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बाखबर : शिकार दिखने का सुख

एक दिन सोनिया-राहुल का। एक दिन जेटली का। दो दिन केजरीवाल के। एक दिन राम मंदिर के लिए पत्थरों के आने की खबर का। एक दिन आजाद का, एक दिन नाबालिग न्याय कानून के अचानक राज्यसभा में पास होने का..

Author नई दिल्ली | December 27, 2015 12:16 AM
अरुण जेटली और कीर्ति आजाद (PTI)

एक दिन सोनिया-राहुल का। एक दिन जेटली का। दो दिन केजरीवाल के। एक दिन राम मंंिदर के लिए पत्थरों के आने की खबर का। एक दिन आजाद का, एक दिन नाबालिग न्याय कानून के अचानक राज्यसभा में पास होने का। एक दिन अभागे बीएसएफ के पुराने जहाज के जवानों का। बाकी वक्त दिल्ली के प्रदूषण के बंदोबस्त का!

कैमरों के कवरेज में रहने का गणित नेता सर्वाधिक समझते हैं। अवसर आते ही देर तक कैमरों के लिए बने रहना, कैमरों से अपना पीछा कराना, कार में बैठ कर शीशा बंद कर आगे देखने लगना, धीमे-धीमे चलते हुए अदालत में जाना और उतनी ही कैमरा चतुर निगाहों से मुस्कराते हुए बाहर आना, एक-दो पल कैमरों के लिए खास सही एंगिल पर खड़े रह कर बात करते दिखना आदि वे तरीके हैं, जिनसे नए शिकार अपने सीन बनाते हैं। आपका शिकार हुआ चेहरा सहज प्रसन्न दिखे, तो आप शहीद का दर्जा पाते हंै। समर्थकों की भीड़ आपकी लोकप्रियता है, सुरक्षाकर्मी आपकी हैसियत हैं, आप एक बड़ी कहानी हंै!

ऐसे सीन बार-बार दिखे सोनिया-राहुल-प्रियंका कांग्रेस के ये-ये-ये यानी सारे बड़े नाम रिपोर्टरों की जुबान पर तैरते रहे। सोनिया-राहुल की देह भाषा सोनिया के उस कथन को चरितार्थ करती थी कि मैं इंदिरा गांधी की बहू हूं, मैं किसी से नहीं डरती! यह नई वीरता थी कि सिर्फ अदालत जाना था, आना था और चैनलों को दिखाना था कि वे डरी नहीं।

शाम तक चैनल सीन के सटीक शीर्षक के लिए परेशान रहे, बाद में एक चैनल ने लाइन पकड़ी ‘भाजपा बैकफुट पर’?

खबरिया चैनलों के लिए हर खबर एक कुश्ती है। अगले ही दिन कांग्रेस बैकफुट पर थी, क्योंकि इंडिया टुडे के करण थापर से लेकर अर्णव तक कांग्रेस को पता नहीं क्यों कायल करते रहे कि आप संसद क्यों नहीं चलने दे रहे? बताइए संसद चलती तो क्या ऐसी तत्ती खबरें चैनलों को मिलतीं?

दो दिन बाद। वही पटियाला हाउस कोर्ट। वही एंट्री गेट। वैसी ही भीड़। सरकार के कई मंत्री भाजपा के नेता सब वित्तमंत्री जेटली के साथ। इस बार केजरी का वार और जेटली शिकार। चैनलों में वैसी ही सनसनी, वैसी ही अफरा-तफरी कि जेटली केजरी पर मानहानि का केस करने जा रहे हैं, उनको निराधार लांछित किया गया है, उनकी मानहानि हुई है आदि। कुछ देर बाद लाइनें दी जाने लगीं कि दस करोड़ की मानहानि का केस दर्ज हुआ है।

कट टू केजरीवाल। केजरीवाल की लाइन: जेटली पर जांच बिठाने जा रहे हैं! शाम की बहसें केजरीवाल बरक्स राजेंद्र कुमार बरक्स सीबीआइ का छापा बरक्स डीडीसीए की फाइल में दो दिन अटकी रहीं।

