा करते हुए पांच अप्रैल रविवार की रात नौ बजे नौ मिनट के लिए, ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ का ध्यान रखते हुए, अपने घरों के दरवाजों या खिड़कियों पर आकर दीया, मोमबत्ती या मोबाइल की फ्लैश लाइट जलाने और इस तरह ‘अंधेरे से उजाले की ओर जाने’ यानी ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ का आग्रह किया! लेकिन ‘अंधेरे से उजाले की ओर जाने’ का पीएम का यह संदेश भी निंदकों को निंदनीय लगा!

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