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बाखबर: अगर कहीं मैं तोता होता

विपक्ष की स्थिति विचित्र दिखी। विधेयक न खाते बनता न उगलते बनता! भई गति सांप छछुंदर केरी! वित्तमंत्री ने वामपंथियों पर चुटकी ली कि गरीबों की बात करने वाले तो इसका सर्मथन करें, जरा दिल खोल कर करें!

Author January 13, 2019 4:07 AM
प्रतीकात्मक फोटो (फाइल)

सरकार का मास्टर स्ट्रोक! सरकार का मास्टर स्ट्रोक! सरकार का छक्का! सरकार का छक्का! आर्थिक आधार पर दस फीसद आरक्षण विधेयक को लेकर हर एंकर लहालोट दिखा। मानो दस फीसद में वह भी शामिल हो! सभी एंकर जन मास्टर स्ट्रोक की वीरगाथा गाते रहे और अब ‘तेरा क्या होगा महागठबंधन’ जैसे कूट मंत्र उचारने लगे। तीन दिन तक न राग-राफेल सुनाई दिया, न राग-सबरीमला सुनाई दिया, न राग अयोध्या बजा, न विविध तिलक त्रिपुंडधारी बाबा लोग कैमरों में बयान देते दिखाई दिए। विधेयक संसद में था! बहसें थीं। सब लाइव था। कुछ कहते मास्टर स्ट्रोक! मास्टर स्ट्रोक! कुछ कहते सरकार डरी! सरकार डरी! आवाजें चैनलों में गूंजती थीं। ये है भाजपा का ‘सबका साथ सबका विकास’! दस फीसद में आर्थिक रूप से कमजोर हिंदू मुसलिम सिख ईसाई सब आते हैं। अपनी खिसियाहट उतारते हुए विपक्ष सरकार से पूछता रहा : साढ़े चार साल बैठे रहे। अब चुनाव आया तो ले आए। यह चुनावी अवसरवाद है। फिर आपने नौकरियां पैदा ही कहां की हैं कि आरक्षण दोगे। यह भी एक ‘जुमला’ है। ‘कमल छाप जुमला’ है।

आरक्षण के भक्त बोलते रहे : देखा! हम सबका साथ सबका विकास में यकीन करते हैं। किसी के साथ भेदभाव नहीं करते। हमारी नजर में सब बराबर हैं।
लेकिन विघ्न संतोषी क्यों मानते? वे कहते रहे कि अव्वल तो यह राज्यसभा में अटकेगा। अगर वहां से निकला तो बड़ी अदालत में अटकेगा! वित्तमंत्री ने अपने लंबे भाषण में इस आरक्षण के टिकाऊ होने को लेकर कहा कि अब तक राज्यों में जितने आरक्षण दिए गए, इसलिए वापस हुए, क्योंकि वे आरक्षण को ताकत प्रदान करने वाली धारा से ताकत नहीं लेते थे, यानी यह लेगा और टिकेगा! विपक्ष की स्थिति विचित्र दिखी। विधेयक न खाते बनता न उगलते बनता! भई गति सांप छछुंदर केरी! वित्तमंत्री ने वामपंथियों पर चुटकी ली कि गरीबों की बात करने वाले तो इसका सर्मथन करें, जरा दिल खोल कर करें! पर अपने विपक्ष का भी जवाब नहीं। पहले संसद में जम कर आलोचना की। देर तक किंतु-परंतु किया। फिर अंत में हां कर दी। आरक्षण विधेयक पास हो गया।लेकिन दो दिन की धुलाई ने आरक्षण की सारी कमाई को बेकार कर दिया। एक चैनल पर एक बहस में एक अंग्रेजी पत्रकार ने कहा भी कि चुनाव के ऐन पहले ऐसे कोई भी ‘पापूलिस्ट’ कदम लाभ नहीं देते, क्योंकि पब्लिक जानती होती है कि यह सब चुनाव में वोट लेने के लिए किया जा रहा है।
बहसों ने सब साफ कर दिया, 2019 के चुनाव सामने हैं।

इसके बाद जो बड़ी खबरें बनार्इं, बड़ी अदालत ने बनार्इं। एक सुबह बड़े जजों की एक बेंच ने मंदिर मामले की सुनवाई की। सुनवाई कुल सोलह मिनट में निपट गई। अगली तारीख उनतीस जनवरी दी गई!
अदालत की ऐसी लाइन सुन कर भक्त जन ‘महादुखी’ दिखे। अदालत के बाहर प्रदर्शन करते दिखे। एक कु्रद्ध भक्तिन बोलीं : जज रहें ठाठ में राम लला टाट में! ये नहीं चलेगा!
एक हिंदी चैनल पर अयोध्या से एक बाबा बोले : यह नहीं चलेगा। अदालत को सौ करोड़ जनता की भावनाओं को भी देखना चाहिए। एक बोला, सबरीमला पर ‘फास्ट ट्रैक’, आधार पर ‘फास्ट ट्रैक’ और मंदिर पर देर! यह ठीक नहीं। इसे भी करो ‘फास्ट ट्रैक’! बाबा लोग भी आजकल राजनीति में पूरे निष्णात हैं।
तभी एक चैनल अदालत की दुश्वारी बताने लगा कि तीन लाख पृष्ठ की सामग्री है। नब्बे हजार पेज फारसी उर्दू में हैं। पंद्रह पार्टियां दावेदार हैं। इतने पृष्ठों को बांचना, समझना और सब पक्षों की सुनवाई करना। यह कोई हंसी ठट्ठा नहीं है। यानी कि मामला 2019 के चुनाव से पहले तक नहीं निपटना।
लेकिन हाय रे ‘तोते’ की किस्मत!

एक दिन सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा बहाल और एक दिन बाद ही ‘आउट’! वर्मा दफ्तर गए। कामकाज शुरू किया। लेकिन हा हंत! अड़तालीस घंटे भी न हुए थे कि आलोक वर्मा को ‘मूव आउट’ कर किसी और महकमे में भेज दिया गया!
‘सेलेक्ट कमेटी’ सुबह बैठी और पहली चोट में ही आलोक वर्मा का तबादला कर दिया। कारण सीवीसी की रिपोर्ट!
हाय रे तोते तेरी किस्मत! कभी अंदर तो कभी बाहर!
तोते की ऐसी किस्मत पर कवि रघुवीर सहाय की यह कविता कितनी सटीक है :
‘अगर कहीं मैं तोता होता
तोता होता, तो क्या होता?
तोता होता!
होता, ‘फिर’ क्या?
होता क्या? मैं तोता होता
तोता तोता तोता तोता
तो तो तो तो ता ता ता ता
बोल पट्ठे सीताराम!’

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