तीसरा शिकार चेहरा कीर्ति आजाद का रहा। तीन दिन से आजाद की क्लिपें चैनलों में बार-बार आती रहीं। आजाद के प्रवक्ता सिर्फ आजाद रहे। जेटली के प्रवक्ता पीएम तक दिखे, जिन्होंने कहा कि जेटली आडवाणीजी की तरह बेदाग होकर निकलेंगे। आखिर में खबर बनी कि उनको भाजपा ने निलंबित कर दिया है, जिसकी प्रतिक्रिया में आजाद ने ‘आगे-आगे देखिए होता है क्या’ वाले अंदाज में कहा कि पीएम बताएं मुझे क्यों सस्पेंड किया गया? मैं पीएम का समर्थक हूं! इससे जुड़ी अगली खबर मार्गदर्शक मंडल की रही कि आडवाणीजी मुरली मनोहर जोशी के घर पर मिलते दिखे।

दो दिन निर्भया के खूंखार बलात्कारी के छूटने के बाद चैनलों द्वारा बनाए गए राष्ट्रीय भय के नाम रहे। एक अंगरेजी चैनल की एंकर ने कहा कि यह पूर्व नाबालिग बलात्कारी (अब बालिग) इस राष्ट्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। राष्ट्र कहता है कि उसे न छोड़ा जाए!

इस तरह एक ओर खूंखार बलात्कारी था और दूसरी ओर चैनलों के अरक्षित एंकर थे और सवा सौ करोड़ की आबादी वाला एक अरक्षित और डरा हुआ राष्ट्र था! चैनलों के लिए उनका बनाया राष्ट्र एकदम डरपोक और असुरक्षित राष्ट्र था। चैनलों के पास खूंखार के एक से फुटेज थे। हर चैनल पर खबरों के बीच बार-बार एक पुलिसवैन से पुलिसवालों के साथ उसे उतरता चलता दिखाया जाता था। उसके सिर पर लाल रंग का अंगोछा लिपटा रहता था।

बाकी समय चैनलों में एनजीओ, वकीलों और दलीय प्रवक्ताओं के नाम रहा। नाबालिग कानून पास किया जाए कि न किया जाए? इस पर दो दिन चैनल और दो दिन राज्यसभा जूझती रही। फिर अचानक राज्यसभा में बिल आया। बहस हुई और वह ‘वॉयस वोट’ से पास कर दिया गया। ‘जल्दबाजी न करें’ ‘पास करने से भी खूंखार बलात्कारी को सजा न मिल सकेगी, वह तो आगे से लागू होगा।’ आदि की सलाहें बेकार गर्इं। निर्भया की मां इंडिया गेट से लेकर जंतर मंतर तक के हर फुटेज में रहीं। उनके साथ भीड़ रही और फिर राज्यसभा के विचार के दिन वे राज्यसभा में मौजूद बताई गर्इं। बिल पास हुआ तो कैमरे उनसे पूछने लगे, जैसे कि कानून न हुआ पर्सनल दवाई दी गई हो? चैनलों ने पूछा: आपका क्या कहना है? उन्होंने कहा कि अच्छा है, लेकिन मेरी लड़की के साथ जस्टिस नहीं हुआ!

अपने यहां या तो न्याय मिलता नहीं, अगर मिलता है तो दो मिनट में मिलता है। कभी-कभी संसद जनता के प्रति इस कदर संवेदनशील हो उठती है कि आनन-फानन में कानून बना देती है! चैनलों को इसी तरह से संवेदनशील दिखती है।

केजरी ने फिर प्रेस कॉन्फ्रेंस की और बोलते-बोलते तीन-चार बार खांसे। खांसते-खांसते मीडिया से चुटकी भी ली कि मीडिया मेरी खांसी का फोटो जरूर खींचता है! फिर चैनलों को बताया कि एक जनवरी से आगे पंद्रह दिनों तक ‘ऑड ईवन’ का दिल्ली सरकार का ब्लू प्रिंट क्या है, कैसा है, कैसे काम करेगा? केजरीवाल बताते वक्त भी आश्वस्त नहीं दिखे कि एक जनवरी का मंजर कैसा होगा?

इस बीच कांग्रेस के एक प्रवक्ता ने एक चैनल पर पीएम पर आरोप लगाया कि पीएम ने राष्ट्रगान का अपमान किया है। पता नहीं यह विवाद किस करवट बैठे, लेकिन तय है कि इस पर भी बहसें होंगी।
बीएसएफ के दस जवान एक जर्जर विमान हादसे के शिकार हो गए। सीन लाइव आते रहे। लेकिन यह दुर्घटना उतनी बड़ी खबर नहीं बनी, जितनी कि नेताओं के अदालत तक जाने की रही। मारे गए दस जवानों की श्रद्धांजलि तो दिखी, लेकिन यह किसी ने पूछा कि ऐसे जर्जर विमानों को बीएसएफ टाइप को ही क्यों दिया जाता है?

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